Saturday, 5 November 2016

राजा मानसिंह आमेर- प्रभावशाली व्यक्तित्व, नितीज्ञ !!

राजा मानसिंह आमेर- प्रभावशाली व्यक्तित्व !

काबुल को फतेह करके वहाँ के पाँच राज्यों के झंडो को मिलाकर के पंचरंगे झंडे को आमेर का राज्य ध्वज घोषित कर दिया, उस समय मानसिंह राजा नही थे उनके पिता भगवन्तदास जी राजा थे फिर भी उनका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली था कि बात मानी गई ।


हल्दीघाटी के युद्ध के लिए अकबर ने मानसिंह को सेनापति बनाकर भेजा उस समय मानसिंह कि उम्र मात्र 24 वर्ष थी । मुसलमानों के राज्य में यह नियम था कि सेना को लूटपाट से जो संपत्ति मिलती थी उसे राजकोष में जमा कराया जाता था ।
अकेले मानसिंह को यह छुट थी कि वह लूट कि संपत्ति को राजकोष में जमा नहीं करायेंगे ।।
हल्दीघाटी के युद्ध विजय के बाद राणा प्रताप युद्ध से विमुख होकर लौट रहे थे तब मुसलमान सैनिकों ने उनका पिछा किया । मानसिंह ने पिछा करने वाले सैनिकों को वापस बुला लिया था व लूटपाट कि आजादी नही दी ।
इस घटना कि सूचना जब अकबर को मिली तो वह इतना नाराज हुआ कि कुछ महिनों तक मानसिंह से मिला नहीं । लेकिन उससे एक अधिक कुछ भी वह कर नहीं पाया ।।

राजा मानसिंह आमेर- नितीज्ञ !

इतिहास में जिस काल को राजपूत काल कहा जाता है उसमें विदेशियों व तथाकथित बुद्धिजीवीयों के अनुसार राजपूत बिना परिणाम के बारे में सोचे यूं ही लङते रहे व मरते रहे । राज्य करने वाले के लिए निती का अनुसरण करना आवश्यक है, और निति का अर्थ है ऐसे उपाय करना जिससे हर हालात में विजय प्राप्त हो । राजपूतों ने विजय को महत्व नहीं दिया व त्याग, बलिदान को सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाया । जिसका परिणाम यह हुआ कि उनकी किर्ती ने तो इतनी उँचाई प्राप्त की जहां को दुसरा पहुँच ना सका लेकिन उनके राज्य व शक्ति दिन प्रतिदिन क्षीण होती चली गई, व मुगलकाल के आते आते तो राजपूत शक्ति पूरी तरह क्षीण हो गयी थी ।।
ऐसे समय में आमेर के राजा भारमल ने निति का आश्रय ले अकबर से समझौता किया । दुसरे राजपूत राजाओं को भी मुगलों से संधी कर अपनी शक्ति बढाने को प्रेरित किया । अकबर का शासन आरम्भ होने के समय जो राजपूत शक्ति इतनी दुर्बल हो गयी थी कि उसे शक्ति के रुप में स्वीकारा ही नही जा रहा था । अकबर के शासनकाल में वही शक्ति पुनर्जिवीत हुई व मुगलों के बराबर की शक्ति बन गयी ।।

राजपूतों ने विज्ञान के विकास की ओर कोई ध्यान नही दिया जिसके परिणामस्वरूप जब मुसलमानों ने बंदूक व तोपों का आविष्कार कर लिया तो राजपूतों को पराजित होना पङा । मानसिंह पहला शासक था जिसने वैज्ञानिक हथियारों के विकास की तरफ ध्यान दिया । आज जहाँ जयगढ का किला है आमेर में उस स्थान पर हथियार बनाने का कारखाना खोला गया व दुसरे राजपूत राजाओं को भी यह तकनीक उपलब्ध करवाई लेकिन इस कौम का दुर्भाग्य देखिये मानसिंह कि मृत्यु के बाद किसी ने भी हथियारों के विकास की तरफ ध्यान नहीं दिया ।
सिंधिया, मराठे, जाट खुद हथियारों का निर्माण नही कर सके तो विदेशों से आधुनिक तोपें खरीदकर ले आए लेकिन राजपूतों ने कोई पटाखे बनाने का कारखाना भी नहीं खोला ।।

साभार- देवीसिंह महार साहब ।।

No comments

Post a comment