Friday, 29 December 2017

राजा मानसिंह आमेर और रणथम्भौर

रणथम्भौर और राजा मानसिंह आमेर 



रणथम्भौर अकबर के ध्यान में प्रारम्भ से ही बना हुआ था । उसने स्वयं आकर इसको घेर लिया । वह काफि समय इसकी अपराजेय प्राचीरों के समक्ष रहा पर उसे किले के समर्पण की आशा नही थी ।
अकबर से राव सुर्जन सिंह हाङा डेढ मास तक युद्ध किया । इससे पहले 13 बार मुस्लिम सेना हार का मुंह देख चुकी थी ।
इसलिए इस बार मुगल पुरी तैयारी के साथ आये थे ।

इस बार रणथम्भौर कि स्थिति  नाजुक बन गयी थी तो पराजय का सेहरा ना बंधे यह सोचकर राजा मानसिंह आमेर ने बिच बचाव से राव सुरजन हाङा व अकबर के बिच संधि करवाई ।
उस समय संधि की सम्मानीय  शर्तें राव सुर्जन हाडा ने रखी ।  जिसकी मध्यस्थता तत्कालीन आमेर राजकुमार मानसिंह ने की ।
हिन्दू भावनाओं का अच्छा दिग्दर्शन होता है ।
"शर्तें ये थी -

1. बूंदी का सरदार उस रीति-रिवाज से मुक्त रखा जावेगा जिसे राजपूत अपमानजनक मानते हैं ।
2. जजिया कर से मुक्ति ।
3. बूंदी सरदारों को कभी भी अटक पार जाने के लिये बाध्य नही किया जावेगा ।
4. बूंदी सरदार इस बात से मुक्त रखें जाएंगे कि वे अपनी स्त्रियों या सम्बन्धिनियों को मीना बाजार में स्टाल लगाने भेंजे । यह स्टाल राजमहल में नौरोजा के अवसर पर लगायी जाती थी ।
5. वे दीवाने आम तक पूर्ण रुप से अस्त्र शस्त्र से सज्जित होकर जा सकेंगे ।
6. उनके पवित्र मंदिरों का आदर किया जायेगा ।
7. वे कभी भी हिन्दू नेता की कमान में नही रखे जावेंगे ।
8. उनके घोङो पर शाही दाग नही लगाया जाएगा ।
9. वे अपने नक्कारे को राजधानी की गलियों में लाल दरवाजे तक बजा सकेंगे और बादशाह के सामने उपस्थित होने पर सिज्दा करने से मुक्त रहेंगे ।
10. जैसे दिल्ली बादशाह के लिये वैसे ही बूंदी हाङा चौहानों के लिये होगी ।।

उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है राजा मानसिंह आमेर एक सनातन धर्म रक्षक शासक थे और वह सदैव राजपूत राजाओं के सहयोगी रहै ।।

लेखक - कर्नल टाड ।

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