Thursday, 28 December 2017

राजपूत क्षत्रिय शाही राजवंश - राजा त्रिलोचनपाल शाही

राजपूत क्षत्रिय शाही राजवंश - राजा त्रिलोचनपाल शाही

महमूद गजनवी का नन्दना पर आक्रमण (1014 ई.)


जब नन्दना के राजा त्रिलोचनपाल शाही को महमूद के अभियान की सूचना मिली तो उसने अपने राजकुमार भीमपाल (निडर भीम) और अनुभवी सेनापति को राजधानी में छोड़ स्वयं कश्मीर के राजा संग्राम राज (1003-1028 ई.) से सहायता लेने चल पड़ा ।

जब महमूद की सेना नन्दना के पास पहुंची तो राजकुमार भीमपाल ने अपने सैनिकों और हाथियों को लिया और पहाड़ के मर्गला घाटी को बन्द कर दिया और सैनिकों को पहाड़ों के ऊपर तैनात कर दिया ।
अब युद्ध शुरू हो गया और कई दिनों तक चलता रहा। तभी भीमपाल की सहायता में और सेना आ गई जिसके कारण उत्साहित होकर भीमपाल ने मैदानी युद्ध के लिए अपनी सेना को मैदान में उतार दिया ।

इसके कारण तुकों को अपने घुड़सवारों की सेना के उपयोग का अवसर मिल गया । भीमपाल के हाथी जब आगे बढ़ते तो मुसलमान उन पर तीर चलाते । मुसलमानों का अग्रिम सेनापति भौमपाल की सेना से बुरी तरह घिर गया और वह घायल हो गया परन्तु उसकी सहायता में एक सैनिक दस्ता आया जो उसे बाहर निकाल ले गया । इस प्रकार युद्ध चलता रहा और अन्त में भारतीयों की हार होने लगी। इसे जान भीमपाल ने कुछ सेना नन्दना के दुर्ग में छोड़ी और स्वयं कश्मीर की ऒर रवाना हो गया

महमूद की सेना ने नन्दना दुर्ग को जा घेरा और कुछ दिन तक संघर्ष चला परन्तु फिर दुर्ग रक्षकों ने समर्पण कर दिया । महमूद को दुर्ग में बहुमूल्य सम्पति मिली ।

नन्दना जीत कर महमूद त्रिलोचनपाल के पीछे कश्मीर अभियान पर गया । कश्मीर के राजा संग्रामराज ने अपने मंत्री तुंग के साथ एक बड़ी सेना त्रिलोचनपाल के साथ रवाना की । त्रिलोचनपाल सुरक्षात्मक युद्ध और पहाड़ी युद्ध चाहता था पर मंत्री तुंग घमण्डी था उसने छोटे से सैनिक दस्ते को लेकर तोही नदी पार की और महमूद के अग्रिम दस्ते को मार लिया ।
त्रिलोचनपाल ने तुंग को फिर समझाया पर तुंग नहीं माना । अब महमूद ने स्वयं आक्रमण किया जिसके आगे तुंग हार गया परन्तु त्रिलोचनपाल फिर भी लड़ता रहा । कल्हण की राजतरंगिणी में स्वदेश भूमि की रक्षा में महान राजा त्रिलोचनपाल के पराक्रम और शौर्य की बहुत प्रशंसा लिखी है।त्रिलोचनपाल युद्ध में अकेला घिर गया था फिर भी वह रणकौशल से घेरे के बाहर निकल आया ।

उसके साथ जयसिंह, श्रीवर्धन और विभ्रमार्क नाम के तीन वीर यौद्धा युद्ध करते रहे परन्तु आखिरकार महमूद जीत गया और शाही राजवंश का सारा राज्य उसके अधिकार में आ गया । त्रिलोचनपाल ने फिर भी हिम्मत रखी और उसने पंजाब के पूर्व में शिवालिक पहाड़ों मे हस्तिनापुर को अपनी नई राजधानी बनाया ।

सरबल दुर्ग पर महमूद का आक्रमण (1019 ई.)

अब पहमूद कालिन्जर के विद्याधर चंदेल के विरूद्ध गजनी से चला। मार्ग में उसने राहब नदी पर सरबल दुर्ग पर अधिकार किया और वह नदी के पश्चिमी तट पर पहुंचा । यह देख राजा त्रिलोचनपाल शाही ने सेना और हथियार लेकर उसे नदी पार नहीं करने दी परन्तु प्रयास होता रहा और अन्त में महमूद की सेना ने नदी पार कर ली।
इसके बाद महमूद ने त्रिलोचनपाल पर आक्रमण किया । घमासान युद्ध के बाद महमूद जीत गया और उसे 70 हाथी मिले । बहुत से भारतीयों को उसने बन्दी बना लिया ।

जब त्रिलोचनपाल ने संधि का प्रस्ताव किया तो महमूद ने उसके सामने इस्लाम स्वीकार करने की शर्त रख दी जिसे राजा ने अस्वीकार कर दिया और वह कालिन्जर के चन्देल राज की और निकल पड़ा ।
1021 ई. में दुर्भाग्य से मार्ग में अज्ञात लोगों ने शायद उससे धन के लोभ में हत्या कर दी । 1026 ई. में त्रिलोचनपाल के पुत्र राजा भीमपाल भी संघर्ष करते-करते काम आये ।

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