Saturday, 25 February 2017

रावल भोजदेव भाटी ( 1176-1178 ई.)

रावल भोजदेव भाटी (1176-178 ई.)

"उत्तर भङ किवाङ भाटी"
Defenders of the Northern Gates of India

लोद्रवा ( प्राचीन जैसलमेर )

लोद्रवा के रावल विजयराज लांजा (1165-11 76 ई.) जब विवाह के लिए आबू के परमार राजा के यहां गए तो तोरण पर वर की आरती करते समय उनकी सास ने उन्हें दही का तिलक (दही लिलाड) करते समय कहा था कि बेटा "उत्तर दिसा भड किवाङ हुवै" उत्तर दिशा के किवाड (द्वार) के भड (योद्धा रक्षक) होना |
रावल वियजराज ने उसे यह वचन दे दिया था। रावल विजयराज की मृत्यु के बाद उनके पुत्र भोजदेव भाटी लोद्रवा के रावल बने ।

1178 ई. में गजनी के सुल्तान मोहम्मद गौरीने गुजरात के चालुक्य 'सोलंकी' राज्य और मार्ग में पङने वाले आबू के परमार राज्य पर आक्रमण का मन बनाया तब उसने लोद्रवे के रावल भोजदेव को मनाया कि भोजदेव इस आक्रमण की सूचना आबू के परमात्रों को नहीं देवे ।
इस पर भोजदेव की माता ने उसे उसके पिता के दिए वचन कि ‘वह उत्तर दिशा की रक्षा करेगा' की याद दिलाई । अत: भोजदेव ने आबू को सूचना भेज दी और मोहम्मद गौरी के देश रक्षा करने के अपने निश्चय से सूचित कर दिया ।

1178 ई. में गौरी की सेना लोद्रवे से 2 मील दूर 'मोढी की माल' में पड़ाव डाले हुए थी । वहां से गौरी ने 1 178 ई. में लोद्रवा पर आक्रमण कर दिया । रावल भोजदेव ने साका (धर्मयुद्ध) किया और अनेक योद्धाओं के साथ वीरगति प्राप्त की। मुस्लिम कमाण्डर मजेज खां भी मारा गया ।
उसी दिन से भाटी राजपूतों को उत्तर भड़ किवाड़ भाटी के सम्मानजनक विरूद्ध से अभिभूषित किया जाने लगा ।
1. भाटी वंश का गौरवमय इतिहास (प्रथम) डॉ. हुकम सिंह भाटी
2. जैसलमेर राज्य का इतिहास - मांगीलाल मयंक ।

Thursday, 23 February 2017

राजा नागभट्ट प्रथम प्रतिहार (रघुवंशी) उज्जैन (725-756)

राजा नागभट्ट प्रथम प्रतिहार (रघुवंशी)
उज्जैन (725-756)


सिंध में खलीफा के प्रतिनिधि जुनैद के समय अरब सेनापति हबीब मर्रा ने उज्जैन पर जब आक्रमण किया वहां राजा नागभट्ट प्रथम ने उसका कारगर मुकाबला किया । नागभट्ट का राज्य उज्जैन से सिंधु सागर (अरब सागर) तक फैला हुआ था ।
अंग्रेजों ने सिंधु सागर का नाम अरब सागर किया था । भोज ग्वालियर प्रशस्ति में नागभट्ट द्वारा मुसलमानों को हटाने का उल्लेख है । प्रशस्तिकार लिखता है कि धर्म के नाशक शक्तिशाली मुसलमान राजा की सेना द्वारा पीङित जनता की प्रार्थना पर नागभट्ट भगवान नारायण के सामने प्रकट हुआ । शिलालेखों के अनुसार दंतिदुर्ग राष्ट्रकुट राठौड़ ने नागभट्ट की सहायता की थी ।

राजा नागभट्ट ने इसके अतिरिक्त जिन प्रदेशों पर अरबों ने अधिकार कर लिया था उन्हें फिर आजाद कर लिया । इसकी पुष्टि भङौच के चौहान राजा भतृवडढ के 756 ई. 0 के हांसोट अभिलेख से होती है ।
अरब इतिहासकार बिलाजुरी लिखता है कि सिंध के सूबेदार जुनैद के बाद तमीम जब सूबेदार बना तो "मुसलमानों" को हिन्द के कई प्रदेशों से पीछे हटना पङा ।"

नागभट्ट प्रथम द्वारा स्थापित प्रतिहार साम्राज्य मुसलमानों के भारत विजय से पूर्व का सबसे अन्तिम महान साम्राज्य था । एक शताब्दी तक इस साम्राज्य ने भारत की मुसलमानों से रक्षा की ।
यह प्रतिहार साम्राज्य ही था जिसने अरब आक्रमण का इतनी सफलता से एक शताब्दी तक सामना किया । यह उनकी भारतीय स्वतंत्रता की महान सेवा थी ।

प्रतिहार साम्राज्य की शक्ति और संगठन का सबसे प्रमाणित वर्णन अरब के इतिहासकारों ने किया है । हेबल ने लिखा है कि प्रतिहारों ने जो दीवार खङी कर दी थी उसको तोङकर अरब भारत में प्रवेश नहीं कर सके ।

The age of Imperial Kannauj- Bhartiya Vidhya Bhawan
( सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध - डा. अशोक कुमारसिंह, बनारस हिन्दी विश्वविद्यालय वाराणसी की PHD हेतु स्वीकृत शोध ग्रन्थ , पृष्ठ 17,18,19)

Wednesday, 22 February 2017

सामाजिकता कि दौड़

सामाजिकता कि दौड़

इस समाज का बच्चा बच्चा सामाजिक है, और पुरे दिल से कार्य भी करता है ।
पर इस सामाजिकता कि दौड़ बङी कच्ची और छोटी है ।
सभी सामाजिक महोदयो का हाल एक जैसा ही है ।
सब सामाजिक लोग अपने प्रयासों को सफल बनाने का पहला प्रयास यह करते है कि मैं इस समाज को सुधार दूँ ।
और इस सुधार कि पहली सीढी उन्हें नजर आती है सामाजिक संगठन और वह उस तरफ भागता है ।
इन संगठनों कि भव्यता को देखता है कही कही चकाचौंध को देखता है और निराश हो जाता है कि मुझे इसमें कोई जानता नही में कैसे समाज का भला करुँ ।


वह एक बार लौट आता है पर सामाजिकता का किङा उसे फिर काटता है और फिर वह किसी संगठन कि तरफ दौड़ता है, इस बार उसे लगता है कि मैं कुछ लोगों के नाम जानने लगा हुँ फला फला संगठन में फला फला लोग है ।
अब वह उन नामों को इधर उधर बताता है और जताता है कि हाँ मैं अब सामाजिक कार्य करनी कि तरफ बढ चुका हुँ ।
मैं संगठन के कुछ लोगों को जानने लगा हुँ ।
और धिरे धिरे वह परिचित होता है और उत्साह और मनमुग्धा सातवें आसमान पर होती है ।
फिर देखता है कि इसी संगठन का पुराना समाज सेवक दुखी है कि कोई उसकी सुनता नही और वह समाज सेवा नही कर पा रहा है, धिरे धिरे उसे लगता है मैं यहाँ से समाज सेवा नही कर सकता ।


अब कुछ लोग समाजसेवी का ठपा लगवाकर खुश हो जाते है और कुछ आलोचक बन जाते है ।
कुछ लोग विरोधी भाव लिये समाचार इधर से उधर उछाल कर भडांस निकाल लेते है ।
कुछ सज्जन शांति से गृहस्थ आश्रम कि और पलायन करते है और कोई कोई इन सामाजिक भावों से नफरत करने लगता है ।
यह सब स्थितियाँ व्यक्ति के स्वयं के विश्लेषण पर निर्भर करती है कि वह क्या सोचता व समझता है ।
क्या वह मूल रुप व भाव को समझ पाया है या नही ??

अब भी एक आध ऐसे बच जाते है जिनमें सामाजिकता का बङा किङा काटता है,
वह फिर एक और पाखण्ड रचते है पाखण्डीयों से मिले अनुभव कि आलोचना का पाखण्ड असल में जो करने कि कार्य योजना है उसी रास्ते कि आलोचना कर कुछ छोटे छोटे किङे काटने वालो का समुह बना अपनी अपना एक नया संगठन बनाता है और यह नया संगठन क्या करेगा ??
वही पुराने कार्य जो बाकि कर रहे है ।।
एक तराह के सामाजिक और होते है जिनका मकसद होता है लोग मुझे जानने लगे बस इनके ख्वाब बङे छोटे होते है बाबाजी कि तराह बस खाने को रोटी मिले और राम नाम का जप ।

एक सामाजिक भाई साहब जिनका मकसद ही राजनीतिक पार्टी से जुङना होता है वह तो क्या क्या पैंतरे अपना ले कुछ कहाँ नही जा सकता ।।
आखिर सब अपना अपना भला मत मुताबिक कर लेते है बस समाज और सामाजिकता अब भी दर्द लिये घुमते है ।।
"बलवीर"

बा राजस्थानी भाषा है ।।

बा राजस्थानी भाषा है ।।


जद-जद भारत मे था सता-जोग, आफत रि आँन्धी आयी हि,
बक्तर रि कङिया बङकि हि जद, सिन्धु राग सुनायी हि ।।

गङ गङिया तोपा रा गोला, भाला रि अणिया भलकि हि।
जोधा री धारा रक्ता ही, धारा रातम्बर रळकी ही ।

अङवङता घोङा उलहङता, रङवङता माथा रण खेता ।
सिर कटिया सुरा समहर मे, ढाला-तलवारा ले ढलता ।

रणबँका राठौङ भिङे, कि देखे भाल तमाशा है ।
उण बकत हुवे ललकार अठे, बा राजस्थानी भाषा है ।।

Tuesday, 21 February 2017

सनातन धर्म रक्षक राजा मानसिंह आमेर - एक कुशल राजनीतिज्ञ :-

सनातन धर्म रक्षक राजा मानसिंह आमेर ।

एक कुशल राजनीतिज्ञ :-
गीता सहीत सम्पूर्ण क्षत्रिय शास्त्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि बिना निति के शासन नहीं किया जा सकता है इसलिए इस नीतिशास्त्र का नाम ही राजनीति शास्त्र बन गया । नीती का अर्थ है जिसके द्वारा विजय प्राप्त की जाती है । दुर्बल पक्ष नीति का आश्रय लेकर ही सबल शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकता है । निति शास्त्र का कथन है यदि आपका पक्ष दुर्बल है तो सबल से समझौता कर उसको अपने सिर पर घङे की तरह धारण कर लो व अपनी शक्ति का संचय करते रहो । जब तुम स्वयं सबल हो जाओ तो शत्रु रुपी घङे को सिर पर से उठाकर ऐसे गिरा दो जिससे वह पुरी तरह नष्ट हो जाये ।

इतिहास साक्षी है कि राजपूत काल में क्षत्रियों व क्षत्राणियों ने ऐसी अद्भुत वीरता का परिचय दिया जिसकी तुलना अन्य किसी काल व देश से नहीं की जा सकती लेकिन उनका उद्देश्य केवल कर्तव्य पालन भाव था, उसके साथ नीति का मिश्रण नहीं होने के कारण उनका अद्भुत पराक्रम व वीरता उनको विजय तक नहीं पहुँचा सकी । इतिहास में जिसको राजपूत काल कहा जाता है उसमें केवल तीन नीतिज्ञ क्षत्रियों (राजपूतों) के उदाहरण मिलते हैं ।

पहला उदाहरण है मेवाड़ के राणा उदयसिंह का जिन्होंने किलों में बन्द होकर लङने की आत्मघाती परम्परा को समाप्त कर दिया, खुले में लङने की नीति अपनाई । अकबर के आक्रमण के समय केवल सांकेतिक युद्ध लङने के लिए जयमल जी व फत्ता को कुछ सौ सैनिकों के साथ किले में किले की रक्षा के लिए छोड़ा व अपनी सारी सेना, सम्पत्ति व परिवारजनों को साथ लेकर किले के बाहर निकल गये व बाहर से छापामार युद्ध के द्वारा शत्रु को परेशान करते रहे । उसी अपने धन से सुरक्षित स्थान पर उदयपुर बसाया उसे अपनी राजधानी बनाया व उसी धन के बल पर राणा प्रताप जीवन भर अकबर से संघर्ष करने में सफल हुए ।

दुसरा उदाहरण है आमेर के राजाओं का राजा भारमल, भगवन्तदास व मानसिंह तीन पीढ़ी तक लगातार वीर व नीतिज्ञ राजा हुये जिन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार किया कि राजपूत शक्ति इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह मुगलों का सामना नहीं कर सकती है इसलिए भारमल ने अकबर से समझौता किया व उस समझौते का सर्वाधिक लाभ राजा मानसिंह ने अपने अद्भुत नेतृत्व, वीरता व नीतिज्ञता के कारण उठाया ।

तीसरे नीतिज्ञ पुरुष दुर्गादास राठौड़ हुए जिन्होंने औरंगजेब जैसे कट्टर व क्रुर शासक से संघर्ष कर जोधपुर राज्य पर पुनः अधिकार कर अजीतसिंह को राजा बनाया, मुगलों से सन्धि भी कि, संघर्ष भी किया । यदि पूर्व काल के लोगों ने भी नीति का आश्रय लिया होता तो राजपूतों की शक्ति का उतना क्षय नहीं होता जितना राजपूत काल के 600 वर्षों में हुआ ।

सनातन धर्म रक्षक राजा मानसिंह आमेर स्मृति समारोह
29 जनवरी 2017
रविवार, 1 बजे से ।
श्री राजपूत सभा भवन जयपुर ।
निवेदक- इतिहास शुद्धिकरण अभियान ।

सनातन धर्म रक्षक राजा मानसिंह आमेर स्मृति समारोह का आयोजन किया गया ।

सनातन धर्म रक्षक राजा मानसिंह आमेर स्मृति समारोह

इतिहास शुद्धीकरण अभियान के तहत कल राजपूत सभा भवन जयपुर में राजा मानसिंह आमेर की स्मृति में समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें राजा मानसिंह के जीवन से संबंधित कई भ्रान्तियों का निवारण कर अन्य कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर प्रकाश डाल कर मुख्य वक़्ता अग्रवाल कॉलेज के प्रिन्सिपल श्री राजेन्द्र सिंहजी खंगारोत ने कहा कि राजा मानसिंह आमेर के साथ न्याय नहीं किया गया। अकबर की उपलब्धियों को मानसिंह की उपलब्धियों के प्रकाश में देखा जाना चाहिये।


ूर्व विधायक श्री खुशवीर सिंहजी ने कहा कि हमें अपने इतिहास का पुनर्लेखन कर अपने वीर चरित्रों का सम्यक् चित्रण समाज के सामने लाना चाहिये।
मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि समाज की नई पीढ़ी हमसे अधिक जागरुक है और यह उजला पक्ष है हमारे लिये।
इस अवसर पर पुस्तक- स्वतन्त्रता समर के क्रान्तिकारी योद्धा, का विमोचन भी अतिथियों द्वारा किया गया ।


समारोह में आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश राजस्थान, दिल्ली आदि कई राज्यों से समाज के 7000 व्यक्तियों ने भाग लिया।
समारोह में मानसिंह जी के जीवन पर प्रकाश निम्न वक्ताओं ने डाला ।
1. प्रतापसिंह जी नन्देरा
2. जगदिश सिंह बङनगर
3. सिताराम सिंह बङनगर
4. शक्ति सिंह बान्दीकुई
5. बलवीर सिंह राठौड़ डढे़ल
6. भंवर सिंह रेटा
7. कुँवराणी निशा कँवर
8. अजितेंन्द्र सिंह भिवानी
9. कृष्णवर्धनसिंह गुढा़ गौङजी ।
वक्ताओ ने राजा मानसिंह आमेर की प्रमुख निम्न विशेषताओं पर प्रकाश डाला ।
1. कुशल राजनीतिज्ञ
2. पराक्रम व युक्ति बुद्धि का सामंजस्य
3. विज्ञान के विकास की और ध्यान देना
4. धर्म के प्रति आस्था व आत्मविश्वास की पुनः स्थापना
5. सुदृढ़ गुप्तचर व्यवस्था का निर्माण
6. उदारता व गुणवान लोगों का संग्रह
7. अपनों में विश्वास व श्रद्धा
8. कर्तव्य व बलिदान की महिमा को बिना फल की अभिलाषा रखें समझना


कार्यक्रम का संचालन देवीसिंह जी महार साहब के सानिध्य समारोह संयोजक राजेश सिंह जी हुडील ने किया ।।
सभी सामाजिक संगठनों के अध्यक्ष व सदस्यों ने अपनी उपस्थित दर्ज करवाई व कार्यक्रम कि सराहना कि ।
इस श्रृंखला में आगे भी कई चरित्रों पर प्रकाश डालने का कार्य किया जायेगा ।

समाज में संगठनों कि भरमार

समाज में संगठनों कि भरमार

समाज में संगठनों कि भरमार है कोई भी संगठन ठिक से अपना काम नही कर पा रहा है ।
20-30 कि उम्र के नौजवान संगठनों में पद लेकर 4-6 साल खराब कर देते है ।
किसी भी संगठन के पास कोई ढंग कि गाइड लाइन नही है कि क्या कार्य हमें करना है और कैसे ।
व्यक्तिवाद भी समाज पर हावी होता जा रहा है अपने डेकोरम के दम पर तराह तराह के नाटक रचे जाते है वर्चस्व कि लङाई इन संगठनों पर इतनी ज्यादा हावी है कि ढंग का आदमी इनके आस पास ना भटके ।
आजकल संगठन संख्याबल दिखाकर अपनी सफलता असफलता प्रदर्शित करते है तो स्पष्ट बात यह है कि हमारे समाज में आज भौतिक रुप से सक्षम लोग अपना हित साधने के लिये है कुछ भी आमजन से करवा सकते है ।
हमारे समाज के युवाओं के पास उनके भविष्य को लेकर को प्लान नही है । कोई भी व्यक्ति जोश भरा भाषण देकर उन्हें आकर्षित कर लेता है और युवा उनके पिछे हो जाते है यह आकर्षण भी बहुत कम समय का होता है लेकिन इस समय में युवा वर्ग अपना कीमती समय गवां चुका होता है ।
सामाजिक संगठनों को युवाओं को अपने तामझाम से दुर रखना चाहिए उनके भविष्य से खिलवाड़ नही करना चाहिए ।
"बलवीर"

Monday, 20 February 2017

पिण्डारी लङाका

पिण्डारी लङाका

पिण्डारी (पिंडारी / पंडारी / पेंढारी) दक्षिण भारत में जा बसे युद्धप्रिय पठान सवार थे। उनकी उत्पत्ति तथा नामकरण विवादास्पद है। वे बड़े कर्मठ, साहसी तथा वफ़ादार थे। टट्टू उनकी सवारी थी। तलवार और भाले उनके अस्त्र थे। वे दलों में विभक्त थे और प्रत्येक दल में साधारणत: दो से तीन हज़ार तक सवार होते थे। योग्यतम व्यक्ति दल का सरदार चुना जाता था। उसकी आज्ञा सर्वमान्य होती थी। पिण्डारियों में धार्मिक संकीर्णता न थी। 19वीं शताब्दी में हिन्दू (विशेषकर जाट) और सिख भी उनके सैनिक दलों में शामिल थे। उनकी स्त्रियों का रहन-सहन हिन्दू स्त्रियों जैसा था। उनमें देवी देवताओं की पूजा प्रचलित थी। ये कुछ क़बाइली संस्कृति का नेतृत्व करते थे

अनियमित सवार,
जो मराठा सेनाओं के साथ-साथ चलते थे। उन्हें कोई वेतन नहीं दिया जाता था और शत्रु के देश को लूटने की इजाज़त रहती थी। यद्यपि कुछ प्रमुख पिण्डारी नेता पठान थे, तथापि सभी जातियों के खूंखार और ख़तरनाक व्यक्ति उनके दल में सम्मिलित थे। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में उनको शिन्दे का संरक्षण प्राप्त था। उसने उनको नर्मदा घाटी के मालवा क्षेत्र में ज़मीन दे रखी थीं। वहाँ से वे मध्य भारत में दूर-दूर तक धावे मारते थे और अमीरों तथा ग़रीबों को समान रूप से लूटा करते थे। 1812 ई॰ में उन्होंने बुंदेलखंड, 1815 ई॰ निज़ाम के राज्य में तथा 1816 ई॰ में उत्तरी सरकार में लूटपाट की। इस तरह उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की शांति और समृद्धि के लिए ख़तरा उत्पन्न कर दिया। अतएव 1817 ई॰ गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने उनके विरूद्ध अभियान के लिए एक बड़ी सेना संगठित की। यद्यपि पिण्डारी विरोधी अभियान के फलस्वरूप तीसरा मराठा युद्ध छिड़ गया तथापि पिण्डारियों का दमन कर दिया गया। उनके पठान नेता अमीर खांको टोंक के नवाब के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गयी। उसने अंग्रेज़ों की अधीनता स्वीकार कर ली। पिण्डारियों का दूसरा महत्त्वपूर्ण नेता चीतू था। उसका पीछा किया जाने पर वह जंगलों में भाग गया, जहाँ एक चीते ने उसे खा डाला

मराठों की सेना में महत्त्वपूर्ण स्थान
मराठों की अस्थायी सेना में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। पिंडारी सरदार नसरू ने मुग़लों के विरुद्ध शिवाजी की सहायता की। पुनापा ने उनके उत्तराधिकारियों का साथ दिया। गाज़ीउद्दीन ने बाजीराव प्रथम को उसके उत्तरी अभियानों में सहयोग दिया। चिंगोदी तथा हूल के नेतृत्व में 15 हज़ार पिंडारियों ने पानीपत के युद्ध में भाग लिया। अंत में वे मालवा में बस गए और सिंधिया शाही तथा होल्कर शाही पिंडारी कहलाए। बाद में चीतू, करीम ख़ाँ, दोस्तमुहम्मद और वसीलमुहम्मद सिंधिया की पिंडारी सेना के प्रसिद्ध सरदार हुए तथा कादिर खाँ, तुक्कू खाँ, साहिब खाँ और शेख दुल्ला होल्कर की सेना में रहे।
पिंडारी सवारों की कुल संख्या लगभग 50,000 थी। युद्ध में लूटमार और विध्वंस के कार्य उन्हीं को सौंपे जाते थे। लूट का कुछ भाग उन्हें भी मिलता था। शांतिकाल में वे खेतीबाड़ी तथा व्यापार करते थे। गुज़ारे के लिए उन्हें करमुक्त भूमि तथा टट्टू के लिए भत्ता मिलता था।

पतन
अवशेष
मराठा शासकों के साथ वेलेजली की सहायक संधियों के फलस्वरूप पिण्डारियों के लिए उनकी सेना में स्थान न रहा। इसलिए वे धन लेकर अन्य राज्यों का सैनिक सहायता देने लगे तथा अव्यवस्था से लाभ उठाकर लूटमार से धन कमाने लगे। संभव है उन्हीं के भय से कुछ देशी राज्यों ने सहायक संधियाँ स्वीकार की हों।
सन् 1807 तक पिंडारियों के धावे यमुना और नर्मदा के बीच तक सीमित रहे। तत्पश्चात् उन्होंने मिर्ज़ापुर से मद्रास तक और उड़ीसा से राजस्थान तथा गुजरात तक अपना कार्यक्षेत्र विस्तृत कर दिया। 1812 में उन्होंने बुंदेलखंड पर, 1815 में निज़ाम के राज्य से मद्रास तक तथा 1816 में उत्तरी सरकारों के इलाकों पर भंयकर धावे किए। इससे शांति एवं सुरक्षा जाती रही तथा पिंडारियों की गणना लुटेरों में होने लगी।

इस गंभीर स्थिति से मुक्ति पाने के उद्देश्य से लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1817 में मराठा संघ को नष्ट करने के पूर्व कूटनीति द्वारा पिण्डारी सरदारों में फूट डाल दी तथा संधियों द्वारा देशी राज्यों से उनके विरुद्ध सहायता ली। फिर अपने और हिसलप के नेतृत्व में 120,000 सैनिकों तथा 300 तोपों सहित उनके इलाक़ो को घेरकर उन्हें नष्ट कर दिया। हज़ारों पिण्डारी मारे गए, बंदी बने या जंगलों में चले गए। चीतू को असोरगढ़ के जंगल में चीते ने ही खा डाला। वसील मुहम्मद ने कारागार में आत्महत्या कर ली। चीतू जाट परिवार में दिल्ली के निकटवर्ती गाँव में पैदा हुआ था| इसको दोब्बल ख़ाँ ने ग़ुलाम बनाया और बाद में अपना पुत्र बना लिया।[2] इसके बेटे बरुन दुर्राह [3] के सरदार थे। करीम खाँ को गोरखपुर ज़िले में गणेशपुर की जागीर दी गई। इस प्रकार पिंडारियों के संगठन टूट गए और वे तितर बितर हो गए।
पिण्डारी तब और अब

गोरखपुर महानगर के मियां बाज़ार में साठ साल पुरानी पिंडारी बिल्डिंग है। इसके मालिक पिंडारियों के सरदार करीम ख़ाँ की पांचवी पीढ़ी के अब्दुल रहमत करीम ख़ाँ हैं। वे अपनी बिरादरी के अगुवा भी हैं। रहमत करीम ख़ाँ बताते हैं कि एक समझौते के तहत अंग्रेजों ने पिंडारियों के सरदार करीम ख़ाँ को 1820 में सिकरीगंज में जागीर देकर बसाया। सिकरीगंज कस्बे में से सटे इमली डीह खुर्द के हाता नयाब से सरदार करीम ख़ाँ ने अपनी ज़िंदगी शुरू की। मुत्यु होने के बाद उन्हें यहीं दफ़नाया गया।
शबबरात को सभी पिंडारी उनकी मजार पर फ़ातहा पढ़ने आते हैं। पांचवीं पीढ़ी के ही उनके एक वंशज अब्दुल माबूद करीम ख़ाँ पिंडारी मेडिकल स्टोर चलाते हैं। उन्हें यह बात गवारा नहीं कि उनके पूर्वज लुटेरे थे। वे इसे ऐतिहासिक चूक बताते हैं। उनका कहना है कि पिंडारियों ने अन्याय और अत्याचार का मुक़ाबला किया। सरदार करीम के वंशज सिकरीगंज से आगे बढ़कर बस्ती और बाराबंकी तक फैल गए

मूल्याँकन

पिंडारियों के बारे में इतिहास में तरह-तरह की भ्रान्तियां रहीं।
इतिहासकार राजबली पाण्डेय पिंडारियों को लुटेरो का गिरोह बताते हैं, जबकि दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास विभाग के प्रो. सैयद नजमुल रज़ा रिजवी का कहना है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में लुटेरे पिंडारियों का एक गिरोह था, जिन्हें मराठों ने भाड़े का सैनिक बना लिया। मराठों के पतन के बाद वे टोंक के नवाब अमीर ख़ाँ के लिए काम करने लगे। नवाब के कमज़ोर होने पर पिंडारियों ने अपनी जीविका के लिए फिर लूट-मार शुरू कर दी। इससे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में शांति व्यवस्था मुश्किल हो गई।

हमारी भूले


जिन्होंने महाभारत ग्रन्थ पढ़ा है, वे शुक्राचार्य के इन वचनों को कभी नहीं भूल सकते- " जो मंद बुद्धि अपनी ना समझी के कारण मदिरा पीता है, धर्म उसी क्षण उसका साथ छोड़ देता है, वह सभी की निंदा व अवज्ञा का पात्र बन जाता है । यह मेरा निश्चित मत है । लोग आज से इस बात को शास्त्र मान लें और उसी पर चलें । "

इसी प्रकार बाल्मिकिय रामायण में अनेक स्थलों पर मधु मांस भक्षण का निषेध किया है । इन सब तथ्यों की अवहेलना कर आज हमने अपने आहार व व्यवहार को इतना अशुद्ध बना लिया है जिससे हमारे विकास की समस्त संभावनाएं क्षीण हो गयी है ।

अत: यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यदि हम अपने आपका व समाज का कल्याण चाहते है तो कुछ सौ वर्षों से आरम्भ हुई आहार व्यवहार की अपवित्रता को हमें समाप्त करना पड़ेगा तथा शुद्ध व सात्विक आहार व्यवहार को अपनाना पड़ेगा । अन्यथा जिन लोगों के मन व बुद्धि पर स्वयं अधिकार नहीं हो उन लोगों से समाज कल्याण की अभिलाषा कौन संजोयेगा तथा अगर कोई ऐसी अभिलाषा रखता है तो वह दुराशा ही सिद्ध होगी ।

- श्री देवीसिंह जी महार, 'हमारी भूलें' पुस्तक से साभार

भखरी ठाकुर केशर सिंह

भखरी ठाकुर केशर सिंह !!

जयपुर महाराजा जयसिंह किसी सैनिक अभियान मे मारवाड़ से होकर जा रहे थे,
तब ताना मारा की हमारी तोपे भरी हुई वापस जा रही है ?

अर्थात मेरे से मुकाबला करने का किसी राठौड़ मे साहस नही हुआ ।
यह बात जब भखरी ठाकुर केसरसिंह को मालुम हुई तो वह अपने गिने चुने सरदारों को साथ लेकर जयपुर कि विशाल सेना से भिङ गये और महाराजा जयसिंह का पूजा का हाथी उनसे छीन लिया ।

उस समय का कविता में वर्णन :-

"केहरिया करनाल, जेनह जुङतो जय साह सूं ।
तो मोटी अगवाल रहती, सिर मरुधरा ।।
शेखी जयपुर सेन री, भखरी मैं भागी रै ।
करगो टकरी केहरी, लंगर धर लागी है ।।

क्षत्रिय परिवार में चार जागरण की अनिवार्यता


क्षत्रिय के लिए शास्त्रों के अनुसार एक वर्ष में प्रत्येक क्षत्रिय परिवार में चार जागरण की अनिवार्यता बताई गई हैं !

1.कालरात्रि-
दीपावली की रात्रि है ।
महालक्ष्मी के साथ काली की प्रतिक काली स्याही की पूजा करे सा, जिससे दुष्ट शक्तियों व दुष्ट प्रवृत्तियों से रक्षा तथा लक्ष्मी की वृद्धि होती है सा ।


2 . मोहरात्रि -
कृष्ण जन्माष्टमी ही मोहरात्रि है सा ।इस रोज रात्रि जागरण से मोह का नाश होता है व परिवार विग्रह व कलह से बचता है सा ।

3.दारूणरात्रि-
होलिका की रात्रि दारूणरात्रि है सा ।इस रात्रि को जागरण से दुष्ट शक्तियों का प्रभाव क्षीण होता है सा ।

4.महारात्रि-
महाशिवरात्रि की रात्रि महारात्रि है ।इस रोज जागरण कर मध्यरात्रि में शंकर भगवान् का पूजन करने से परिवार में एकता स्थापित होती है
इस रात्रि जागरण में क्षत्रियोंचित संस्कारों के साथ अपने इष्ट के नाम(मंत्र) जप करते हुए रात्रि जागरण परिवार सहित करें सा, निश्चित रूप से परिवार में फर्क पडेगा ।

"जय क्षात्र धर्म "
" संघै शक्ति कलौ युगै "