Saturday, 30 December 2017

बूंदी राव सुर्जन हाड़ा बड़े धार्मिक, उदार बुद्धिमान प्रतापी नरेश

बूंदी राव सुर्जन हाड़ा बड़े धार्मिक, उदार बुद्धिमान प्रतापी नरेश-



राव सुरतान को बूंदी के सामन्तो ने हटाकर राव सुर्जन सिंह को गद्दी पर बैठाया । आरम्भ मैं यह अपनी माता जंयती के आदेशानुसार राज्य करते रहे । बाद में बूंदी के छीने हुये परगने को जीतने के लिये सेना एकत्रित की ।
इस सेना मैं उनके 20 जागीरदार भाई ओर अन्य राजपूत थे । सेना इक्कठी करके, कोटा पर शासन कर रहे मालवा के सुल्तान के प्रतिनिधि के रूप मैं 26 वर्ष शासन किया |
उन्होंने केसर खा ओर डोकर खा पठानों को हरा कर कोटा को वापस जीता जो मांडू के सुल्तानो के प्रभाव मैं था । माडु का सुल्तान वापस मुड़कर कभी नही आया । ओर अपने पुत्र भोज को सुपुर्द कर दिया ।
 राव सुर्जन ने रणथम्भौर ओर मालवा सिमा तक के आसपास के परगने अपने अधिकार मैं कर लिये। 

सगारथ झल्लन के हित सोध, 
बढ्यो मरुमाल महीप विरोध |
पदच्युत बुन्दियतें सुल्तान, 
दियो नृप सुर्जन को वह थान ||" 

अकबर ने चितोड़ विजय के बाद रणथम्भौर पर सेना भेज दी । हाड़ा सहज ही अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाले नही थे ।।

रणथम्भौर अकबर के ध्यान में प्रारम्भ से ही बना हुआ था । उसने स्वयं आकर इसको घेर लिया । वह काफि समय इसकी अपराजेय प्राचीरों के समक्ष रहा पर उसे किले के समर्पण की आशा नही थी ।
अकबर से राव सुर्जन सिंह हाङा डेढ मास तक युद्ध किया । इससे पहले 13 बार मुस्लिम सेना हार का मुंह देख चुकी थी । इसलिए इस बार मुगल पुरी तैयारी के साथ आये थे ।

इस बार रणथम्भौर कि स्थिति नाजुक बन गयी थी तो पराजय का सेहरा ना बंधे यह सोचकर राजा मानसिंह आमेर ने बिच बचाव से राव सुरजन हाङा व अकबर के बिच संधि करवाई ।
उस समय संधि की सम्मानीय  शर्तें राव सुर्जन हाडा ने रखी ।  जिसकी मध्यस्थता तत्कालीन आमेर राजकुमार मानसिंह ने की । मानसिंह  कि हिन्दू भावनाओं का अच्छा दिग्दर्शन होता है इस संधि की मध्यस्थता से ।

जब सन्धि हुई तो रणथम्भौर के किलेदार सावत सिंह हाड़ा ने  स्वीकार नही किया और राव सुर्जन से  उनोने अकबर से य प्रमुख शर्ते रखवाई ।
"शर्तें ये थी -

1. बूंदी का सरदार उस रीति-रिवाज से मुक्त रखा जावेगा जिसे राजपूत अपमानजनक मानते हैं ।
2. जजिया कर से मुक्ति ।
3. बूंदी सरदारों को कभी भी अटक पार जाने के लिये बाध्य नही किया जावेगा ।
4. बूंदी सरदार इस बात से मुक्त रखें जाएंगे कि वे अपनी स्त्रियों या सम्बन्धिनियों को मीना बाजार में स्टाल लगाने भेंजे । यह स्टाल राजमहल में नौरोजा के अवसर पर लगायी जाती थी ।
5. वे दीवाने आम तक पूर्ण रुप से अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर जा सकेंगे ।
6. उनके पवित्र मंदिरों का आदर किया जायेगा ।
7. वे कभी भी हिन्दू नेता की कमान में नही रखे जावेंगे ।
8. उनके घोङो पर शाही दाग नही लगाया जाएगा ।
9. वे अपने नक्कारे को राजधानी की गलियों में लाल दरवाजे तक बजा सकेंगे और बादशाह के सामने उपस्थित होने पर सिज्दा करने से मुक्त रहेंगे ।
10. जैसे दिल्ली बादशाह के लिये वैसे ही बूंदी हाङा चौहानों के लिये होगी ।।

जो कुछ भी हुआ राव सुर्जन को लोभ लालच देकर अपने पक्ष मे किया गया ।। 

बादशाह ने राव सुर्जन को राव राजा की उपाधि ओर बनारस के निकट 26 परगने दिये।। बनारस मैं राव सुर्जन ने कई इमारते महल घाट बनवाय ।
अकबर के कृपापात्र होने के कारण राव सुर्जन ने हिन्दू तीर्थ यात्रियों के लिये बहुत सी सुविधाए दिलवाई ।
 
काशि मैं घाटों की इमारते ओर 20 जलाशय बनवाये । इससे इनकी बहुत यश वर्द्धि हुई । महाराणा उदयसिंह के साथ जब इनोने द्धारिका की यात्रा की उस समय वहां रणछोड़जी का मंदिर बहुत मामूली सा था ।
इससे राव सुर्जन ने महाराणा से आज्ञा लेकर नया मन्दिर बनवाया जो अब तक विधमान है | 
उनके जीवन का अंतिम समय काशी मैं ही बीता ओर वी.स 1642 मैं वही परलोक सिधार गए । काशी में मणिकणिका घाट के पास ब्रह्मनाल( मुहल्ला) के बीच उनके साथ सती होने वाली रानियों के चबूतरे बने हुये है ।

Source -
1. इतिहासकार जगदीश गहलोत 
2. वंश भास्कर 
3. सुर्जन चरित्र (सँस्कृत काव्य
4. कर्नल टॉड

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