Wednesday, 10 May 2017

अंधानुकरण और समाज

अंधानुकरण और समाज


हमारा समाज ही नहीं संसार के अधिकांश लोग अंधानुकरण करने के अभ्यस्त होते हैं तथा अंधानुकरण को बनाये रखने के लिए उनका सबसे तर्क होता है कि दुनिया क्या कहेगी ?

भौतिकवादियों में समय समय पर अधिक लोग ऐसे निकलते है, जो धनोपार्जन के रुढिवादी तर्कों व व्यवस्थाओं को बदल देते हैं लेकिन उनको भी यथास्थिति वादियों से कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ता है । जब तक नया काम करके नहीं दिखा दो, उसकी उपयोगिता को सिद्ध नहीं कर दो, तब तक लोग उसको अपनाने को तैयार नहीं होते ।

वर्तमान शताब्दी में भारतवर्ष में भौतिक क्षेत्र में अनेक रूढिवादियों को ध्वंस किया व उसके अग्रणी लोगों ने आर्थिक क्षेत्र में बेतहासा लाभ भी प्राप्त किया । तब हमारा समाज बोतल के नशे में, अज्ञान के अंधकार में व निष्क्रियता के गर्त में पड़ा, यह सब देखता रहा ।

अब समाज के समझदार कहे जाने वाले लोग कहने लगे है कि हम पिछड़ गए हैं । हमको शहरों की ओर दौडना चाहिए, ताकि इस आर्थिक प्रगति की दौड में हम भी शामिल हो सकें । भौतिक प्रगति व विज्ञापन के आविष्कारों में भारत स्वयं दुनिया के देशों से एक हजार वर्ष पीछे चल रहा है । हमको इस बात का बोध नहीं है कि विज्ञान अपने विनाश के लिए बेताबी से तडफ़ रहा है । इतने विनाशकारी हथियारों का अविष्कार हो चुका है कि किसी भी क्षण सम्पूर्ण विश्व का विज्ञानं राख की ढेरी बन सकता है । जब बढ़ने व लाभ उठाने के दिन थे, तब हम सोते रहे और अब जब विनाश के दिन आने लगे है, हम उस और दौड पड़ना चाहते है ।

संसार के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या नेतृत्व व समाज परिवर्तन की है । जो भी व्यक्ति या समाज इस कार्य को कर सकेगा, वही समाज में जीवित रह सकेगा । आज सारा संसार धर्मों, राष्ट्रों व आर्थिक वादों के झंझटों में फंस कर इस प्रकार भयाक्रांत है, कि उसे चारो और अपने विनाश के अलावा कुछ नहीं दिखता । यह आश्चर्यजनक बात है कि विनाश को कोई भी पसंद नहीं करता, फिर भी विनाश से सब भयभीत हैं । इसलिए हैं कि वे धर्म, राष्ट्र व आर्थिक वादों के, अपने रूढिगत बंधनों को छोड़ नहीं सकते और यही रूढ़ियाँ नहीं चाहते हुए भी संसार के लोगों को विनाश के कगार पर पंहुचा देगी, इस बात को संसार के लोग अच्छी तरह समझने लगे हैं ।

ऐसी परिस्थिति में लोग चमत्कारों की खोज में लगे हुए हैं । आज से पचास या सौ वर्ष पहले जिन भविष्य वाणियों व आध्यात्मिक शक्ति को लोग पिछड़ापन व रूढीग्रस्तता कहते थे ।उनकी बात लोग सुनने लगे हैं । इसी के परिणाम स्वरूप ऐसी खबरों को इस समय अखबारों में प्रमुखता दी जा रही है । लोग अन्धकार में किसी प्रकाश की किरण खोज लेने के लिए आतुर हैं । ऐसा समय ही श्रेष्ठ लोगों को नेतृत्व की और आगे बढ़ने के लिए उपयुक्त होता है । गोरखनाथ कहते है "रात गई मध्यरात्रि गई, तब एक बालक चिल्लाता है, है कोई शूरवीर इस संसार में" घोर कलियुग समाप्त हुआ, नवयुग के निर्माण की बेला सामने खड़ी है । संसार का असहाय मनुष्य बालक की भांति चिल्ला रहा है, है कोई शूरवीर इस संसार में, जो आये और हमें बचाए ।

एक कहावत है,'समय का सर पीछे से गंजा है ', तथा वह अपने बाल चेहरे पर डाले रखता है । इसलिए समय आता है तो लोग पहचान नहीं पाते, जब वह आगे बढ़ जाता है, तब उसके सर की गंज को पहचानते है और पकड़ने को दौड़ते है, किन्तु पकड़ नहीं पाते । वाही विडम्बना आज क्षत्रिय समाज के समक्ष है । लोग शक्ति संपन्न, श्रेष्ठ पुरुषों की तलाश में है और हम दुर्गुणों व भ्रष्टाचार की दौड़ में शरीक हो रहे है । अपनी गति को और बढ़ा लेना चाहते हैं कि दुनियां से कही पिछड़ न जाय । व्यक्ति आसानी से बुराई व भ्रष्टाचार में पड़ना नहीं चाहता । उसकी स्वाभाविक वृत्ति सतत विकास की और आगे बढ़ते रहना है, लेकिन वह दुनियां जो उसके चारों और फ़सी हुई है, उसे बाध्य कर देती है इस बात के लिए कि, वह अपने मनोभावों को दबाये । अपनी मौलिक स्वतंत्रता को खोकर दुनियां की दासता को स्वीकार करले ।

एक व्यक्ति के लिए समाज के विरुद्ध लड़ना बहुत ही दुष्कर कार्य प्रतीत होता है । यदि अमुक रीति रिवाज़ का पालन नहीं किया तो दुनियां क्या कहेगी? अगर अमुक प्रकार से आचरण किया तो दुनियां क्या कहेगी? अगर अमुक प्रकार से विचारों को व्यक्त किया तो दुनिया क्या कहेगी? दुनिया के ही लोग दुनियां की दुहाई देकर, व्यक्ति को दुनियां का गुलाम बना लेने के लिए आतुर हैं । और दुर्बल व्यक्ति चेहरे पर अप्राकृतिक मुस्कान लिए हुए बोझिल दिल के साथ इस गुलामी को स्वीकार कर लेता है ।

- श्री देवीसिंहजी महार, 'हमारी भूलें' पुस्तक से साभार

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