Saturday, 23 December 2017

सोरठ

सोरठ

रायचन्द देवड़ा सांचौर का स्वामी, सांचौर अच्छा बड़ा राज्य। राज्य की सवा लाख की आबादी, उसमें बावन तहसीलें, सैकड़ों नौकर, रानियों के पचासों दासियाँ सैकड़ों हाथी, घोड़े, ऊँट।
राजा को सब प्रकार का आनन्द, जनता को सब प्रकार का सुख, न चोरी, न डाका, न लूट। राजा की एक रानी गर्भवती। एक रात उसने पुत्री को जन्म दिया। सुबह राजपंडित लड़की की जन्म-पत्री बनाने महल में हाजिर हुआ। पंडितजी ने पंचांग देखा, ज्योतिषशास्त्र की किताबें खोली। जोड़ लगाया, बाकी निकाली, राशियाँ मिलायीं, नक्षत्र देखे। इधर का उधर, उधर का इधर किया। लेकिन नतीजा वही।
हाथ जोड़ राजा को अर्ज की, 'अन्नदाता, बाई का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ है, और वह भी पहले पहर में। इस नक्षत्र में जो भी पैदा होता है, वह अपने पिता के लिए घातक और राज्य के लिए घोर अनिष्कारी होता है।'

'आपने दूसरे पंडितों से भी इसके बारे में मंत्रणा की है?"
'अन्नदाता, दूसरे विद्वानों को भी मैने पूछ लिया है। उनकी राय भी मेरी राय से मिलती है।'
'तो फिर इस बच्ची का क्या किया जाए?'
मैं तो इतनी अर्ज कर सकता हूँकि इस बच्ची को हमेशा के लिए इस राजमहल और राज्य से हटा देना चाहिए।'
'कोई दूसरा रास्ता नहीं निकल सकता?" 'नहीं महाराज।' सिर नीचा किए हुए राजपंडित बोले। रायचंद ने हुकम दिया कि बच्ची को मार दिया जाए। सनी रोती हुई रायचंद के पैरों में आ पड़ी, 'बेचारी एक दिन की ही तो बच्ची है, उसे जीवनदान दीजिए।'

रायचंद अडिग रहा, 'मेरा राज्य और मेरा जीवन इस लड़की के जीवन से अधिक मूल्यवान है।"
रानी बहुत रोयी, चिल्लाई, हाथ-पैर जोड़े और रायचंद को इस बात पर मना लिया कि बच्ची केा जान से नहीं मारा जाए, उसे एक पिंजरे में रखकर नदी में बहा दिया जाए। "आप जीव-हत्या के पाप से बच जाएँगे, और बच्ची भगवान के यहाँ से लेख लिखाकर आयी है, वह जाने और उसका ईश्वर। वही मारने वाला है, वही बचाने वाला।' बच्ची । नदी में अहा दिया गया।


नदी शांत रूप से बह रही थी। उगते सूरज की किरणें उसके पानी से खेल रही थीं। नदी के किनारे रखे सपाट पथ्तर पर रामू धोबी पछाट-पछाट कर कपड़े धो रहे रहा था ! थकी कमर को सीधी करने रामू ने सिर उठाया तो उसे नदी में बहती हुई कोई चीज नजर आयी ! जब सूरज की किरणे उस चीज को छुय तो वह चमकने लगे ! पास ही चंपा कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिट्टी खोद रहा था ! रामू ने चंपा को आवाज लगायी, "देख नदी में कोई चीज बहती आ रही है !"


चंपा ने नदी की और देखा "मुझे तो कोई पिंजरे जैसी चीज दिख रही "है, चल उसे निकले !
रामू बोला, "पिंजरा मेरा, अन्दर वाली चीज तेरी !"
दोनों ने अपनी धोतियाँ ऊँची उठायी, पानी में कूद गये, देखा तो पिंजरा, पिंजरा खोला तो अंदर रुई में लिपटी एक लड़की, जैसे गुलाब का फूल !

रामू बोला - कौन ऐसा हत्यारा बाप होगा, कोन ऐसी वज्र छाती वाली मां होगी ! लगती तो किसी बड़े घर की है, तभी ऐसे कीमती सोने के पिंजरे में इसे डाला, लेकिन बेचारी को बहाया क्यों ?"
चंपा बोला, "भगवान कि इच्छा है ! मेरे कोई बच्चा नहीं है, भगवान को मेरे घर वाली की गोद भरनी थी !"
चंपा भागता भागता घर गया, अपनी स्त्री को बुला, रुई कि पोटली उसे दी, "ले भगवान ने भेजी है इसे पाल पोसकर बड़ा कर !"
कुम्हारी ने लड़की को छाती से लगाया, मातृ-प्रेम से उसके स्तनों में दूध उतर आया !


ईश्वर की कुदरत। सांचौर के राजा की लड़की चंपा कुम्हार के घर में। चंपा अपनी स्त्री से कहता ही न थके, 'सारे सोरठ देश में तू कहीं भी घूम आ, ऐसी सुन्दर लड़की तुझे नजर नहीं आएगी। सोरठ देश का सारा रूप इसी में आ समाया है।'
चंपा ने लड़की का नाम रखा सोरठ। सोरठ बड़ी होने लगी जैसे शुक्ल पक्ष का चन्द्रमा। चंपा कुम्हारी को हमेशा समझाता रहे, सावधान करता रहे, 'कितनी बार तुझे कहा है इसे दरवाजे पर मत जाने दिया कर, किसी से बात मत करने दिया कर। क्या मालूम कब किसी राजा की, अमीर आदमी की नजर इस पर पड़ जाये। अनर्थ हो जायेगा। हम रहे कुम्हार, छोटी जाति के। न हाँ कहने की बनेगी, न ना कहने की। तू तो इसे घर से बाहर निकलने ही मत दिया कर।'
लेकिन चंद्रमा कितने दिन बादल के पीछे छिपाया जा सकता है।


एक दिन गिरनार का राव खंगार अपने भानजे बाँझा के साथ शिकार खेलता चंपा कुम्हार के गाँव आ निकला। सहेलियों के साथ सोरठ भै। राव खंगार की सवारी देखने उसके डेरे के पास चली आयी। लड़कियों के झुंड में सोरठ ऐसी चमक रही थी जैसे तारिकाओं के बीच चाँद। बाँझा की नजर सोरठ पर पड़ी और वहीं की वहीं अटक गयी।
सोरठ थाने देखिया, जांझा झूलर माँही
   जॉणे  चमके बीजळी, गुदव्छे बादल माँहे।”
(सोरठ लड़कियों के झुंड में ऐसे चमक रही है जैसे किसी धुंधले बादल में बिजली चमक रही हो।)

राव खंगार का घोड़ा बीस कदम आगे निकल गया, पीछे घूमकर देखा तो बांझा तो वहीं अटका खड़ा है। उसने अपना घोड़ा वापस किया। राव खंगार को आते देख, बींझा सोरठ की तरफ इशारा करके बोला, 'इस छोकरी का मोल करूं?'
घर पर सोरठ को न पाकर चंपा कुम्हार की स्त्री सोरठ को ढूँढ़ने आयी। उसने बींझा को सोरठ को घूरते देखा तो सोरठ को हाथ पकड़ अपने साथ खींचती घर ले गयीं।बींझा ने अपना सिर धुन लिया, 'इसको तो मुँह-माँगा धन देकर अपना बनाना चाहिए।'

राव खंगार ने हाँ भरी।
सोरठ का पता-ठिकाना पूछ राव खंगार और बाँझा दोनों चंपा कुम्हार के घर पहुँचे, सोरठ को उससे माँगा।
चंपा ने कहा, 'पृथ्वी का राज भी दे दो, तो भी मैं अपनी बेटी को नहीं बेच्चूंगा।' 'बेचने के लिए कौन कहता है। गढ़ गिरनार का राजा हूँ, इससे शादी करूंगा।"
चंपा कुम्हार ने हाथ जोड़े, 'शादी-विवाह तो अपनी बराबरी वालों के साथ होते हैं। आप राजा हो, मैं कुम्हार। आपके दूसरी भी रानियाँ हैं, कल वे मेरी बेटी को ताने देंगी, बोल सुनायेंगी। कहेगी, "इस कुम्हार की बेटी को हमारे से दूर रखो।'

राव खंगार और बाँझा ने चंपा को बहुत समझाया, लालच दिया, ऊँचा-नीचा लिया, लेकिन चंपा तो अडिग रहा, 'अपनी बेटी की शादी अपनी बराबरी वाले से ही करूंगा।'

राव खंगार और बांझा वापस गिरनार लौट गए लेकिन बाँझा के दिल पर सोरठ की छवि ऐसी उतर गयी कि निकले नहीं निकली, मिटाए नहीं मिटती। दिन-रात वह यही सोचता रहे कि सोरठा को कैसे प्राप्त करूं ।
इधर चंपा कुम्हार को फिकर लग गयी। सोरठ बड़ी हो गयी, गिरनार के राजा से तो किसी तरह पिंड छुड़ाया, लेकिन इस देश में राजाओं, की अमीरों की क्या कमी। कोई कभी भी आ टपके। किस-किस से मैं सोरठ को और अपने को बचाऊँगा। मैं रहा गरीब आदमी, गरीब की ताकत कितनी ? पहुँच कितनी। वे होंगे बड़े आदमी, जिनकी बड़ी ताकत, लम्बी पहुँच। सोरठ की शादी जल्दी कर देना चाहिए, मनचलों की भीड़ आने लगी और बदनामी होने लगी तो इसके लिए वर वर ढूँढ़ना मुश्किल हो जाएगा।

होनहार की बात, बनजारों का मुखिया राव रूढ़ सांचौर से गिरनार जाता, रास्ते में चंपा के गांव रुका। लखपति बनजारा, खूब धन, हजारों बैलों पर उसका माल लदा रहे, करोड़ों का व्यापार।
चंपा ने सोचा, 'राव रूढ़ से सोरठ की शादी की बात करूं । है तो बहुत ज्यादा धनवान लेकिन जाति में बराबर पड़ता है। फिर मेरा धन सोरठ उसके धन से कोई कम है !” चंपा ने राव रूढ़ से बात की, रूढ़ ने सोरठ को देखा। सोरठ को एक बार देखने के बाद कौन मना कर सकता है! राव रूढ़ के साथ सोरठ की शादी हो गयी। उसने लकड़ी का एक जालीदार महल बनवाया, जालियों में रेशम और मखमल के पर्दे लगवाए। महल के नीचे चार बड़े-बड़े पहिए और महल को खींचने के लिए छ: नागौरी बैल जोड़े। सोरठ को उस महल में बैठाया। राव रूढ़ जहाँ भी जाए, सोरठ का महल भी उसके साथ चले।
बांझा को सोरठ की शादी की खबर मिली। पहले तो दु:ख हुआ। फिर खुश हो सोचा कि बनजारे तो जगह-जगह घूमते ही रहते हैं, कभी-न-कभी राव रूढ़ गिरनार तो आयेगा ही ।
गिरनार का सघन वन, झाड़ी-से-झाड़ी अड़ रही। कल-कल करते झरने बह रहे। पहाड़ों में बब्बर शेर दहाड़ रहे, पहाड़ों की गुफाओं में साधुओं की धूनियाँ जल रही। आधी रात का समय, जुगनू एक डाल से दूसरे डाल पर जा रहे जैसे छोटे-छोटे तारे आकाश में टिमटिमा रहे हों। रिमझिम-रिमझिम करती हल्की फुहारें पड़ रहीं। बीझाँ अपने महल के सबसे ऊँचे मालिये पर बैठा सोरठ के बारे में सोच रहा। पहाड़ से आती हुई बैलों के गले में बँधी घंटियों की आवाज उसे सुनायी पड़ी। वह चौंका। कहीं राव रूढ़ की वालद तो नहीं आ रही है? थोड़ी देर बाद उसे मशालें जलती नजर आयीं। सवार को दौड़ाया, 'देखकर आ, गिरनार पहाड़ पर क्या हलचल हो रही है?"

सवार खबर ले वापस आया, 'किसी बनजारे की वालद है। हजारों बैल है, लकड़ी के महल में उसकी स्त्री भी साथ है।'

बींझा समझ गया, राव रूढ़ की वालद है। जाकर राव खंगार को जगाया, 'राव रूढ़ आ रहा है।' राव खंगार ने आधी रात नगर कोतवाल को बुला हुक्म दिया, 'वालद को अच्छे स्थान पर ठहराना, डेरे-तम्बू का इन्तजाम कर देना, किसी चीज की उन्हें तकलीफ न हो।'

उधर जगह साफ हो रही है, डेरे-तम्बू लग रहे, खाने-पीने का इन्तजाम हो रहा, इधर बांझा को नींद कहाँ। कब दिन निकले, कब मैं राव रूढ़ के डेरे पहुचूँ।
पौह फटी, सोरठ की नींद उड़ी। मखमल का पर्दा हटा उसने जाली से झाँका। उसी वक्त बांझा भी बनजारे के डेरे पहुँचा। बांझा और सोरठ की नजर मिली, पुसनी मुलाकात याद आयी। एक-दूसरे को देखते ही रहे, एक ने दूसरे के दिल की बात एक-दूसरे की आँखों में पढ़ ली।
राव खंगार ने राव रूढ़ को महल में बुलाया। उसका आदर-सत्कार किया, मानमनुहार की। उससे सामान खरीदा, मुँहमाँगी कीमत दी। दस-पन्द्रह दिन एक-दूसरे के यहाँ खूब आना-जाना रहा। राव रूढ़ ने जाने की इजाजत माँगी। राव खंगार ने उसे दोचार दिन ओर रुकने के लिए कहा। बाँझा का बनजारे के डेरे राज ही आना-जाना रहता। बांझा और सोरठ की नजरें मिलतीं, उनका दिन सफल हो जाता, एक-दूसरे को देख धन्य हो जाते।

बींझा ने राव खंगार से कहा, 'बनजारा तो अब जाने की जल्दी कर रहा है। अगर सोरठ को यहीं रखना है तो राव रूढ़ को चौपड़ खेलने बुलाओ।"
राव रूढ़ चौपड़ खेलने आया। गलीचे पर चौपड़ बिछायी गयी। चांदी के कटोरे में अफीम घोली गयी। हाथी दाँत के पासे फेंके जाने लगे। बींझा चौपड़ का नामी खिलाड़ी देखते-ही-देखते उसने राव रूढ़ की आधी वालद जीत ली। रूढ़ ने देखा, ऐसे तो अपनी सारी सम्पति बाँझा जीत लेगा, लेकिन खेलने के बीच उठना भी शर्म की बात है। उसने सोचा कि इस दाँव में सोरठ को लगा देना चाहिए। हार गया तो क्या हुआ, औरत ही खोऊँगा, धन रहा तो सोरठ जैसी एक नहीं, दस और औरतें मेरे कदमों में आ खड़ी रहेंगी। राव रूढ़ ने सोरठ को दाँव पर लगा दिया। पासे फेंके जाने लगे, राव रूढ़ सोरठ को चौपड़ के दाँव में हार गया।

बींझा ने जीती हुई आधी वालद को राव खंगार के महलों में पहुँचवा दी और लकड़ी के महल में सोरठ बैठा अपने डेरे ले चला।
राव खंगार ने लकड़ी का महल बींझा के डेरे जाते देखा तो हुक्म दिया, 'लकड़ी का महल और सोरठ को मेरे महल में लेकर आओ।"
राव खंगार गढ़ गिरनार का स्वामी। उसका हुक्म कौन टाल सकता था ! सिपाहियों ने जाकर आधे रास्ते लकड़ी का महल रोका, बैलों के मुँह खंगार के महलों की तरफ कर दिए। बीझा जहाँ था वहीं का वहीं खड़ा रह गया, सोरठ का मुँह उतर गया।
सोरठ राव खंगार के जनाने महल में पहुँचा दी गयी।
खंगार ने रूढ़ से जीता सारा धन बाँझा के डेरे पहुँचाया। बाँझा उस धन को लेकर खंगार के पास गया, 'मुझे धन नहीं चाहिए, उसे आप रखो। मुझे तो केवल सोरठ चाहिए।'

'सोरठ तो मेरे जनाने में पहुँच चुकी है, उसे और किसी को देना मेरे स्वाभिमान के खिलाफ है।' -
बांझा मन मारकर बैठ गया, सिर धुने, सोरठ के विरह में तड़पे। उसकी याद में दोहे रचे
ऊँचो गढ़ गिनार, आबू ये छाया पड़े।
सोरठ रो सिणगार, बादळ सूवात करे।
ऊँचे गिरनार के ऊँचे गढ़ पर जब सोरठ श्रृंगार करती है तो पवने के साथ उड़ते हुए बादल भी दो पल उसका रूप देखने रूक जाते हैं।
सोरठ रंग री सांवळी, सुपारी रे रंग।।
लूगा जड़ी चरपरी, उड़-उड़ लागे अंग।

-सुपारी के रंग जैसी साँवली सोरठ की देह की सुगन्ध से तर हो रही पवन जब गढ़ गिरनार से निकलती है तो सारा गिरनार पहाड़ सुरभित हो जाता है।
सोरठ गढ़ सू ऊतरी, झट्टर रे झणकार।
धूज्य गढ़ रा काँगरा, गाज्यो गढ़ गिरनार।
- सोरठ झाँझर पहने जब चलती तो उसके चुंघरुओं की झंकार से गिरनार गढ़ के पहाड़ गूँज उठते हैं। महलों की दीवारें धूजने लगती हैं।
उधर राव खंगार सोरठ को सिर-आँखों पर बैठा रखता, सोरठ की हर इच्छा उसके लिए आज्ञा से कम नहीं, मुँह से निकलते ही उसके हुक्म की तामील हो।
'खम्मा, खम्मा' करें। लेकिन वह बाँझा की छवि अपने दिल से नहीं निकाल सकी, उसकी याद नहीं भुला सकी।
इसी तरह छह महीने निकल गए। राव खंगार ने राज-काज का सारा काम छोड़ दिया। राज्य-व्यवस्था बिगड़ने लगी। आखिर उसकी खुमारी टूटी। सोरठा से कहा, 'तुझे छोड़कर जाने को मन तो नहीं करता लेकिन मजबूर हूँ, राज्य का काम तो सँभालना ही पड़ेगा। मेरे आने तक तेरा दिल कैसे बहलेगा?"
सोरठ ने कहा, 'ऊदा ढोली को हुकुम देते जाओ, दिन-रात मेरे महल के नीचे बैठा रहे, मुझे गाना सुनाए।' -
राव खंगार देश-भ्रमण के लिए रवाना हो गया। एक दिन सोरठ अपने महल में बैठी सिर गुँथवा रही थी, नीचे ऊदा ढीली माँड राग में विरह का "ओलू गा रहा था। सोरठ ने झरोखे सेदेखा, उसे चौक में बांझा नजर आया। इतने में ऊदा ढीली ने दोहा गया
जिण साँचे सोरठ घड़ी, घड़ियो राव खड्गार।
वो साँचो तो गळ गयी, लद ही गयी लुहार
-जिस साँचे में सोरठ जैसी स्त्री और राव खंगार जैसा आदमी गढ़ा, वह साँचा ही गल गया और उस साँचे को बनाने वाला लुहार ही मर गया।

दोहा सुनते ही सोरठ के आग लग गई। कहाँ तो जवानी से भरपूर सुघड़ बाँझा और कहाँ आधा बूढ़ा राव खंगार। मेरी जोड़ी का तो बाँझा है, राव खंगार नहीं।
सोरठ ने बौंझा को बुलावा भेजा, बांझा हिचकिचाया। सोरठ ने दूसरा बुलावा भेजा, बांझा सोरठ के महलों में आया।
सोरठ ने कहा
‘बढ़ा म्हाके अंगण, नित आवो नित जाय।
घटकी वेदन बालमा, तो सु कही न जाय।”
-बींझा, तेरे विरह की वेदना मेरे से कही नहीं जा रही है। तू नित्य मेरे महल में अनाया-जाया कर |
बाँझा ने अपन मन की दशा बताई-
             "वेदन कहाँ तो मारिजा, कहतां लाज मरांह ।'
म्हें करहा थें बेलड़ी नीरो तो ही चरहा।'

सोरठ बोली, 'राव खंगार ने मुझे अपने महल में रख रखा है। वह मेरे शरीर का मालिक हो सकता है, मेरे दिल का नहीं। शरीर का मालिक मन का मालिक नहीं होता, मन का मालिक सबका स्वामी होता है।' -
बाँझा को लगा, आकाश में अमृत की वर्षा हो रही है, धन्य होकर बाँझा ने सोरठ का हाथ अपने हाथ में ले लिया। सोरठ ने कहा, 'हाथ तो पकड़ रहे हो, उम्र-भर प्रीत निभा पाओगे?'
बांझा ने सूरज को साक्षी बना उसे अपना वचन दिया। सोरठ और बाँझा तो एक-दूसरे से ऐसे मिल गये, जैसे फूल और सुगन्ध। बांझा सोरठ से कहता-
'सोरठ यू छै बहुगुणी, यण ब्लक थोक निवास।
ज्या सुगयी रे मन बसी, त्या लोही चढ़े न मांस।”
-सोरठ, तुझमें अनेक गुण है, लेकिन एक बड़ा भारी अवगुण भी है। जिस पुरुष के मन में तूबस जाती है, उसके शरीर पर रक्त और मांस नहीं चढ़ता, वह तेरे विरह में सूखता ही जाता है।
सोरठ ने नाक चढ़ायी तो बाँझा ने फिर कहा बाँझा है। मुझे चाहे मारो या जिन्दा रखो, आप मालिक हो, आपकी मर्जी।'

राव खंगार अब क्या करे? एक तरकीब सूझी। बाँझा को देश-निकाला दे देना चाहिए। दूसरे ही दिन बीझाँ को काली पोशाक पहना काले घोड़े पर बैठा देश-निकाला दे दिया। सिपाहियों को हुकुम दिया कि उसे गिरनार की सीमा पार निकालकर आओ। सोरठ अपने महल के झरोखे में खड़ी बोझा की रवानगी देख रही थी।
सोरठ ने खाना-पीना छोड़ दिया। सिर में तेल लगाए महीनों बीत गए, नाइन उबटन करने आए तो उसे उलटे पाँव लौटा दे। माली हार-गजरे लाए तो उन्हें कमरे के कोने में फिंकवा दे। गंधी इत्र की शीशियाँ भिजवाये तो उन्हें फुड़वा दे। तम्बोलन पान लेकर आए तो उन्हें बँटवा दे। उसके मुँह पर सावन की घटा जैसी उदासी छायी रहे, ऑखों से सावन-भादों जैसी आँसुओं की झड़ी लगी रहे। आखिर उससे रहा नहीं गया। ऊदा ढोली को बुला, बांझा को संदेश भेजा। ऊदा ने जाकर, बीझाँ के सामने दोहा गाया

सोरठ नागण को रही, ज्यु छेड़े ज्यू खाय।
आ जा बड़ा गास्नड़ी, ले जा कण्ठ लगाय।
-तेरे प्रेम में उन्मत्त सोरठ नागिन हो रही है। जो छेड़ता है, उसे डस रही है। बांझा-रूपी गरुड़ अपनी नागिन को कण्ठ से लगाकर ले जा।
यह दोहा सुनते ही बांझा पागल हो गया। उसे भली-बुरी, ठीक-गलत कुछ नहीं सूझी। सीधा सिन्ध के नवाब के पास पहुँचा।
सिन्ध के नवाब ने गढ़ गिरनार की जा घेरा, घमासान युद्ध हुआ। नवाब की ओर से बांझा बहुत बहादुरी से लड़ा। राव खंगार की हार हुई। बाँझा सोरठ को लेने उसके महल पहुँचा, लेकिन नवाब ने पहले ही सोरठ को अपने कब्जे में कर लिया, बींझा को उसे देने से इनकार कर दिया।
बांझा निराश होकर, पागल हो गया। सोरठ के महल की दीवारों से सिर फोड़फोड़कर अपनी जान दे दी।
नवाब ने सोरठ को बहुत लालच दिया, डराया-धमकाया, लेकिन बींझा के प्रेम पर उसे अटल देख नवाब ने उसके सामने सिर झुका दिया। नवाब ने सोरठ से पूछा
'बोल, तू कहाँ जाना चाहती है- राव खंगार के पास, अपने बाप चम्पा कुम्हार के पास, रूढ़ बनजारे के पास?"
सोरठ ने रोते हुए कहा, 'कहीं नहीं। जहां बांझा को जलाया गया, मुझे वहीं भेज दो आपकी बड़ी मेहरबानी होगी।'
सोरठ 67
नवाब ने सोरठ को पालकी में बैठा, बाँझा के दाह-स्थल पर भेज दिया।
सोरठ ने सूर्य भगवान के सामने खड़ी हो, हाथ जोड़कर प्रार्थना की, 'हे सूर्य भगवान, तू सर्वव्यापी है, तेरे से कोई चीज छिपी हुई नहीं है। मैंने बोझा से मन, वचन और कर्म से प्रेम किया है। अगर तू मुझे शुद्ध और सती मानता है तो तू अग्नि प्रकट करके मुझे अपने बांझा के पास पहुँचा दे।"
सूरज की किरणों से अग्नि प्रज्जवलित हुई, बाँझा की भस्म के साथ सोरठ भी भस्म में मिल गई।
जब तक जिन्दा रहा, ऊदा ढोली ने गाँव-गाँव में घूमकर सोरठ-बांझा के गीत गाए और उनके प्रेम की कहानी को अमर कर दिया। -

- लक्ष्मी कुमारी चुण्डावत 

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