Monday, 20 February 2017

हमारी भूले


जिन्होंने महाभारत ग्रन्थ पढ़ा है, वे शुक्राचार्य के इन वचनों को कभी नहीं भूल सकते- " जो मंद बुद्धि अपनी ना समझी के कारण मदिरा पीता है, धर्म उसी क्षण उसका साथ छोड़ देता है, वह सभी की निंदा व अवज्ञा का पात्र बन जाता है । यह मेरा निश्चित मत है । लोग आज से इस बात को शास्त्र मान लें और उसी पर चलें । "

इसी प्रकार बाल्मिकिय रामायण में अनेक स्थलों पर मधु मांस भक्षण का निषेध किया है । इन सब तथ्यों की अवहेलना कर आज हमने अपने आहार व व्यवहार को इतना अशुद्ध बना लिया है जिससे हमारे विकास की समस्त संभावनाएं क्षीण हो गयी है ।

अत: यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यदि हम अपने आपका व समाज का कल्याण चाहते है तो कुछ सौ वर्षों से आरम्भ हुई आहार व्यवहार की अपवित्रता को हमें समाप्त करना पड़ेगा तथा शुद्ध व सात्विक आहार व्यवहार को अपनाना पड़ेगा । अन्यथा जिन लोगों के मन व बुद्धि पर स्वयं अधिकार नहीं हो उन लोगों से समाज कल्याण की अभिलाषा कौन संजोयेगा तथा अगर कोई ऐसी अभिलाषा रखता है तो वह दुराशा ही सिद्ध होगी ।

- श्री देवीसिंह जी महार, 'हमारी भूलें' पुस्तक से साभार

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