Sunday, 31 December 2017

दिल्लीपति राजा कुमार देव तोमर

दिल्लीपति राजा कुमार देव तोमर
हांसी दुर्ग (21 दिसम्बर 1037 ई.)


मसूद गजनवी का आक्रमण

मसूद के इस आक्रमण का सामना दिल्लीपति कुमारपाल देव तोमर (1021-1051 ई.) की सेना ने किया।
मुस्लिम इतिहासकार बैहाकी लिखता है कि राजपूतों ने प्राणप्रण से युद्ध किया और अपनी कोशीश में कोई कमजोरी नहीं आने दी। यह दुर्ग उनकी वीरता के अनुरूप ही था ।

अंत में पांच जगह सुरंग लगा कर दीवारें गिरा दी गई और इसके बाद युद्ध हुआ जिसे जीत कर मुसलमानों ने दुर्ग पर अधिकार जमाया । हिन्दुओं की स्त्रियों और बच्चों को गुलाम बना लिया गया ।

विजय अभियान (1043 ई.) -
गजनी सुल्तान मैदूद को मार भगाने वाले कुमारपाल ने दूसरे राजाओं से मिल कर हांसी और आस-पास क्षेत्र से मुसलमानों को मार भगाया ।

नगर कोट कांगड़ा का घेरा -

अब ये भारत के वीरें ने कांगड़ा दुर्ग को मुसलमानों से मुक्त कराने हेतु चार महीने का घेरा डाला और अन्त में राजपूत इस युद्ध में सफल हुए और उन्होंने दुर्ग में पुन: मंदिरों की स्थापना की ।

लाहौर का घेरा -

कुमारपाल तोमर की सेना ने लाहौर को सात महीने घेरा। इतिहासकार गांगुली का अनुमान है कि इस अभियान में राजा भोज परमार, राजा कर्ण कलचुरी और राजा अनिहल चौहान ने सहायता दी थी। इतिहासकार अशोक कुमार मजूमदार के अनुसार सांभर के राजा दुर्लभराज चौहान तृतीय ने भी इसमें सहायता की थी ।

नगर कोट कांगड़ा का घेरा द्वितीय (1051 ई.)

गजनी के सुल्तान अब्दुर्रशीद ने पंजाब के सूबेदार हाजिब को नगरकोट जीतने का आदेश दिया। मुसलमानों ने दुर्ग का घेरा डाला और युद्ध शुरू हुआ। छठे दिन दुर्ग की दीवार टूटी और विकट युद्ध हुआ जिसमें इतिहासकार हरिहर निवास द्विवेदी के अनुसार राजा कुमारपाल देव तोमर युद्ध कर काम आया ।
अब रावी नदी गजनी और भारत के मध्य की सीमा बन गई ।

(सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध - डॉ. अशोक कुमार सिंह, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी की पीएच.डी. हेतु स्वीकृत शोध ग्रंथ, पृष्ठ 68–70)

Saturday, 30 December 2017

बूंदी राव सुर्जन हाड़ा बड़े धार्मिक, उदार बुद्धिमान प्रतापी नरेश

बूंदी राव सुर्जन हाड़ा बड़े धार्मिक, उदार बुद्धिमान प्रतापी नरेश-



राव सुरतान को बूंदी के सामन्तो ने हटाकर राव सुर्जन सिंह को गद्दी पर बैठाया । आरम्भ मैं यह अपनी माता जंयती के आदेशानुसार राज्य करते रहे । बाद में बूंदी के छीने हुये परगने को जीतने के लिये सेना एकत्रित की ।
इस सेना मैं उनके 20 जागीरदार भाई ओर अन्य राजपूत थे । सेना इक्कठी करके, कोटा पर शासन कर रहे मालवा के सुल्तान के प्रतिनिधि के रूप मैं 26 वर्ष शासन किया |
उन्होंने केसर खा ओर डोकर खा पठानों को हरा कर कोटा को वापस जीता जो मांडू के सुल्तानो के प्रभाव मैं था । माडु का सुल्तान वापस मुड़कर कभी नही आया । ओर अपने पुत्र भोज को सुपुर्द कर दिया ।
 राव सुर्जन ने रणथम्भौर ओर मालवा सिमा तक के आसपास के परगने अपने अधिकार मैं कर लिये। 

सगारथ झल्लन के हित सोध, 
बढ्यो मरुमाल महीप विरोध |
पदच्युत बुन्दियतें सुल्तान, 
दियो नृप सुर्जन को वह थान ||" 

अकबर ने चितोड़ विजय के बाद रणथम्भौर पर सेना भेज दी । हाड़ा सहज ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले नही थे ।।

रणथम्भौर अकबर के ध्यान में प्रारम्भ से ही बना हुआ था । उसने स्वयं आकर इसको घेर लिया । वह काफि समय इसकी अपराजेय प्राचीरों के समक्ष रहा पर उसे किले के समर्पण की आशा नही थी ।
अकबर से राव सुर्जन सिंह हाङा डेढ मास तक युद्ध किया । इससे पहले 13 बार मुस्लिम सेना हार का मुंह देख चुकी थी । इसलिए इस बार मुगल पुरी तैयारी के साथ आये थे ।

इस बार रणथम्भौर कि स्थिति नाजुक बन गयी थी तो पराजय का सेहरा ना बंधे यह सोचकर राजा मानसिंह आमेर ने बिच बचाव से राव सुरजन हाङा व अकबर के बिच संधि करवाई ।
उस समय संधि की सम्मानीय  शर्तें राव सुर्जन हाडा ने रखी ।  जिसकी मध्यस्थता तत्कालीन आमेर राजकुमार मानसिंह ने की । मानसिंह  कि हिन्दू भावनाओं का अच्छा दिग्दर्शन होता है इस संधि की मध्यस्थता से ।

जब सन्धि हुई तो रणथम्भौर के किलेदार सावत सिंह हाड़ा ने  स्वीकार नही किया और राव सुर्जन से  उनोने अकबर से य प्रमुख शर्ते रखवाई ।
"शर्तें ये थी -

1. बूंदी का सरदार उस रीति-रिवाज से मुक्त रखा जावेगा जिसे राजपूत अपमानजनक मानते हैं ।
2. जजिया कर से मुक्ति ।
3. बूंदी सरदारों को कभी भी अटक पार जाने के लिये बाध्य नही किया जावेगा ।
4. बूंदी सरदार इस बात से मुक्त रखें जाएंगे कि वे अपनी स्त्रियों या सम्बन्धिनियों को मीना बाजार में स्टाल लगाने भेंजे । यह स्टाल राजमहल में नौरोजा के अवसर पर लगायी जाती थी ।
5. वे दीवाने आम तक पूर्ण रुप से अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर जा सकेंगे ।
6. उनके पवित्र मंदिरों का आदर किया जायेगा ।
7. वे कभी भी हिन्दू नेता की कमान में नही रखे जावेंगे ।
8. उनके घोङो पर शाही दाग नही लगाया जाएगा ।
9. वे अपने नक्कारे को राजधानी की गलियों में लाल दरवाजे तक बजा सकेंगे और बादशाह के सामने उपस्थित होने पर सिज्दा करने से मुक्त रहेंगे ।
10. जैसे दिल्ली बादशाह के लिये वैसे ही बूंदी हाङा चौहानों के लिये होगी ।।

जो कुछ भी हुआ राव सुर्जन को लोभ लालच देकर अपने पक्ष मे किया गया ।। 

बादशाह ने राव सुर्जन को राव राजा की उपाधि ओर बनारस के निकट 26 परगने दिये।। बनारस मैं राव सुर्जन ने कई इमारते महल घाट बनवाय ।
अकबर के कृपापात्र होने के कारण राव सुर्जन ने हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिये बहुत सी सुविधाए दिलवाई ।
 
काशि मैं घाटों की इमारते ओर 20 जलाशय बनवाये । इससे इनकी बहुत यश वर्द्धि हुई । महाराणा उदयसिंह के साथ जब इनोने द्धारिका की यात्रा की उस समय वहां रणछोड़जी का मंदिर बहुत मामूली सा था ।
इससे राव सुर्जन ने महाराणा से आज्ञा लेकर नया मन्दिर बनवाया जो अब तक विधमान है | 
उनके जीवन का अंतिम समय काशी मैं ही बीता ओर वी.स 1642 मैं वही परलोक सिधार गए । काशी में मणिकणिका घाट के पास ब्रह्मनाल( मुहल्ला) के बीच उनके साथ सती होने वाली रानियों के चबूतरे बने हुये है ।

Source -
1. इतिहासकार जगदीश गहलोत 
2. वंश भास्कर 
3. सुर्जन चरित्र (सँस्कृत काव्य
4. कर्नल टॉड

Friday, 29 December 2017

राजा मानसिंह आमेर और रणथम्भौर

रणथम्भौर और राजा मानसिंह आमेर 



रणथम्भौर अकबर के ध्यान में प्रारम्भ से ही बना हुआ था । उसने स्वयं आकर इसको घेर लिया । वह काफि समय इसकी अपराजेय प्राचीरों के समक्ष रहा पर उसे किले के समर्पण की आशा नही थी ।
अकबर से राव सुर्जन सिंह हाङा डेढ मास तक युद्ध किया । इससे पहले 13 बार मुस्लिम सेना हार का मुंह देख चुकी थी ।
इसलिए इस बार मुगल पुरी तैयारी के साथ आये थे ।

इस बार रणथम्भौर कि स्थिति  नाजुक बन गयी थी तो पराजय का सेहरा ना बंधे यह सोचकर राजा मानसिंह आमेर ने बिच बचाव से राव सुरजन हाङा व अकबर के बिच संधि करवाई ।
उस समय संधि की सम्मानीय  शर्तें राव सुर्जन हाडा ने रखी ।  जिसकी मध्यस्थता तत्कालीन आमेर राजकुमार मानसिंह ने की ।
हिन्दू भावनाओं का अच्छा दिग्दर्शन होता है ।
"शर्तें ये थी -

1. बूंदी का सरदार उस रीति-रिवाज से मुक्त रखा जावेगा जिसे राजपूत अपमानजनक मानते हैं ।
2. जजिया कर से मुक्ति ।
3. बूंदी सरदारों को कभी भी अटक पार जाने के लिये बाध्य नही किया जावेगा ।
4. बूंदी सरदार इस बात से मुक्त रखें जाएंगे कि वे अपनी स्त्रियों या सम्बन्धिनियों को मीना बाजार में स्टाल लगाने भेंजे । यह स्टाल राजमहल में नौरोजा के अवसर पर लगायी जाती थी ।
5. वे दीवाने आम तक पूर्ण रुप से अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर जा सकेंगे ।
6. उनके पवित्र मंदिरों का आदर किया जायेगा ।
7. वे कभी भी हिन्दू नेता की कमान में नही रखे जावेंगे ।
8. उनके घोङो पर शाही दाग नही लगाया जाएगा ।
9. वे अपने नक्कारे को राजधानी की गलियों में लाल दरवाजे तक बजा सकेंगे और बादशाह के सामने उपस्थित होने पर सिज्दा करने से मुक्त रहेंगे ।
10. जैसे दिल्ली बादशाह के लिये वैसे ही बूंदी हाङा चौहानों के लिये होगी ।।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है राजा मानसिंह आमेर एक सनातन धर्म रक्षक शासक थे और वह सदैव राजपूत राजाओं के सहयोगी रहै ।।

लेखक - कर्नल टाड ।

चांदावत मेड़तिया |

चांदावत मेड़तिया |




वीरमदेव के पुत्र चांदा ने बाझाकुंडो की भूमि पर अधिकार कर वि.सं.1603 में बलुन्दा को आबाद किया । चांदा राव मालदेव की सेवा में रहे, मालदेव द्वारा मेड़ता पर आक्रमण करते समय चांदा उनके साथ में थे ।
मालदेव के भयभीत होने पर उन्होंने जोधपुर पहुँचाया । राव मालदेव ने उन्हें ऐक बार आसोप और रास का पट्टा भी दिया था ।

हुसेन कुलिखां द्वारा जोधपुर पर आक्रमण करने के समय चांदा चन्द्रसेन के पक्ष में लड़े । नागौर के सुबायत हुसेन अली से भी कई लड़ाइया लड़ी । नागौर के नवाब ने उन्हें धोखे से मारना चाहा । इस षड़यंत्र में चांदा तो मरे पर नवाब को भी साथ में लेकर मरे ।

बलुन्दा इनका मुख्या ठिकाना था, धनापो, दूदड़ास, सूदरी, कुडकी, डाभडो, खानड़ी, बडवालो, सेवरीयो, आजडाली, लाडपूरा, सुंथली, हासीयास, पूजीयास, लायी, मुगधडो, देसवाल, नौखा, नोवड़ी, ओलादण, गागुरडो, मागलियास, डोगरानो, अचाखेड़ो, रेवत, रोहल, छापर बड़ी, पीड़ीयो, रोहीना, बसी, सिराधनो, बाखलियाच, चिवली आदी ऐक ऐक गाँव के ठिकाने थे ।

मेवाड़ के शाहपुर राज्य में खामोर चांदावतों का ठिकाना था । ये बलुन्दा ठिकाने से शाहपुरा गए |

Thursday, 28 December 2017

हाड़ा राजवंश मूल पुरुष और मूल स्थान |

हाड़ा राजवंश मूल पुरुष और मूल स्थान |



हाडौती मैं हाड़ा शाखा का लंबा राज्य-काल रहा है और हाड़ावो के दो बड़े राज्य और 12 कोटरियात (एक प्रकार के छोटे राज्य) रहे है। बूंदी नरेशो के सरक्षण मैं तीन महाकाव्य लिखे गये है जिसमें वँश भास्कर सुर्जन चरित्र प्रमुख है ।पर सभी मैं अलग भिन्नताएं दिखाई पड़ती है।

हम सभी इतिहासकारो पर भिन्न भिन्न चर्चा करेंगे | 

1. कर्नल टॉड का वर्णन बड़वा गोविंदराम के राजग्रन्थ पर आधारित है। उसका सारांश इस प्रकार है कि वीसलदेव ( अजमेर का राजा ) के पुत्र अनुराज से हाड़ा शाखा की उतपति हुई। अनुराज को सीमावर्ती असीरगढ(हाशि ) नामक देश पर अधिकार था ।।

2.विरविनोद के कथन अनुसार के सार पर आधारित की सांभर के राजा सोमेश्वर के छोटे बेटे के उरथ की नोवी पीढ़ी मैं भोमचन्द्र हुआ ।उसका पुत्र भानुराज जुआ ।जिसका दूसरा नाम अस्थिपाल था ।उसके वँश मैं देव सिंह हुये जिनोने बूंदी मैं अपना राज्य स्थापित किया ।

3. वास्तव मे बूंदी के हाड़ा नाडोल के चोहान राजा आसराज के छोटे पुत्र और मणिक्यराज(माणिकराज) के वंसज है जैसा कि मुहणोत नेनसी की ख्यात ओर मेनाल से मिले हुये  बम्बावदा के हाड़ा के  वी.स. 1446 (ई.स. 1389) के शिलालेख से जान पड़ता है बूंदी के हाड़ा अपने मूल पुरूष हरराज से हाड़ा कहलाये।

4.राजपूत वंशावली मैं ठा. ईश्वर सिंह मडाढ़ के लिखितअनुसार चोहान वँश मैं भानुराज अस्थिपाल के नाम से प्रसीद्ध था।  अस्थि को हिंदी मैं हड्डी या हाड़ भी कहते है इसलिये अस्थिपाल के वंसज हाड़ा कहलाये।

5.इनके अतिरिक्त लल्लूभाई देसाई ओर जगदीश सिंह गहलोत आदि ने भी हाड़ावो को नाडोल के उपरोक्त आसराज के पुत्र मणिक्यराज से वंसज होना बताया ।

6. ठा. रघुनाथसिंह शेखावत ने नाडोल के आसराज( द्वितीय) (वी.स. 1167-1172) के पुत्र भानकयराज से भिन्न लक्षमण के पौत्र मणिक्यराज से हाड़ा राजवंश का प्रादुभाव होना अनेक प्रमाणों से सिद्ध किया है। और शेखावत साहब ने विवेचना करते हुये वंशावली दी  लिखा कि  भांणवर्धन ( भानुराज या सभरान ) नाडोल के लक्ष्मण के पुत्र आसराज( अधिराज, अश्वपाल ) के पुत्र माणिकराव ( मणिक्यराज)  का पुत्र था।इनके बाद कि वंशावली देते हुये 
3. अस्थिपाल 
4. चन्द्रकर्ण 
5.लोकपाल 
6. हम्मीर 
7. जोधराव
8.कलिकर्ण 
9.महामुग्ध 
10. राव वाचा
11. रामचन्द्र 
12. रेणसी
13.जेतराव
14.आसुपाल
15. विजयपाल
16. हरराज ( हाड़ा)
17. वांगा 
18. राव देवा

उपरोक्त विश्लेषण का निष्कर्ष यह है कि नाडोल शाखा का अस्थिपाल (भांणवर्धन ) ही हाड़ा शाखा का प्रथम- पुरुष हुआ  और नाडोल के निकट असी ( असीरगढ़ ,आसलपुर) दुर्ग ही हाड़ा वो का पाट स्थान रहा ।


मध्यकाल मैं जब से किलो की घेरा बन्दी करने प्रचलन चला तब से अपने युवकों को दुश्मन के ग्रास से बचाने हेतु किसी तरह खुपिया रास्ते से घेरे से बचाकर निकाल देते थे ।उनमें से कोई संतानो मैं योग्य हो जाता तो खोया राज्य वापस पुनः प्राप्त कर लेता था या नया राज्य बना लेता । इसी प्रकार हस्थीकुंडी  हाड़ा वो का प्रथम राज्य कुतुबुद्दीन के आक्रमण करने पर   राव चन्द (राम) ने रेणसी को घेराव से निकाल दिया । ओर 1253 मैं कुतुबुद्दीन ने हस्थीकुंडी पर आक्रमण करके सबको समूल परिवार के साथ सभी को मौत के घाट उतार दिया । ओर हाड़ा राज्य का अंत हो गया ।

उसके पीछे एक मात्र पुत्र रेणसी बच पाया । तब वहाँ के चोहान भीनमाल ओर सांचोर मैं जा बसे । रेणसी के जथे ने सांचोर के पास हाडेचा नामक कस्बे मैं पहला पड़ाव डाला। आज भी सांचोर मैं दो गांव हाड़ेचा, हाडेतर आज भी आबाद है ।
रेणसी जो चितोड़पति महाराणा का भांजा था वहाँ सुरक्षित पहुँचा दिया गया । चन्द्रावती था समस्त मरु प्रदेश मैं रेणसी के जथ्य को सुनहरा भविष्य द्रष्टिगोचर नही हुआ तो मेवाड़ जाना ठीक समजा।
   
रेणसी जब बड़ा हुआ तो उसने सबसे पहले भेसरोड गढ़ पर अधिकार किया, बाद मैं बम्बावदा पर अधिकार करके उसको राजधानी बनाया ।
आगे इनको पुत्रो ने मेनाल क्षेत्र पूरा जीत लिया।  
  
Note- आगे बूंदी कैसे जीता अगली पोस्ट मैं।

By- मनोज सिंह हाड़ा गगचाना 

राणा प्रताप व राजा मानसिंह आमेर



साभार पुस्तक - राजा मानसिंह आमेर ( भूमिका )


आधुनिक इतिहासकारों ने राणा प्रताप व राजा मानसिंह को कट्टर शत्रुओं के रुप में प्रदर्शित किया है । इस प्रकार के प्रदर्शन के पिछे या तो उनकी स्वयं कि हठधर्मी कारण रही है अथवा इतिहास के सम्यक् ज्ञान का अभाव । राजा मानसिंह मुसलमानों के इस्लामीकरण की योजना को जहाँ विफल कर स्वधर्म रक्षा के प्रयत्न में लगे हुए थे, वही पर राणा प्रताप स्वतन्त्रता की रक्षा में संलग्न थे । यह दोनों ही कार्य उस समय की अनिवार्य आवश्यकताएँ थीं । इसलिए समस्त राजपूत...ों का ही नही समस्त जनता का भी समर्थन इन दोनों महापुरुषों के साथ था ।


इस तथ्य के प्रबल प्रमाण यह है कि राणा प्रताप व राजा मानसिंह के समकालीन समस्त कवियों ने इन दोनों वीरों की वीरता व महिमा का समान रुप से बखान किया है । आमेर के राजाओं व राणा प्रताप के बीच उत्पन्न कटुता का कारण वैचारिक भिन्नता नहीं थी । मेवाड़ के राणा उदयसिंह ने अपने जीवन काल में ही अपने छोटे पुत्र जगमाल को अपना उतराधिकारी घोषित कर दिया था, किन्तु राणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद मेवाड़ के जागीरदारों ने जगमाल को राणा के रुप में स्वीकार नहीं किया व राणा प्रताप को शासक घोषित कर दिया । जगमाल ने उतराधिकार को प्राप्त करने के लिए अपने नजदीकी सम्बन्धी आमेर के राजा भगवन्तदास से मदद माँगी ।


आमेर के राजा ने न केवल जगमाल की मदद की बल्कि बादशाह अकबर से भी सहयोग दिलवाया । कुछ समय के संघर्ष के बाद जगमाल दाँताणी के युद्ध में मारा गया, तदोपरान्त आमेर के शासकों ने इस अध्याय को यहीं समाप्त कर दिया, किन्तु राणा प्रताप के मन में खटास समाप्त नहीं हूई, वही खटास हल्दीघाटी युद्ध का कारण बनी ।

सनातन धर्म रक्षक काशीराज महाराज जयचन्द

सनातन धर्म रक्षक काशीराज महाराज जयचन्द:-

काशीराज महाराज जयचंद के यश को कम करने व कुछ देश द्रोहीयों के नाम छुपाने के लिये षड्यंत्र के तहत जयचन्द जी का नाम बदनाम किया गया ।।
निम्नलिखित इतिहासकारों ने ऐतिहासिक ग्रन्थों व सभी लेखकों को पढ़ने के बाद महाराज जयन्द जी पर अपनी राय दि है ।।


डा. आर. सी. मजूमदार का मत है कि इस कथन में कोई सत्यता नहीं है कि महाराज जयचन्द ने पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये मुहम्मद गौरी को आमंत्रित किया हो ( एन्सेंट इण्डिया पृ. 336 डाँ. R.C. मजूमदार ) । अपनी एक अन्य पुस्तक में इन्हीं विद्वान इतिहासकार ने निमंत्रण की बात का खण्डन किया है ।।

J. C. पोवल प्राइस महोदय का मत है कि यह बात आधारहीन है कि महाराज जयचन्द ने मोहम्मद गौरी को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया । ( हिस्ट्री आफ इण्डिया ) ।

डा. रामशंकर त्रिपाठी का कथन है कि जयचन्द पर यह आरोप गलत है । उन्होंने माना है कि समकालीन मुसलमान इतिहासकार इस बात पर पूर्णतया मौन है कि जयचन्द ने ऐसा कोई निमंत्रण भेजा हो ।

श्री महेन्द्रनाथ मिश्र जो कि एक अच्छे इतिहासकार है ने जयचन्द के विरुद्ध देश-द्रोहीता के आरोप को असत्य माना है । उनका कथन है कि यह धारणा कि मुसलमानों को पृथ्वीराज पर चढाई करने के लिये आमंत्रित किया निराधार हे । उस समय के कपितय ग्रन्थ प्राप्य है किन्तु किसी में भी इन बातों का उल्लेख नहीं है । वे ग्रन्थ पृथ्वीराज-विजय, हम्मीर महाकाव्य, रम्भा- मन्जरी तथा प्रबन्ध-कोश किसी भी मुसलमान यात्री ने इसका जिक्र नहीं किया है । इतिहास साक्षी है कि जयचन्द ने चन्दावर में मोहम्मद गौरी से शौर्यपूर्ण युद्ध किया था ।

इब्न नसीर कृत "कामिल-उत्-तवारीख" में भी स्पष्ट कहा गया है कि, यह बात नितान्त असत्य है कि जयचन्द ने शाहबुद्दीन को पृथ्वीराज पर आक्रमण करने के लिये आमंत्रित किया । शहाबुद्दीन अच्छी तराह जानता था कि जब तक उतर भारत के महाशक्तिशाली जयचन्द को परास्त न किया जाएगा तब तक उसका दिल्ली और अजमेर आदि भू-भाग पर किया गया अधिकार स्थाई न होगा क्योंकि जयचन्द के पूर्वजों ने और स्वयं जयचन्द ने तुर्कों से अनेकों बार मोर्चा लेकर हराया था ।

स्मिथ महोदय ने अपने ग्रन्थ अर्ली हिस्ट्री आफ इण्डिया में इस आरोप का उल्लेख नहीं किया है । पृथ्वीराज की तराईन के दुसरे युद्ध में हुई पराजय का दोष जयचन्द पर नहीं लगाया है ।

डा. राजबली पाण्डे ने अपनी पुस्तक प्राचीन भारत टिप्पणी में लिखा है "यह विश्वास कि गौरी को जयचन्द ने पृथ्वीराज के विरुद्ध निमन्त्रण दिया था,(डा. त्रिपाठी के अनुसार ) ठिक नही जान पङता क्योंकि मुसलमान लेखकों ने कहीं भी इसका जिक्र नहीं किया है ।

हिस्ट्री आफ कन्नौज- डा. त्रिपाठी । इसका अर्थ यह है कि डा. पाण्डे ने डा. त्रिपाठी के कथन को सत्य माना है । वे पूर्णतः सहमत है क्योंकि उन्होंने प्रतिवाद नहीं किया ।

पंजाब के खोखर राजपूतों द्वारा देश रक्षा (1008 ई)

पंजाब के खोखर राजपूतों द्वारा देश रक्षा (1008 ई)

राजा आनन्दपाल शाही की सहायता महमूद गजनवी का चौथा आक्रमण -


काबुल अफगानिस्तान में राजा कल्लर ने 850 ई. में शाहीवंश की शुरूआत की थी । 870 ई. में मुसलमान तुर्क याकूब ने धोखे से काबुल जीत लिया था जिसके बाद शाही वंश की राजधानी उदभण्डपुर को बनाया गया। वहां कल्लर के बाद कमलुक, भीम, जयपाल राजा हुए जिन्होंने लगातार मुसलमानों से युद्ध किया ।

जयपाल के बाद आनन्दपाल राजा हुआ जिसके समय में महमूद गजनी ने भारत पर चौथा हमला किया। इस अवसर पर पंजाब के 30 हजार खोखर राजपूतों ने राजा आनन्दपाल की सहायता की थी । पहले हमले में महमूद ने 6 हजार तीरंजाद लगाए परन्तु बहादुर खोखरों ने देखते ही देखते 5 हजार मुसलमानों को मार गिराया । इस समय फरिश्ता लिखता है कि देश धर्म की रक्षा के लिए हिन्दू स्त्रियों ने अपने गहने और सोना बेच कर देश रक्षा की थी।

भारत के विरूद्ध इस युद्ध में अरब, तुर्क, अफगान और खिलजी मुसलमान लड़े। राजा आनन्दपाल के हाथी की नफथा की चोट लगी जिससे वह घायल होकर भाग । यह देख भारतीय सेना भी भागने लगी जिसका मुसलमानों ने पीछा किया और 20 हजार हिन्दुओं को मार गिराया और महमूद जीत गया ।

(सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध - डॉ. अशोक कुमार सिंह, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी की पीएच.डी. हेतु स्वीकृत शोध ग्रंथ, पृष्ठ 46)

महाराजा भोज परमार (1011-1055 ई.)

महाराजा भोज परमार (1011-1055 ई.)



धार, मालवा 1019 ई. में भोज ने आनन्दपाल शाही के पुत्र राजा त्रिलोचन पाल की महमूद गजनी के विरूद्ध सहायता की । दक्षिणी राजस्थान भोज के अधीन था । 1043 ई. में उसने भारत की रक्षार्थ हिन्दू राजाओं की सहायता में सेना भेजी जिसने मुस्लिम आक्रमणकारियों से हाँसी, थानेश्वर, नगर कोट को विजय किया और लाहौर का 7 मास तक घेरा दिया ।


भोज का उदयपुर शिलालेख किसी तोग्गल को हराने का उल्लेख करता है।
जी. बुहलर के अनुसार शायद वह कोई गजनी का सेनापति रहा होगा। (पूर्ववर्ती मुस्लिम अक्रान्ताओं का भारतीयों द्वारा प्रतिरोध डॉ. रामगोपाल मिश्रा पृष्ठ 104)


मुसलमानी आक्रमणों के विरूद्ध किए गए संघर्षों के लिए भोज की मृत्यु के बहुत बाद तक उन्हें गहड़वाल शिलालेखों में आदरपूर्वक स्मरण किया है। उसने धार में 'सरस्वती कंठाभरण' विद्यालय बनवाया था जिसे बाद में मुसलमानों ने तोड़ कर कमाल मौला मस्जिद बना दी थी।
इसके समय में गुरूड़ पुराण लिखा गया जिसमें सरस्वती की पूजा और गरूड़ शक्ति जगा कर कलि भुजंग विदेशी मुसलमान आक्रमणकारियों को नष्ट करने की शिक्षा दी गई।


भोज की सरस्वती प्रतिमा आजकल लन्दन में रखी है और वह सुन्दर है। सरकार ने भोपाल हवाई अड्डे का नाम राजा भोज एयरपोर्ट कर दिया है। (The Struggle for Empire- HTáîų fè ETT Hqit, gr&iš gerð 66)

सामंत गौरव - खिंव सिंह राठौड़


सामंत गौरव - "खिंव सिंह राठौड़"


चयन - RPS 39th rank

RAS marks
Paper 1- 96
Paper 2- 122
Paper 3- 91
Paper 4- 112


Total mains marks - 421/800
Interview -55/100 (R D Saini Board)
Total 476/900 marks


टीम सामन्त:-आपका परिचय?

खिंव सिंह राठौड़:- खिंव सिंह s/o श्री महेन्द्र सिंह राठौड़
गाँव - बालवा (नागौर)
10th 75%, 12th 65%
B.sc. जोधपुर यूनिवर्सिटी से
Masters in finance and business law नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी जोधपुर से.

सामन्त टीम:-इस परीक्षा की तैयारी की तरफ आपका आकर्षण क्यों हुआ ? कोई विशेष कारण या Turning Point ?
खिंव सिंह राठौड़:- पहले ही प्रयास में BSF में अस्सिटेंट कमांडेंट में चयन हुआ, वहां 3-4 साल फिल्ड में company commander की ड्यूटी के दौरान ऑफिस ड्यूटी ही रह जाती हैं और जिससे कुछ समय मिल जाता है तो सोचा की देश की रक्षा में 5 साल देने के बाद क्यों ना गृह राज्य में समाज सेवा की और रुख किया जाए इसलिए स्टेट PCS के बारे में सोचा.

सामंत टीम:-तैयारी आरम्भ करने के बाद अब तक का सफर कैसा रहा ?
खिंव सिंह राठौड़:- BSF की नौकरी बॉर्डर पर रहने और कश्मीर में 3 साल के समय में ड्यूटी के अलावा कहीं और कमिटमेंट ना होने से थोड़ा पढ़ाई करने का मौका मिल गया. मुख्य परीक्षा की तैयारी के दौरान कुछ दिन Springboard academy Jodhpur से श्री मनोहर सिंह जी महेचा के मार्गदर्शन से काफी मदद मिली. इंटरव्यू के लिए राजस्थान सिविल सर्विसेज के सीनियर अधिकारी श्री राजेन्द्र सिंह जी सिसोदिया, श्री R S. शेखावत जी, श्री महावीर सिंह जी का काफी सहयोग रहा.

सामन्त टीम:-इस सफलता से पहले की सफलताओं या असफलाओं का जिक्र ? 
खिंव सिंह राठौड़:- Graguation और PG में सुरक्षा बलो में जाने का आकर्षण था इसलिए CDS के लिए आवेदन किया. दो बार SSB interview भी दिए जिसमे सफलता नहीं मिली. UPSC के CPF AC में प्रथम प्रयास में ही सफलता मिलने पर उत्साह बढ़ा और उसी आत्म विश्वास से RAS की तैयारी की प्रेरणा मिली. BOB ग्रामीण बैंक में PO में भी चयन हुआ था पर वहां ज्वाइन नहीं की.

सामन्त टीम:-आपकी इस सफलता में कौनसे पहलु नींव के पत्थर साबित हुए ? किनका योगदान विशेष रहा ?
खिंव सिंह राठौड़:- स्कूल के दिनों में प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूल स्तर पर गाँव में शिक्षक श्री कर्ण सिंह जी राठौड़, श्री निम्बाराम जी और श्री चिरंजीत सिंह जी राठौड़ ने सामान्य ज्ञान में रूचि जागृत की और मेट्रिक में श्री मनोहर सिंह जी सलेउ द्वारा पढ़ाई गई गणित भविष्य में नींव का पत्थर साबित हुई. NLUJ के बैचमैट अवि प्रसाद (IAS MP कैडर) ने प्रतियोगिता पढ़ने का सही तरीका बताया. परिजनों द्वारा लगातार हर स्तर पर उत्साहित करने और सतत प्रेरणा देने से, गुरुजनो द्वारा बेसिक एजुकेशन में मेहनत, स्प्रिंगबोर्ड academy के मनोहरसिंह महेचा, उनकी टीम और गूगल गुरु की मदद से समाज सेवा का अवसर हासिल हुआ.

सामंत टीम:-कितने घंटे पढते थे व आपके अनुसार एक सामान्य विद्यार्थी को इस परीक्षा में सफल होने के लिए कितने समय की पढाई दैनिक रूप से अवश्य करनी चाहिए ?
खिंव सिंह राठौड़:- प्रतिदिन घन्टे या दिन के बजाय सैलेबस के अनुसार पढ़ाई करना और टॉपिक्स को समझना ज्यादा बेहतर हैं और समय की बचत के लिए इंटरनेट बेहतर सहयोगी हैं. इसके लिए जब भी अवसर मिले जितना भी मिले पढ़ लिया जाए. टॉपिक्स को डिवाइड करके पढ़ा जाए और रिवीजन के लिए कैच पॉइंट्स को लिख लिया जाए. जिससे समय की बचत होती हैं. ज्यादा पढ़ने की बजाय जो पढ़े अच्छा पढ़े और अच्छे से पढ़े.

सामंत टीम:-मेहनत व भाग्य पर विचार ?
खिंव सिंह राठौड़:- मेहनत और भाग्य एक दूसरे के सहयोगी हैं उन्हें अलग नजरिए से देखने की बजाय सतत प्रयास में लगा रहना ज्यादा बेहतर हैं. बजाय निराश होने के आगे बढ़ते रहे. महावीर सिंह जी रणसीसर जोधा के प्रयास इसकी एक मिसाल हैं.

सामंत टीम:-बहुत से लोग आरक्षण की वजह से अपना मनोबल बहुत कम कर लेते हैं और मेहनत ही नहीं करते उनके लिए क्या कहना चाहते हैं ?
खिंव सिंह राठौड़:- जातिगत आधार पर आरक्षण एक कड़वी हकीकत हैं और निकट भविष्य में भी यह दुर्भाग्यपूर्ण सच्चाई बनी रहेगी. इसलिए बजाय इससे परेशान होने के हमे इससे परे सफलता हासिल करनी हैं. जब तक किसी एग्जाम में एक भी सीट जनरल के लिए उपलब्ध हैं तो "वो सीट मेरे लिए हैं" इसी जज्बे के साथ प्रयास करने हैं. टोटल नम्बर ऑफ सीट की बजाय जनरल कैंडिडेट्स जनरल कोटा को ही टोटल सीट मान कर तैयारी करे. 51% को ही 100% मानकर प्रयास करे और पुरे 51% पर अपना अधिकार करे. आरक्षण या किसी अन्य कारणो से प्रयास ना छोड़े जो भी मिले उस अवसर को ले और अगले की तैयारी करे.

सामंत टीम:-आप युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत हैं इसलिए समाज व राष्ट्र के छोटे भाई बहनों को आपका संदेश ?
खिंव सिंह राठौड़:- देश समाज को सक्षम बनाने के आपके आजके प्रयास देश एवं आने वाली पीढ़ियों का भविष्य तय करेंगे, खुद सफल बने, दुसरो को सफल बनाए. आपकी सफलता दुसरो के लिए भी हो. निज स्वार्थ की बजाय देशहित और समाजहित में कार्य करे और जिस भी फिल्ड में आप हैं वहां से इस दिशा में सहयोग दे. देश और समाज के परे हमारा कोई अस्तित्व नहीं हैं. किसी भी स्तर पर किसी से भी सहयोग लेने और देने में ना हिचके.

सामन्त टीम:-कुछ विचार अपनी मर्जी से जो भी आप शेयर करना चाहें । अपने संघर्ष के बारे में या तैयारी के तरीकों के विषय में ? आध्यात्म के विषय में आपकी अपनी रूचियों के विषय में ? अपनी अच्छी बुरी आदतों के विषय में?
खिंव सिंह राठौड़:- आस्था और विश्वास संतुलित मन की कुंजी हैं. योग पूर्वजो का संचित ज्ञान हैं इसलिए हो सके तो योग एवं खेल का सहारा लेकर, स्वस्थ तन और स्वच्छ मन से प्रयास करे.

सामंत टीम:- सामंत पेज के लिए कोई विचार या सुझाव?
खिंव सिंह राठौड़:- क्लोज ग्रुप बनाए जिसमे जरुरतमंद होनहार युवाओ की आर्थिक मदद की जाए. सेलेक्ट हो रखे समाज के सरकारी कर्मचारी एक महीने की सैलेरी का सहयोग दे. इसमें पैसे देने वाले समाज के लोगो एवं फायदा लेने वालो का ब्यौरा हो समाज के अलग अलग वर्ग के लोग ट्रस्ट के द्वारा इस पैसे के खर्च एवं लेनदेन की देखरेख करे.

ज्यादा से ज्यादा शेयर करे ताकि तैयारी करने वाले नौजवान साथी प्रोत्साहित हो सके |

महमूद गजनवी का आक्रमण देरा और थानेश्वर के युद्ध 1012 ई.

महमूद गजनवी का आक्रमण देरा और थानेश्वर के युद्ध 1012 ई.


महमूद गजनवी ने सुना कि हिन्दुओं के लिए थानेवश्वर का वही स्थान है जो मुसलमानों के लिए मक्का का। उसने सुना कि वहां अथाह धन सम्पत्ति और बहुत सी देवमूर्तियां हैं जिनमें जगसोम की मूर्ति भी है जो सृष्टि की उत्पति के समय से है।

इस कारण वह धन लूटने और मंदिरों को तोड़ने रवाना हुआ । मार्ग में सतलज नदीं जहां पहाड़ों से निकलती है वहां देरा नाम का राज्य था और राम वहां का राजा था । देरा शायद आज का कांगड़ा जिले का देरा गोपीपुर या जुबल राज्य की राजधानी देवहरा है।

राजा राम की सेना ने बहुत बहादुरी दिखाई पर वह हार गई। मुहम्मद नाजिम कहता है कि यद्यपि महमूद जीत गया पर उसकी हानि हारने वालों से ज्यादा हुई।

थानेश्वर का युद्ध -

राजा जयपाल देव तोमर की सेना से महमूद का जो थानेश्वर में युद्ध हुआ उसके लिए मुस्लिम इतिहासकार उत्बी लिखता है कि इस युद्ध में हिन्दू काफिरों के रक्त से नदी का जल लाल हो गया और पीने योग्य नहीं रहा । यदि रात नहीं हो जाती तो उनमें से अधिकांश मार दिए जाते।
थानेश्वर में महमूद ने सारे मंदिर तोड़ अपार धन लूटा और जगसोम की मूर्ति को भी साथ ले गया ।

(सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध -डॉ. अशोक कुमार सिंह, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी की पीएच.डी. हेतु स्वीकृत शोध ग्रंथ, पृष्ठ 48)

राजपूत क्षत्रिय शाही राजवंश - राजा त्रिलोचनपाल शाही

राजपूत क्षत्रिय शाही राजवंश - राजा त्रिलोचनपाल शाही

महमूद गजनवी का नन्दना पर आक्रमण (1014 ई.)


जब नन्दना के राजा त्रिलोचनपाल शाही को महमूद के अभियान की सूचना मिली तो उसने अपने राजकुमार भीमपाल (निडर भीम) और अनुभवी सेनापति को राजधानी में छोड़ स्वयं कश्मीर के राजा संग्राम राज (1003-1028 ई.) से सहायता लेने चल पड़ा ।

जब महमूद की सेना नन्दना के पास पहुंची तो राजकुमार भीमपाल ने अपने सैनिकों और हाथियों को लिया और पहाड़ के मर्गला घाटी को बन्द कर दिया और सैनिकों को पहाड़ों के ऊपर तैनात कर दिया ।
अब युद्ध शुरू हो गया और कई दिनों तक चलता रहा। तभी भीमपाल की सहायता में और सेना आ गई जिसके कारण उत्साहित होकर भीमपाल ने मैदानी युद्ध के लिए अपनी सेना को मैदान में उतार दिया ।

इसके कारण तुकों को अपने घुड़सवारों की सेना के उपयोग का अवसर मिल गया । भीमपाल के हाथी जब आगे बढ़ते तो मुसलमान उन पर तीर चलाते । मुसलमानों का अग्रिम सेनापति भौमपाल की सेना से बुरी तरह घिर गया और वह घायल हो गया परन्तु उसकी सहायता में एक सैनिक दस्ता आया जो उसे बाहर निकाल ले गया । इस प्रकार युद्ध चलता रहा और अन्त में भारतीयों की हार होने लगी। इसे जान भीमपाल ने कुछ सेना नन्दना के दुर्ग में छोड़ी और स्वयं कश्मीर की ऒर रवाना हो गया

महमूद की सेना ने नन्दना दुर्ग को जा घेरा और कुछ दिन तक संघर्ष चला परन्तु फिर दुर्ग रक्षकों ने समर्पण कर दिया । महमूद को दुर्ग में बहुमूल्य सम्पति मिली ।

नन्दना जीत कर महमूद त्रिलोचनपाल के पीछे कश्मीर अभियान पर गया । कश्मीर के राजा संग्रामराज ने अपने मंत्री तुंग के साथ एक बड़ी सेना त्रिलोचनपाल के साथ रवाना की । त्रिलोचनपाल सुरक्षात्मक युद्ध और पहाड़ी युद्ध चाहता था पर मंत्री तुंग घमण्डी था उसने छोटे से सैनिक दस्ते को लेकर तोही नदी पार की और महमूद के अग्रिम दस्ते को मार लिया ।
त्रिलोचनपाल ने तुंग को फिर समझाया पर तुंग नहीं माना । अब महमूद ने स्वयं आक्रमण किया जिसके आगे तुंग हार गया परन्तु त्रिलोचनपाल फिर भी लड़ता रहा । कल्हण की राजतरंगिणी में स्वदेश भूमि की रक्षा में महान राजा त्रिलोचनपाल के पराक्रम और शौर्य की बहुत प्रशंसा लिखी है।त्रिलोचनपाल युद्ध में अकेला घिर गया था फिर भी वह रणकौशल से घेरे के बाहर निकल आया ।

उसके साथ जयसिंह, श्रीवर्धन और विभ्रमार्क नाम के तीन वीर यौद्धा युद्ध करते रहे परन्तु आखिरकार महमूद जीत गया और शाही राजवंश का सारा राज्य उसके अधिकार में आ गया । त्रिलोचनपाल ने फिर भी हिम्मत रखी और उसने पंजाब के पूर्व में शिवालिक पहाड़ों मे हस्तिनापुर को अपनी नई राजधानी बनाया ।

सरबल दुर्ग पर महमूद का आक्रमण (1019 ई.)

अब पहमूद कालिन्जर के विद्याधर चंदेल के विरूद्ध गजनी से चला। मार्ग में उसने राहब नदी पर सरबल दुर्ग पर अधिकार किया और वह नदी के पश्चिमी तट पर पहुंचा । यह देख राजा त्रिलोचनपाल शाही ने सेना और हथियार लेकर उसे नदी पार नहीं करने दी परन्तु प्रयास होता रहा और अन्त में महमूद की सेना ने नदी पार कर ली।
इसके बाद महमूद ने त्रिलोचनपाल पर आक्रमण किया । घमासान युद्ध के बाद महमूद जीत गया और उसे 70 हाथी मिले । बहुत से भारतीयों को उसने बन्दी बना लिया ।

जब त्रिलोचनपाल ने संधि का प्रस्ताव किया तो महमूद ने उसके सामने इस्लाम स्वीकार करने की शर्त रख दी जिसे राजा ने अस्वीकार कर दिया और वह कालिन्जर के चन्देल राज की और निकल पड़ा ।
1021 ई. में दुर्भाग्य से मार्ग में अज्ञात लोगों ने शायद उससे धन के लोभ में हत्या कर दी । 1026 ई. में त्रिलोचनपाल के पुत्र राजा भीमपाल भी संघर्ष करते-करते काम आये ।

राजा कुलचन्द यदुवंशी - महावन, मथुरा 1018 ई.

राजा कुलचन्द यदुवंशी
महावन, मथुरा 1018 ई.



यहां राजा कुलचन्द यदुवंशी का मथुरा के पास यमुना पट पर राज्य था ।
उसने महमूद गजनवी के आक्रमण का वीरता से सामना किया ।
मुस्लिम सेना का दबाव बढ़ने पर भारतीय सेना यमुना नदी पार करने लगी तब,
50 हजार भारतीय या तो मारे गये या डूब गये।

राजा कुलचन्द ने अपनी रानी की हत्या करके आत्महत्या कर ली।
इस युद्ध में महमूद को अपार धन और 185 हाथी मिले ।


(सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध - डॉ. अशोक कुमार सिंह,
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी की पीएच.डी. हेतु स्वीकृत शोध ग्रंथ, पृष्ठ 52)

रामप्रसाद बिस्मिल तंवर राजपूत

रामप्रसाद बिस्मिल तंवर राजपूत |



रामप्रसाद बिस्मिल तंवर राजपूत थे,
जिनका बिना शोध किये लेखको ने ब्राह्मण बना डाला !


इनका नाम रामप्रसाद सिंह था इनके दादा नारायण सिंह तंवर मुरेना जिले के रूअर बरवाई गांव से थे !
इनके पिता मुरली सिंह का विवाह जोधपुरा गांव जिला आगरा के परिहारो के यहा हुवा !

बिस्मिल की बहिन शास्त्री देवी उतम नगर दिल्ली में रहती है जो कौशिमा मैनपुरी के जादवो को ब्याही थी !
बिस्मिल का भानजा हरिशचंदर सिंह उतम नगर दिल्ली में रहता है !
संकटकाल में नारायण सिंह जी ने गांव छोड़ दिया !
और नारायणदत नाम से मंदिर में रहने लगे !
इसी समय जलियावाला बाग हत्या कांड हुवा तब रामप्रसाद सिंह ने एक शेर लिखा ......!

" ये फ़क्त इस जुर्म से तुझको गाफिल क्या मिला।
नीम ' बिस्मिल ' छोड़ने से तुझको हासिल क्या मिला।"

इसी समय रामप्रसाद सिंह बिस्मिल के नाम से जाने-जाने लगे !

राजा सुहेलदेव - शाभून राज्य (सालार मसूद गजनवी का आक्रमण-14 जून, 1033 ई.)

राजा सुहेलदेव - शाभून राज्य
राजा हरदेव - बलुना राज्य
बहराइच जिला गौंडा, उत्तर प्रदेश





सालार मसूद गजनवी का आक्रमण-14 जून, 1033 ई.


सालार मसूद महमूद गजनवी का भाणजा था । उसने एक बड़ी सेना के साथ बहराइच क्षेत्र में प्रवेश किया ।
उस समय उस क्षेत्र में अनेक राजा थे उनमें सबसे योग्य राजा कल्याण थे।
इन राजाओं ने सालार को दूत भेज कर कहलाया कि यह हमारा देश है और तुम विदेशी हो, अतः तुम्हें यहां से चले जाना चाहिए।
मसूद ने उत्तर दिया कि देश अल्ला का है जो मुझे निकालना चाहे लड़ कर निकाल दे ।

राजाओं ने कहा यह तो ईश्वर के नाम का दुरुपयोग और नाजायज इस्तेमाल है अत: उन्होंने युद्ध का निश्चय किया ।


मिराते मसूदी का लेखक लिखता है कि भारतीयों ने 5 हजार लोहे के कांटेदार गोले बना कर युद्ध भूमि में बिछा दिये जिससे विरोधी सेना के घोड़ों के पैर बेकार हो जाए। उन्होंने बारूद के ढेरों के आग लगा कर भयंकर आवाज करने की भी व्यवस्था की ।


जब युद्ध हुआ तो दोनों ओर के हजारों वीर मारे गए और कोई निर्णय नहीं हुआ । मुस्लिम सेनापति सालार सौफुद्दीन मारा गया ।
उनकी दो-तिहाई सेना नष्ट हो गई। इतनी देर में भारतीय सेना की रिजर्व सेना जो राजा सुहेलदेव और राजा हरदेव की कमाण्ड में थी,
उसने सालार मसूद जो अपने अंगरक्षकों के घेरे में था पर जोरदार धावा बोल दिया । बाणों को ऐसी झड़ी लगाई कि सालार मसूद मौके पर ही ढेर हो गया। उसके मरते ही तुर्क पलायन कर गये ।

इस युद्ध में निम्नलिखित भारतीयों के नाम मिराते मसूदी ने दिए हैं -
राजा राइब, राजा साहब, राजा अर्जुन, राजा भीकन, राजा जनक, राजा कल्याण, राजा मकरू, राजा सकरु, राजा कर्ण, राजा बीरबल, राजा जयपाल,
राजा श्रीपाल, राजा हरपाल, राजा हरकू, राजा प्रभू, राजा देवनारायण, राजा नरसिंह ।

सालार मसूद की कब्र बहराइच में मौजूद है ।

(भारत का इतिहास - भाग द्वितीय, इलियट डौसन मिराते मसूदी, परििशष्ट –जी)