Monday, 8 January 2018

राजा लक्ष्मणदेव परमार (1086-1094 ई.)

राजा लक्ष्मणदेव परमार (1086-1094 ई.)


कुछ प्राचीन अभिलेख राजा लक्ष्मणदेव परमार द्वारा मुसलमानों से युद्ध का उल्लेख करते है जो इब्राहीम गजनवी या उसके पुत्र महमूद के विरूद्ध हो सकते हैं।
सम्भवत: यह नागपुर क्षेत्र के राजा थे जैसा कि नागपुर में इनका शिलालेख मिला है।

(सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध - डॉ. अशोक कुमार सिंह, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी की पीएच.डी. हेतु स्वीकृत शोध ग्रंथ. पृष्ठ 71)

Thursday, 4 January 2018

अनुठी वीरता - अजयराज जी चौहान

अनुठी वीरता जो अन्यत्र ना मिले:-


अजमेर पर चौहान राजवंश का राज था पृथ्वीराज चौहान के पुर्वजों ने ही अजमेर बसाया था । तारागढ़ व गढ़ बिठली जैसे नामों से जाना जाने वाला ये राजपूत शहर प्राचीन था और इसकी गौरव गाथा भी बङी समृद्ध रही है ।अजमेर के बीच झील और पहाड़ियों से घिरा यह शहर उस काल में भी हर किसी को रोमांचित कर देने वाला था तो एक तरफ उँचि पहाङी पर बना सुदृढ़ किला चौहान वंश के यश का बखान करता था ।

इस तराह कि भव्यता के और सुन्दरता होते किसी का मन राज-काज व मोह माया से उठकर भगवान कि भक्ति में लग जाना एक सच्चे क्षत्रिय तक ही सीमित है, हर कोई कर पाये संभव नही ।राजपूत जाति मे कभी भी इतिहास लेखन कि परम्परा नही रही थी इसी लिये उस काल का समयाकन में ठिक ठिक नहीं कर पाऊंगा ।

यह बात है अजयराज जी चौहान कि उस समय बाहरी आक्रमणकारी भारत में प्रवेश कर चुके थे,और उनके मुख्य उद्देश्य धर्म व लूट थे । अजयराज जी ने उम्र के आखिरी पङाव मे राज-काज छोड़ प्रभु भक्ति कि तरफ मुंह किया ।उस जमाने में राजपूत जब इस उम्र में घर त्याग करते तो अपना घोड़ा व तलवार साथ रखते थे और सफेद वस्त्र धारण कर एकांत वास को चले जाते थे ।

अजयराज जी चौहान राज्य भोग से दूर अजमेर कि पहाड़ियों में चले गये ।उस समय मुस्लिम आक्रमणकारीयों द्वारा उस क्षेत्र में गायों को चरवाहो से जबरदस्ती ले जाने कि घटना घटित हुयी । जब अजयराज जी चौहान को यह बात ज्ञात हुयी तो उसी समय उनके वृद्ध शरीर में फिर फुर्ती आ गयी और वह अपनी तलवार और घोड़ा लेकर गाय रक्षार्थ निकल पङे । यह घटना सिर्फ जनश्रुतियों से ही ज्ञात होती है लिखित इतिहास कि कमी के चलते । एक पुरी मुस्लिम सेना कि टुकङी से अकेला वृद्ध राजपूत जा टकराता है और इतना भीषण संग्राम होता है जिसकी कल्पना भी नही कि जा सकती है ।
इसी में वह वीर-गति को प्राप्त होते है ।

सबसे रोचक घटना यहाँ यह है कि उनका सिर युद्ध करते समय अजमेर कि इन्हीं पहाड़ियों में कट जाता है और फिर भी उनका धङ रण जारी रखता है,उनका धङ आक्रमणकारीयों को गुजरात के अंजार जिले तक खदेड़ता है । गुजरात के अंजार जिले मे उनका धङ गिरा और वहाँ भी उनकी समाधी व छतरी बनी हुई है वहाँ भी वह पूजे जाते है,अजमेर के पास जहाँ सिर गिरा यहाँ भी उनकी समाधी व छतरी बनी हुई है यहाँ भी उनकी पुजा होती है । अजमेर से अंजार गुजरात कोई 600-700 किलोमीटर कि दूरी बिना सिर युद्ध करते हुवे जाना किसी क्षत्रिय के ही वश कि बात है अन्यत्र तो एसी कल्पना भी विध्यमान नही है ।

लेखन - बलवीर राठौड़ डढेल ।



Monday, 1 January 2018

हम दैनिक भास्कर कि इस फैक न्यूज़ को चुनौती देते है इस खबर कि सत्यता सिद्ध करें |

हम दैनिक भास्कर कि इस फैक न्यूज़ को चुनौती देते है इस खबर कि सत्यता सिद्ध करें |



30 दिसंबर 2017 राजस्थान के बड़े न्यूज़ पेपर दैनिक भास्कर में बड़ी खबर छपी जो कि पूरी तरह से एक गलत न्यूज़ है |
दैनिक भास्कर ने अपनी न्यूज़ में रुदालियों का जिक्र किया जो सामंतो के यहाँ रोने जाती है | 

हम दैनिक भास्कर कि इस फैक न्यूज़ को चुनौती देते है इस खबर कि सत्यता सिद्ध करें |

पहली चुनौती इस तस्वीर को लेकर है जिसे भास्कर ने रुदालियों कि बताया है, असल में यह तस्वीर रेवदर के ओढ़वाडीया के देवासी समाज से संबंधित है |
जालौर के रानीवाड़ा से गुजरात तक यह सामान्य परम्परा है कि कुछ जातियों कि महिलाएं जब अपनी रिस्तेदारी या गांव में किसी कि मृत्यु पर बैठने जाती है तो छाती पीटकर रोती है और पुरुष भी मुँह ढकते है |
यह अलग अलग जातियों कि अपनी परम्परा है |

पहली चुनौती हमारी इस तस्वीर से संबंधित है कि भास्कर इस तस्वीर के लिए स्पष्टिकरण दें कि यह किस गांव से संबंधित है, क्योंकि यह तस्वीर रेवदर के ओढ़वाडीया के देवासी समाज से संबंधित है |
देवासी समाज ने इस खबर का विरोध स्थानीय विद्यायक जगसीराम से फोन कर जताया है जिन का नाम भी भास्कर ने छापा है उनके अनुसार उनकी उस न्यूज़ से सहमति नहीं है (हमारे पास रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध है) |

जिन अनिल शर्मा ने यह फोटो उपलब्ध करवाई है और इस तस्वीर को आदिवासी दलितों कि बताया है उससे जब देवासी समाज ने फोन कर सवाल किये तो उसकी बोलती बंद हो गई, इन्होने माना है यह गलत फोटो छापकर भास्कर लोगो को भृमित किया है और फिर से स्पष्टीकरण देने को सहमत है कि गलत फोटो छापा है (इस बातचीत कि रिकॉर्डिंग भी उपलब्ध है) |

भास्कर ने रेवदर तहसील के जिन गाँवों का नाम लिखा है वहाँ के गाँवों से एक भी रूदाली ढूँढ कर लाकर दिखादें, सरासर सौ प्रतिशत झूठी ख़बर फैलाने व समाज को गुमराह करने का काम भास्कर के रिपोर्टर आनंद चौधरी व रणजीतसिंह चारण ने किया है |


इन गाँवों में कोई रूदाली परिवार या दलितों से ज़बरन मुंडन कराने का एक भी केस मिल गया तो हम सत्यता स्वीकार करेंगे । साथ ही यह ख़बर समाज की सामाजिक समरसता तोड़ने झूठी मनगढ़ंत व तथ्यहीन है।


इस ख़बर से राजपूत समाज देवासी समाज व दलित समाज की भावनाएँ आहत हुई है इनसे पत्रकार आनंद चौधरी रणजीतसिंह चारण व दैनिक भास्कर को इस झूठी ख़बर के लिए माफ़ी माँगनी चाहिए।

यह राजस्थान में जातिय वैमनस्य पैदा करने की साज़िश है जिसका हर नागरिक को विरोध करना चाहिए।

राजा मानसिंह आमेर व मान मंदिर वाराणसी ।


राजा मानसिंह द्वारा वाराणसी में निर्मित मानमंदिर व घाट मान मंदिर वाराणसी ।

आमेर के राजा मानसिंह ने देश के विभन्न भागों में बहुत से मंदिरों का निर्माण करवाया व कई मंदिरों का जीर्णोद्धार करवाया, हरिद्वार में हर की पौड़ी बनवाई| अपने इसी धार्मिक क्रियाकलापों की श्रंखला में राजा मानसिंह ने वाराणसी में एक मंदिर और घाट बनवाया, जिसे मानमंदिर के नाम से जाता है इतिहास में इस मंदिर के बारे में दर्ज है-

1600 ई. में आमेर के राजा मानसिंह ने बनारस में एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। हालाँकि वाराणसी नगर में इस मंदिर की इतिहासकारों के हिसाब से वास्तविक स्थिति का पता नहीं लग सका है पर मगध विश्व विद्यालय, गया के इतिहास रीडर राजीव नयन प्रसाद अपनी पुस्तक “राजा मानसिंह आमेर” के पृष्ठ संख्या 209 पर लिखते है - एक भवन है जिसे मानमंदिर कहते है (मान का मंदिर), जो गंगा किनारे दशाश्वमेघ घाट से कुछ गज पश्चिम में बना हुआ है। जहाँगीरनामा में जिस मंदिर का उल्लेख है वह भवन के एक स्थान में निसंदेह बना हुआ होगा यही कारण है तमाम भवन को मान मंदिर कहा जाने लगा।

इतिहासकार राजीव नयन इस मंदिर के प्रधान देवता पर प्रश्न उठाते हुए लिखते है कि - वाराणसी को विश्वनाथपुरी भी कहा जाता है क्योंकि नगर के मुख्य देवता स्वामी विश्वनाथ है। इसके अतिरिक्त राजा मानसिंह के दूसरे मंदिरों में मुख्य देवता शिव या महादेव है, इसलिये इस बात की प्रबल सम्भावना है की मानमंदिर के मुख्य देवता भगवान शिव थे।

मानमंदिर आज खंडित अवस्था में है। इसके उपरी मंजिल में गृहों को देखने के लिए ज्योतिष के यंत्र फिट कर 1734 में राजा मान सिंह के वंशज सवाई जय सिंह द्वारा वैधशाला बनाई गई। झरोखेदार खिड़कियों, सीलिंग पर सुन्दर नक्काशी वाली मजबूत व बेजोड़ इमारत होने के बावजूद सामान्य दृष्टि से देखने पर मानमंदिर अधिक कलात्मक नहीं लगता, तथापि गंगा की और से देखने पर यह काफी विशाल दिखाई देता है। नदी की और इसकी एक छज्जेयुक्त खिड़की खुलती है जो तत्कालीन स्थापत्य कला की दृष्टि से सुहावनी व सुन्दर है। इसके नीचे राजा मानसिंह ने एक घाट का भी निर्माण कराया जिसे मानघाट के नाम से आज भी जाना जाता है।

मानसिंह द्वारा निर्मित यह मंदिर उस वक्त उतरी भारत का एक सुन्दर और महत्त्वपूर्ण धार्मिक केंद्र था। इस मंदिर के बारे में जहाँगीर ने अपने आत्मरचित ग्रन्थ में लिखा - राजा मानसिंह ने बनारस में एक मंदिर बनवाया, उसने मेरे पिता के कोषागार से उस पर 10 लाख रूपये खर्च किये। यह विश्वास है कि जो यहाँ मरते है सीधे स्वर्ग जाते है - चाहे बिल्ली, कुतिया, मनुष्य कोई भी हो।

मैंने एक विश्वासी आदमी को मंदिर के बारे में सभी जानकारियां लाने के लिए भेजा। उसने सूचना दी कि राजा ने इस मंदिर के निर्माण में अपने स्वयं के एक लाख रूपये खर्च किये है। इस समय इससे बड़ा दूसरा मंदिर वाराणसी में नहीं है। मैंने अपने पिता से पूछा कि उसने इस मंदिर को बनाने की स्वीकृति क्यों दी ? तो उनका उत्तर था - “मैं सम्राट हूँ और बादशाह या सम्राट पृथ्वी पर परमात्मा की छाया होते है। मुझे सबके प्रति उदार होना चाहिये।”

मौलाना एच. एम. की पुस्तक दरबार ए अकबरी के अनुसार जहाँगीर आगे चलकर लिखता है - “मैंने इसके पास इससे भी बड़ा मंदिर बनाने का आदेश दिया।”

इतिहासकार श्रीराम शर्मा लिखते है कि - अब्दुल लतीफ जो एक मुस्लिम पर्यटक था ने अपनी डायरी में, जिसे उसने जहाँगीर के शासनकाल में लिखी थी, इस मंदिर की स्थापत्य कला की सुन्दरता का हवाला दिया है और लिखा है कि क्या अच्छा होता अगर यह हिन्दू धर्म की सेवा के बदले इस्लाम धर्म की सेवा में बनाया जाता।

जयपुर की वंशावली में भी उल्लिखित है कि - राजा मानसिंह ने एक बड़ा मंदिर बनारस में लोगों की पूजा के लिए बनवाया।

राजा मानसिंह आमेर काबुल के शासक नियुक्त ।


राजा मानसिंह आमेर - काबुल के शासक नियुक्त ।

जब राजा भगवंतदास पंजाब के सूबेदार नियत हुए, तब सिंध के पार सीमांत प्रान्त का शासन कुँवर मानसिंह को दिया गया । जब 30वें वर्ष में अकबर के सौतेले भाई मिरज़ा मुहम्मद हक़ीम की (जो कि काबुल का शासनकर्ता था) मृत्यु हो गई, तब इन्होंने फुर्ती से काबुल पहुँचकर वहाँ के निवासियों को शान्ति दी और उसके पुत्र मिरज़ा अफ़रासियाब और मिरज़ा कँकुवाद को राज्य के बुरे–भले अन्य सरदारों के साथ लेकर वे दरबार आए।

अकबर ने सिंध नदी तक ठहर कर कुँवर मानसिंह को काबुल का शासनकर्ता नियत किया । इन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ रूशानी जातिवालों को लुटेरेपन और विद्रोह से खैवर के रास्ते रोके हुए थे, पूरा दण्ड दिया ।
ज्ञात रहे यही जातियाँ थी जिन्होंने भारत पर आक्रमणकारीयों को हथियार उपलब्ध करवाये थे ।
जब राजा बीरबल स्वाद प्रान्त में यूसुफ़जई के युद्ध में मारे गए और जैनख़ाँ कोका और हक़ीम अबुल फ़तह दरबार बुला लिए गए, तब यह कार्य मानसिंह को सौंपा गया।

जब जाबुलिस्तान के शासन पर भगवंतदास नियुक्त हुए और सिंध पार होने पर पागल हो गए, तब उस पद पर कुँअर मानसिंह नियत हुए ।

मानसिंह आमेर काबुल के शासक नियुक्त होने के बाद सनातन धर्म को नष्ट करने के लिये इस्लाम कि जो आंधी काबुल से आती थी उसे सदैव के लिये खत्म करने के लग गये और अन्ततः उन्होंने सभी पाँच मुस्लिम राज्यों को संपूर्ण नष्ट कर उनके हथियार बनाने के कारखानों को पूर्णतः नष्ट कर दिया ।।

भदानक (बयाना) के यदुवंशी राजपूतों द्वारा देश, धर्म रक्षा (1045-1454 ई.)

भदानक (बयाना) के यदुवंशी राजपूतों द्वारा देश, धर्म रक्षा (1045-1454 ई.)



राजस्थान के भदानक बयाना दुर्ग ने विदेशी मुस्लिम आक्रमणों का बहुत वीरता से सामना किया था। मथुरा के यदुवंशी महाराजा विजयराज ने यह दुर्ग बनवाया था। विजयराज रासो नामक ग्रंथ में इस राजा के पराक्रम का अच्छा वर्णन है ।
इसमें लिखा है कि महाराजा विजयपाल का 1045 ई. में बूबकशाह कंधारी से घमासान युद्ध हुआ । अन्त में बयाना दुर्ग में जौहर करके यदुवंशी वीरों ने आक्रमणकारियों का बहुत अच्छा सामना किया और मातृभूमि पर मर मिटे ।

महाराजा विजयपाल के बलिदान हो जाने पर बयाना दुर्ग मुसलमानों के अधिकार में चला गया । महाराज विजयपाल के बाद उनके पुत्र या पौत्र पृथ्वीपाल के पुत्र त्रिभुवनपाल ने फिर से अपनी शक्ति बढ़ा ली। 1133 ई. के लगभग उन्होंने त्रिभुवनगढ़ (तवनगढ़) का निर्माण पूरा कर लिया और एक योगी से आशीर्वाद भी प्राप्त किया ।
महाराजा त्रिभुवनपाल का राज्य दूर तक फैल गया और इनके पुत्र धर्मपाल ने धौलपुर दुर्ग बनाया । इसके बाद धर्मपाल ने बयाना के मुस्लिम शासक से युद्ध करके वीरगति पाई इस प्रकार तवनगढ़ और कुंवरगढ़ भी तुकों के हाथ चला गया ।

धर्मपाल के पुत्र कुंवरपाल द्वितीय ने रीवा में अपने ननिहाल जाकर शक्ति एकत्र की और पुन: बयाना को अपने अधिकार में कर लिया ।

1195-1996 ई. में मोहम्मद गौरी ने कुंवर पाल की शक्ति को तोड़ने के लिए गजनी और दिल्ली दोनों ओर से सेनाएँ भेजी। कुंवरपाल ने इसका सामना करने में निश्चित अन्त देख कर संधि कर ली और दुर्ग छोड़कर चम्बल नदी के पार सम्बलगढ़ के जंगलों मे यदुवंशीवाटी क्षेत्र बनाकर बयाना को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करने लगा ।

कुछ समय बाद बहाउद्दीन तुगरिल की बयाना में मृत्यु हो गई और इस प्रकार अवसर देख कर, कुंवरपाल ने 1204-1211 ई. के मध्य बयाना का राज्य हस्तगत कर लिया इसके बाद पुनः दिल्ली सुल्तान इल्तुतमश ने बयाना पर आक्रमण किया ।

1346 ई. के लगभग महाराजा अर्जुनपालने मक्कन खाँ को मारकर सारे भू–भाग पर अधिकार कर लिया और कल्याणपुरी (करौली) नगर बसाया ।
आगे चलकर महाराजा पृथ्वीराज ने तवनगढ़ को पठान मुसलमान चरवानी अफगानों से लड़कर बचाया। 1454 ई. में मालवा के महमूद खिलजी ने महाराजा चन्द्रपाल पर करौली पर चढ़ाई की और करौली पर अधिकार कर लिया। महाराजा चन्द्रपाल के वंशजों ने अकबर के काल में करौली पर पुनः अधिकार किया ।

इस प्रकार 400 वर्षों तक यदुवंशीयों ने विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों से भारत की रक्षा की । अप्रतिम शौर्य और पराक्रम, देशाभिमान, देशधर्म रक्षा, भारत की भगवा और केसरिया कीर्ति पताका का प्रतीक ।

(सल्तनत काल में हिन्दू प्रतिरोध - डॉ. अशोक कुमार सिंह, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी की पीएच.डी. हेतु स्वीकृत शोध ग्रंथ, पृष्ठ 127, 128)