Tuesday, 8 November 2016

राष्ट्रकूट वंश

राष्ट्रकूट वंश

राष्ट्रकूट वंश का आरम्भ 'दन्तिदुर्ग' से लगभग 736 ई. में हुआ था। उसने नासिक को अपनी राजधानी बनाया। इसके उपरान्त इन शासकों ने मान्यखेत, (आधुनिक मालखंड) को अपनी राजधानी बनाया। राष्ट्रकूटों ने 736 ई. से 973 ई. तक राज्य किया।
राष्ट्रकूट वंशीय शासक
शासकों के नाम शासन काल
दन्तिदुर्ग (736-756 ई.)
कृष्ण प्रथम (756-772 ई.)
गोविन्द द्वितीय (773-780 ई.)
ध्रुव धारावर्ष (780-793 ई.)
गोविन्द तृतीय (793-814 ई.)
अमोघवर्ष प्रथम (814-878 ई.)
कृष्ण द्वितीय (978-915 ई.)
इन्द्र तृतीय (915-917 ई.)
अमोघवर्ष द्वितीय (917-918 ई.)
गोविन्द चतुर्थ (918-934 ई.)
अमोघवर्ष तृतीय (934-939 ई.)
कृष्ण तृतीय (939-967 ई.)
खोट्टिग अमोघवर्ष (967-972 ई.)
कर्क द्वितीय (972-973 ई.)

शासन तन्त्र

राष्ट्रकूटों ने एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली को जन्म दिया था। प्रशासन राजतन्त्रात्मक था। राजा सर्वोच्च शक्तिमान था। राजपद आनुवंशिक होता था। शासन संचालन के लिए सम्पूर्ण राज्य को राष्ट्रों, विषयों, भूक्तियों तथा ग्रामों में विभाजित किया गया था। राष्ट्र, जिसे 'मण्डल' कहा जाता था, प्रशासन की सबसे बड़ी इकाई थी। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई 'ग्राम' थी। राष्ट्र के प्रधान को 'राष्ट्रपति' या 'राष्ट्रकूट' कहा जाता था। एक राष्ट्र चार या पाँच ज़िलों के बराबर होता था। राष्ट्र कई विषयों एवं ज़िलों में विभाजित था। एक विषय में 2000 गाँव होते थे। विषय का प्रधान 'विषयपति' कहलाता था। विषयपति की सहायता के लिए 'विषय महत्तर' होते थे। विषय को ग्रामों या भुक्तियों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक भुक्ति में लगभग 100 से 500 गाँव होते थे। ये आधुनिक तहसील की तरह थे। भुक्ति के प्रधान को 'भोगपति' या 'भोगिक' कहा जाता था। इसका पद आनुवांशिक होता था। वेतन के बदले इन्हें करमुक्त भूमि प्रदान की जाती थी। भुक्ति छोटे-छोटे गाँव में बाँट दिया गया था, जिनमें 10 से 30 गाँव होते थे। नगर का अधिकारी 'नगरपति' कहलाता था।
प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम के अधिकारी को 'ग्रामकूट', 'ग्रामपति', 'गावुण्ड' आदि नामों से पुकारा जाता था। इसकी एक ग्राम सभा भी थी, जिसमें ग्राम के प्रत्येक परिवार का सदस्य होता था। गाँव के झगड़े का निपटारा करना इसका प्रमुख कार्य था।

राजस्व प्रणाली

आय का प्रमुख साधन भूमि कर था। नियमित करों में 'उद्रंग', 'उपरिक', 'शुल्क' तथा 'विकर' प्रमुख कर थे। उद्रंग या भागकर उत्पादन का 1/4 था। मुद्रा प्रणाली विकसित थी। राष्ट्रकूट मुद्राओं में 'द्रम्य', 'सुवर्ण', 'गध्यांतक', 'कतंजु' तथा 'कसु' का उल्लेख मिलता है। इसमें कलंजु, गध्यांतक तथा कसु स्वर्ण मुद्राएँ थीं।

धर्म

 राष्ट्रकूट शासकों के संरक्षण में ब्राह्मण एवं जैन धर्म का अधिक विकास हुआ। ब्राह्मण धर्म सर्वाधिक प्रचलित था। प्रारम्भिक राष्ट्रकूट शासक ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे तथा विष्णु एवं शिव की आराधना करते थ। राष्ट्रकूट शासक अपनी शासकीय मुद्राओं पर गरुढ़, शिव अथवा विष्णु के आयुधों का प्रयोग करते थे। ब्राह्मण धर्म की तुलना में जैन धर्म का अधिक प्रचार-प्रसार हुआ। इसे राजकीय संरक्षण प्रदान था। राष्ट्रकूट शासक अमोघवर्ष के समय में जैन धर्म का सर्वाधिक विकास हुआ। अमोघवर्ष के गुरु 'जिनसेन' जैन थे, जिसने ‘आदि पुराण’ की रचना की। युवराज कृष्ण का अध्यापक गुणभद्र प्रसिद्ध जैनाचार्य था। गंग शासक वेंकेट या उसके पुत्र लोकादित्य जैन धर्म के अनुयायी थे। राष्ट्रकूटों के प्रसिद्ध सेनापति श्री विजय नरसिंह आदि जैन थे।

साहित्यिक उपलब्धियाँ

राष्ट्रकूट काल साहित्यिक उन्नति के लिए भी प्रसिद्ध रहा है। अग्रहार उच्च संस्कृत शिक्षा का केन्द्र था। यहाँ पर ब्राह्मण संस्कृत विद्या की शिक्षा दी जाती थी। अग्रहार के अतिरिक्त मन्दिर भी उच्च शिक्षा का केन्द्र था। मान्यखेट, पैठन, नासिक, करहद आदि शिक्षा के उच्च केन्द्र थे। संस्कृत के अनेक विद्वान तथा लेखक-'कुमारिल भट्ट', 'वाचस्पति', 'लल्ल', 'कात्यायन', 'राजशेखर', 'अंगिरस' इसी युग के हैं। इसके अतिरिक्त अन्य विद्वानों में 'हलायुध', 'अश्लक', 'विद्यानंद', 'जिनसेन', 'प्रभाचन्द्र', 'हरिषेण', 'गुणभद्र' और 'सोमदेव' प्रमुख थे। हलायुध, जिसने ‘कवि रहस्य’ नामक ग्रन्थ लिखा, कृष्ण तृतीय का दरबारी कवि था। कृष्ण तृतीय के ही शासन काल में 'अवलंक' और 'विद्यानन्द' ने जैन ग्रन्थ 'आप्त मीमांसा' पर 'अष्टशती' एवं 'अष्टसहस्त्री' टीकाएँ लिखीं। इसी काल में 'मणिक्यनन्दिन' ने ‘परीक्षामुख शास्त्र’ की रचना की, जो न्याय शास्त्र का प्रमुख ग्रन्थ माना गया है। राष्ट्रकूट शासक स्वयं एक उच्चकोटि का विद्वान था, उसने कन्नड़ भाषा में ‘कविराज मार्ग’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इसके गुरु एवं आचार्य जिनसेन ने 'आदि पुराण', 'हरिवंश' तथा 'पाश्र्वभ्युदय' की रचना की। इसी समय के महान गणितज्ञ 'वीराचार्य' ने 'गणिसारसंग्रह' की रचना की तथा शाकटायन ने 'अमोघवृत्ति' की रचना की। राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय के शासन काल में महाकवि 'त्रिविक्रम' ने ‘नलचम्पू’ काव्य की रचना की। 9वीं शताब्दी में सोमदेव ने यशस्तिक चम्पू नामक उच्च कोटि के ग्रन्थ की रचना की। उसकी एक अन्य रचना ‘नीति वाक्यमृत’ है, जो तत्कालीन राजनीतिक सिद्धान्तों का मानक ग्रन्थ माना जाता है। 10वीं शताब्दी के महानकवि 'पम्प' ने कन्नड़ भाषा में ‘आदि पुराण’ तथा ‘विक्रमार्जुन विजय’ की रचना की। आदि पुराण में प्रथम जैन तीर्थकरों का उल्लेख किया गया है।
कन्नड़ कवि 'पोत्र' (950) ने रामायण की कहानी पर आधारित ‘रामकथा’ तथा ‘शान्तिपुराण’ नामक ग्रन्थ की रचना की। 'रन्न' (993 ई.) ने 'गदायुद्ध' तथा 'अजीत तीर्थकर पुराण' की रचना की। गंगवाड़ी राज्य के प्रसिद्ध सेनापति 'चामुण्डराज' ने ‘चामुण्डराज पुराण’ नामक ग्रन्थ लिखा; जिसे गद्य साहित्य का उत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है।

कला

राष्ट्रकूटों के समय का सबसे विख्यात मंदिर एलोरा का कैलाश मंदिर है। इसका निर्माण कृष्ण प्रथम के शासनकाल में किया गया था। भड़ौदा अभिलेख में इस मन्दिर की भव्यता का वर्णन मिलता है। दशावतार मन्दिर दो मंजिला ब्राह्मण मन्दिर का एक मात्र उदाहरण है। इनके जैन मन्दिर पाँच मंजिलें हैं, जिनमें इन्द्रमहासभा, छोटा कैलाश तथा जगन्नाथ सभा प्रमुख हैं।

गोविन्द प्रथम

 गोविन्द प्रथम मान्यखेट में अपनी राजधानी बनाकर दक्षिण पथ पर शासन करने वाले, जिन राष्ट्रकूट राजाओं ने सर्वप्रथम अपने वंश की वास्तविक राजनीतिक प्रतिष्ठा स्थापित की, उनमें प्रमुख थे दंतिदुर्ग और कृष्ण प्रथम। उनके पूर्व उस राजकुल में अन्य अनेक सामंत राजा हो चुके थे। गोविंद प्रथम उन्हीं में से एक था
राष्ट्रकूटों की किसी अन्य सामान्य शाखा में भी गोविंद नाम का कोई सरदार हो चुका था। इसका आधार है विभिन्न वंशावलियों में गोविंद नाम की क्रम से दो बार प्राप्ति हुई।
मुख्य शाखा का गोविंद प्रथम सामंत उपाधियों को धारण करता था, जो दूसरे गोविंद के बारे में नहीं कहा जा सकता था।
डा. अल्तेकर, उसका संभावित काल 690 ई. से 710 ई. तक निश्चित करते हैं। कुछ राष्ट्रकूट अभिलेखों से उसके शैव होने की बात ज्ञात होती है।

दन्तिदुर्ग

राष्ट्रकूट वंश की स्थापना 736 ई. में दंतिदुर्ग ने की थी। राष्ट्रकूट वंश के उत्कर्ष का प्रारम्भ दन्तिदुर्ग द्वारा हुआ।
किंतु उससे पहले भी इस वंश के राज्य की सत्ता थी, यद्यपि उस समय इसका राज्य स्वतंत्र नहीं था।
सम्भवतः वह चालुक्य साम्राज्य के अंतर्गत था।
उसने माल्यखेत या मालखंड को अपनी राजधानी बनाया। उसने कांची, कलिंग, कोशल, श्रीशैल, मालवा, लाट एवं टंक पर विजय प्राप्त कर राष्ट्रकूट साम्राज्य को विस्तृत बनाया।
उसके विषय में कहा जाता है कि उसने उज्जयिनी में हरिण्यगर्भ (महादान) यज्ञ किया था।
उसने चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन द्वितीय को एक युद्ध में पराजित किया था।
उसने महाराजधिराज परमेश्वर, परमभट्टारक आदि उपाधियां धारण की थी।
चालुक्य शासक विक्रमादित्य ने उसे पृथ्वी वल्लभ या खड़वालोक की उपाधि दी थी।
दन्तिदुर्ग ने न केवल अपने राज्य को चालुक्यों की अधीनता से मुक्त ही किया, अपितु अपनी राजधानी मान्यखेट (मानखेट) से अन्यत्र जाकर दूर-दूर तक के प्रदेशों की विजय भी की।
उत्कीर्ण लेखों में दन्तिदुर्ग द्वारा विजित प्रदेशों में काञ्जी, मालवा और लाट को अंतर्गत किया गया है।
कोशल का अभिप्राय सम्भवतः 'महाकोशल' है। महाकोशल, मालवा और लाट (गुजरात) को जीतकर वह निःसन्देह दक्षिणापथपति बन गया था, क्योंकि महाराष्ट्र में तो उसका शासन था ही।
काञ्जी की विजय के कारण दक्षिणी भारत का पल्लव राज्य भी उसकी अधीनता में आ गया था। जो प्रदेश वातापी चालुक्यों सम्राटों की अधीनता में थे, प्रायः वे सब अब दन्तिदुर्ग के आधिपत्य में आ गए थे।
दक्षिणापथ के क्षेत्र में राष्ट्रकूट वंश चालुक्यों का उत्तराधिकारी बन गया था।

कृष्ण प्रथम

कृष्ण प्रथम राष्ट्रकूट वंश के सबसे योग्य शासकों में गिना जाता था। इसे 'कृष्णराज' भी कहा जाता था। चालुक्यों की शक्ति को अविकल रूप से नष्ट करके राष्ट्रकूट राजा कृष्णराज ने कोंकण और वेंगि की भी विजय की थी। कृष्णराज की ख्याति उसकी विजय यात्राओं के कारण उतनी नहीं है, जितनी कि उस 'कैलाश मन्दिर' के कारण है, जिसका निर्माण उसने एलोरा में पहाड़ काटकर कराया था। कृष्ण प्रथम ने 'राजाधिराज परमेश्वर' की उपाधि ग्रहण की थी।
राष्ट्रकूट शासक दन्तिदुर्ग के कोई पुत्र नहीं था। अतः उसकी मृत्यु के बाद उसका चाचा 'कृष्णराज' मान्यखेट के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
राष्ट्रकूटों के द्वारा परास्त होने के बाद भी चालुक्यों की शक्ति का पूर्णरूप से अन्त नहीं हुआ था। उन्होंने एक बार फिर अपने उत्कर्ष का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।
दंतिदुर्ग के चाचा एवं उत्तराधिकारी कृष्णराज (कृष्ण प्रथम) ने बादामी के चालुक्यों के अस्तित्व को पूर्णतः समाप्त कर दिया।
कृष्ण प्रथम ने मैसूर के गंगो की राजधानी मान्यपुर एवं लगभग 772 ई. में हैदराबाद को अपने अधिकार क्षेत्र में कर लिया। उसने सम्भवतः दक्षिण कोंकण के कुछ भाग को भी जीता था। इसके प्रतिहार राजा ने द्वारपाल का कार्य किया।
चालुक्यों की शक्ति को अविकल रूप से नष्ट करके राष्ट्रकूट राजा कृष्णराज ने कोंकण और वेंगि की भी विजय की।
पर कृष्णराज की ख्याति उसकी विजय यात्राओं के कारण उतनी नहीं है, जितनी कि उस 'कैलाश मन्दिर' के कारण है, जिसका निर्माण उसने एलोरा में पहाड़ काटकर कराया था।
एलोरा के गुहा मन्दिरों में कृष्णराज द्वारा निर्मित कैलाश मन्दिर बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है, और उसकी कीर्ति को चिरस्थायी रखने के लिए पर्याप्त है। उसने ऐलोरा में सुप्रसिद्ध गुहा मंदिर (कैलाशनाथ मंदिर) का एक ही चट्टान काटकर निर्माण करवाया। यह एक आयताकार प्रांगण के बीच स्थित है तथा द्रविड़ कला का अनुपम उदाहरण है।
कृष्णराज का भाई गोविन्द अत्यन्त कमज़ोर शासक होने के कारण अधिक दिन तक शासन नहीं कर सके ।

गोविन्द द्वितीय

772 ई. में कृष्णराज की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गोविन्द राजा बना।
वह भोग-विलास में मस्त रहता था, और राज्य-कार्य की उपेक्षा करता था।
आठवीं सदी में कोई ऐसा व्यक्ति सफलतापूर्वक राजपद नहीं सम्भाल सकता था, जो 'उद्यतदण्ड' न हो। अतः उसके शासन काल में भी राज्य का वास्तविक संचालन उसके भाई ध्रुव के हाथों में था।
अवसर पाकर ध्रुव स्वयं राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया। उसका शासन काल 779 ई. में शुरू हुआ था। इस युग में उत्तरी भारत में दो राजशक्तियाँ प्रधान थीं, गुर्जर प्रतिहार राजा और मगध के पालवंशी राजा।

ध्रुव धारावर्ष

772 ई. में कृष्णराज की मृत्यु होने पर उसका पुत्र गोविन्द राजा बना।
वह भोग-विलास में मस्त रहता था, और राज्य-कार्य की उपेक्षा करता था।
आठवीं सदी में कोई ऐसा व्यक्ति सफलतापूर्वक राजपद नहीं सम्भाल सकता था, जो 'उद्यतदण्ड' न हो। अतः उसके शासन काल में भी राज्य का वास्तविक संचालन उसके भाई ध्रुव के हाथों में था।
अवसर पाकर ध्रुव स्वयं राजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया। उसका शासन काल 779 ई. में शुरू हुआ था। इस युग में उत्तरी भारत में दो राजशक्तियाँ प्रधान थीं, गुर्जर प्रतिहार राजा और मगध के पालवंशी राजा।
गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज और पाल राजा धर्मपाल राष्ट्रकूट राजा ध्रुव के समकालीन थे।
ध्रुव ने सिंहासन पर बैठने के उपरान्त वेंगी के चालुक्य नरेश विष्णु वर्धन, पल्लव नरेश दंति वर्मन एवं मैसूर के गंगो को पराजित किया।
उत्तर भारत के ये दोनों राजा प्रतापी और महत्त्वाकांक्षी थे, और उनके राज्यों की दक्षिणी सीमाएँ राष्ट्रकूट राज्य के साथ लगती थीं। अतः यह स्वाभाविक था, कि इनका राष्ट्रकूटों के साथ संघर्ष हो। यह संघर्ष ध्रुव के समय में ही शुरू हो गया था, पर उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल में इसने बहुत उग्र रूप धारण कर लिया।
शुरू में ध्रुव की शक्ति अपने भाई गोविन्द के साथ संघर्ष में व्यतीत हुई। अनेक सामन्त राजा और ज़ागीरदार ध्रुव के विरोधी थे और गोविन्द का पक्ष लेकर युद्ध के लिए तत्पर थे। ध्रुव ने उन सबको परास्त किया, और अपने राज्य में सुव्यवस्था स्थापित कर दक्षिण की ओर आक्रमण किया।
मैसूर के गंग वंश को परास्त कर उसने काञ्जी पर हमला किया, और पल्लवराज को एक बार फिर राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकृत करने के लिए विवश किया।
दक्षिण की विजय के बाद वह उत्तर की ओर बढ़ा। सबसे पूर्व भिन्नमाल के गुर्जर प्रतिहार राजा वत्सराज के साथ उसकी मुठभेड़ हुई। वत्सराज परास्त हो गया।
अब ध्रुव ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस समय कन्नौज का राजा इन्द्रायुध था। वह ध्रुव का सामना नहीं कर सका, और राष्ट्रकूट विजेता की अधीनता को स्वीकृत करने के लिए विवश हुआ।
ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु 'त्रिपक्षीय संघर्ष' में भाग लेकर प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।
उसने गंगा-यमुना दोआब तक अधिकार कर लिया था।
कन्नौज के राज्य को अपना वशवर्ती बनाने के उपलक्ष्य में ध्रुव ने गंगा और यमुना को भी अपने राजचिह्न्नों में शामिल कर लिया। इस प्रकार अनेक राज्यों की विजय कर 794 ई. में ध्रुव की मृत्यु हुई।
ध्रुव को 'धारावर्ष' भी कहा जाता था।
इसके अतिरिक्त उसकी अन्य उपाधि 'निरुपम', 'कालीवल्लभ' तथा 'श्री वल्लभ' था।

गोविन्द तृतीय

गोविन्द तृतीय ध्रुव का पुत्र एवं राष्ट्रकूट वंश का उत्तराधिकारी था। वह ध्रुव का ज्येष्ठ पुत्र नहीं था, किंतु उसकी योग्यता को दृष्टि में रखकर ही उसके पिता ने उसे ही अपना उत्तराधिकारी नियत किया था। ध्रुव का ज्येष्ठ पुत्र 'स्तम्भ' था, जो गंगवाड़ी (यह प्रदेश पहले गंग वंश के शासन में था, पर अब राष्ट्रकूटों के अधीन हो गया था) में अपने पिता के प्रतिनिधि के रूप में शासन कर रहा था। उसने अपने छोटे भाई के विरुद्ध विद्रोह कर दिया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। शीघ्र ही गोविन्द तृतीय उसे परास्त करने में सफल हुआ। अपने भाई के विरुद्ध आक्रमण करने के अवसर पर ही गोविन्द तृतीय ने वेंगि और कांची पर पुनः हमले किए, और इनके राजाओं को वशवर्ती होने के लिए विवश किया। सम्भवतः ये राजा गोविन्द और स्तम्भ के गृहयुद्ध के कारण उत्पन्न परिस्थिति से लाभ उठाकर स्वतंत्र हो गए थे।

विजय अभियान

दक्षिण भारत में अपने विशाल शासन को भली-भाँति स्थापित कर गोविन्द तृतीय ने उत्तरी भारत की ओर रुख़ किया। गोविन्द तृतीय के पिता ध्रुव ने भिन्नमाल के राजा वत्सराज को परास्त कर अपने अधीन कर लिया था। दक्कन में अपनी स्थिति मज़बूत करने के उपरान्त उसने कन्नौज पर अधिपत्य हेतु 'त्रिपक्षीय संघर्ष' में भाग लेकर चक्रायुध एवं उसके संरक्षक धर्मपाल तथा प्रतिहार वंश के नागभट्ट द्वितीय को परास्त कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया। जिस समय गोविन्द तृतीय उत्तर भारत के अभियान में व्यस्त था, उस समय उसकी अनुपस्थिति का फ़ायदा उठा कर उसके विरुद्ध पल्लव, पाण्ड्य, चेर एवं गंग शासकों ने एक संघ बनाया, पर 802 ई. के आसपास गोविन्द ने इस संघ को पूर्णतः नष्ट कर दिया।

राष्ट्रकूटों का उत्कर्ष

ध्रुव की मृत्यु के बाद राष्ट्रकूट राज्य में जो अव्यवस्था उत्पन्न हो गई थी, उससे लाभ उठाकर भिन्नमाल के गुर्जर प्रतिहार राजा अपनी शक्ति की पुनः स्थापना के लिए तत्पर हो गए थे। वत्सराज के बाद गुर्जर प्रतिहार वंश का राजा इस समय नागभट्ट था। गोविन्द तृतीय ने उसके साथ युद्ध किया, और 807 ई. में उसे परास्त किया। गुर्जर प्रतिहारों को अपना वशवर्ती बनाकर राष्ट्रकूट राजा ने कन्नौज पर आक्रमण किया। इस समय कन्नौज के राजसिंहासन पर राजा चक्रायुध आरूढ़ था। यह पाल वंशी राजा धर्मपाल की सहायता से इन्द्रायुध के स्थान पर कन्नौज का अधिपति बना था। उसकी स्थिति पाल सम्राट के महासामन्त के जैसी थी, और उसकी अधीनता में अन्य बहुत से राजा सामन्त के रूप में शासन करते थे। चक्रायुध गोविन्द तृतीय के द्वारा परास्त हुआ, और इस विजय यात्रा में राष्ट्रकूट राजा ने हिमालय तक के प्रदेश पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। पालवंशी राजा धर्मपाल भी गोविन्द तृतीय के सम्मुख असहाय था। कन्नौज के राजा चक्रायुध द्वारा शासित प्रदेश पाल साम्राज्य के अंतर्गत थे, पर धर्मपाल में यह शक्ति नहीं थी, कि वह राष्ट्रकूट आक्रमण से उनकी रक्षा कर सकता। राष्ट्रकूटों के उत्कर्ष के कारण पाल वंश का शासन केवल मगध और बंगाल तक ही सीमित रह गया।

शत्रुओं का संगठन
गोविन्द तृतीय के आक्रम
णों और विजयों का वर्णन करते हुए पेशवाओं का वर्णन भी ध्यान आता है, जो राष्ट्रकूटों के समान ही दक्षिणापथ के राजा थे, पर जिनके कतिपय वीर पुरुषों ने उत्तरी भारत में हिमालय और सिन्ध नदी तक विजय यात्राएँ की थीं। जिस समय गोविन्द तृतीय उत्तरी भारत की विजय में तत्पर था, सुदूर दक्षिण के पल्लव, गंग, पांड्य, केरल आदि वंशों ने उसके विरुद्ध एक शक्तिशाली संघ को संघठित किया, जिसका उद्देश्य दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट आधिपत्य का अन्त करना था। पर यह संघ अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुआ। ज्यों ही गोविन्द तृतीय को यह समाचार मिला, उसने तुरन्त दक्षिण की ओर प्रस्थान किया, और इस संघ को नष्ट कर दिया।
गोविन्द तृतीय के शासन काल को राष्ट्रकूट शक्ति का चरमोत्कर्ष काल माना जाता है। गोविन्द तृतीय ने पाल शासक से मालवा छीनकर अपने एक अधिकारी परमार वंश के उपकेन्द्र को सुपर्द कर दिया।

अमोघवर्ष प्रथम

814 ई. में गोविन्द तृतीय की मृत्यु हो जाने पर उसका पुत्र अमोघवर्ष मान्यखेट के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
उसने पूर्वी चालुक्यों एवं गंगो से लम्बी लड़ाई लड़नी पड़ी।
वह योग्य शासक होने के साथ-साथ जिनसेन 'आदिपुराण' के रचनाकार, महावीरचार्य 'गणितसार-संग्रह' के रचनाकार एवं सक्तायाना 'अमोघवर्ष 'के रचनाकार जैसे विद्धानों का आश्रयदाता भी था।
उसने स्वयं ही कन्नड़ के प्रसिद्ध ग्रंथ 'कविराज मार्ग' की रचना की।
अमोघवर्ष ने ही 'मान्यखेत' को राष्ट्रकूट की राजधानी बनाया।
तत्कालीन अरब यात्री सुलेमान ने अमोघवर्ष की गणना विश्व के तत्कालीन चार महान शासकों में की थी।
वह जैन मतावलम्बी होते हुए भी हिन्दू देवी देवताओं का सम्मान करता था।
वह महालक्ष्मी का अनन्त भक्त था।
संजन ताम्रपत्र से यह पता चलता है कि उसने एक अवसर पर देवी को अपने बाएं हाथ की उंगली चढ़ा दी थी। उसकी तुलना शिव, दधीचि जैसे पौराणिक व्यक्तियों से की जाती है।
राष्ट्रकूट साम्राज्य में उसके विरोधियों की भी कमी नहीं थी। इस स्थिति से लाभ उठाकर न केवल अनेक अधीनस्थ राजाओं ने स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, अपितु विविध राष्ट्रकूट सामन्तों और राजपुरुषों ने भी उसके विरुद्ध षड़यंत्र आरम्भ कर दिए।
अमोघवर्ष का मंत्री करकराज था। अपने सामन्तों के षड़यंत्रों के कारण कुछ समय के लिए अमोघवर्ष को राजसिंहासन से भी हाथ धोना पड़ा। पर करकराज की सहायता से उसने राजपद पुनः प्राप्त किया।
आंतरिक अव्यवस्था के कारण अमोघवर्ष राष्ट्रकूट साम्राज्य को अक्षुण्ण रख सकने में असमर्थ रहा, और चालुक्यों ने राष्ट्रकूटों की निर्बलता से लाभ उठाकर एक बार फिर अपने उत्कर्ष के लिए प्रयत्न किया। इसमें उन्हें सफलता भी मिली।
अमोघवर्ष के शासन काल में ही कन्नौज के गुर्जर प्रतिहार राजा मिहिरभोज ने अपने विशाल साम्राज्य का निर्माण किया, और उत्तरी भारत से राष्ट्रकूटों के शासन का अन्त कर दिया।
गुर्जर प्रतिहार लोग किस प्रकार कन्नौज के स्वामी बने, और उन्होंने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।
यह सर्वथा स्पष्ट है, कि अमोघवर्ष के समय में राष्ट्रकूट साम्राज्य का अपकर्ष प्रारम्भ हो गया था।
अमोघवर्ष ने 814 से 878 ई. तक शासन किया।

कृष्ण द्वितीय

अमोघवर्ष की मृत्यु के बाद उसका पुत्र कृष्ण द्वितीय 878 ई. में राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
अमोघवर्ष के इस उत्तराधिकारी को प्रतिहार एवं चोल शासकों से परास्त होना पड़ा।
वह एक कमज़ोर शासक था।
उसका शासन काल मुख्यतया चालुक्यों के साथ संघर्ष में व्यतीत हुआ।
वेंगि और अन्हिलवाड़ा में चालुक्यों के जो दो राजवंश इस समय स्थापित हो गए थे, उन दोनों के साथ ही उसके युद्ध हुए।
अब राष्ट्रकूटों में इतनी शक्ति नहीं रह गई थी, कि वे अपने प्रतिस्पर्धी चालुक्यों को पराभूत कर सकते।
कन्नौज के गुर्जर प्रतिहारों के साथ भी कृष्ण द्वितीय के अनेक युद्ध हुए, पर न गुर्जर प्रतिहार दक्षिणापथ को अपनी अधीनता में ला सके, और न ही गोविन्द तृतीय के समान कृष्ण द्वितीय ही हिमालय तक विजय यात्रा कर सका।

इन्द्र तृतीय

इन्द्र तृतीय (915-917 ई.) कृष्ण द्वितीय के बाद राष्ट्रकूट राज्य का स्वामी बना था। यह कृष्ण द्वितीय का पौत्र था। यद्यपि शासन की बागडोर उसके हाथों में सिर्फ़ चार वर्ष तक ही रही थी, किन्तु इतने कम समय में ही इन्द्र तृतीय ने विलक्षण पराक्रम का परिचय दे दिया था।

साम्राज्य विस्तार

इन्द्र तृतीय ने पाल वंश के देवपाल प्रथम को परास्त करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उसने अपने अल्प शासन काल में ही साम्राज्य को काफ़ी विस्तार प्रदान कर दिया था। उसके समय में ही अल मसूदी अरब से भारत आया था। अल मसूदी ने तत्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को 'भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक' कहा। इन्द्र तृतीय का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य था- गुर्जर प्रतिहार तथा राजा महीपाल को परास्त करना। कन्नौज के प्रतापी सम्राट मिहिरभोज की मृत्यु 890 ई. में हो चुकी थी और उसके बाद निर्भयराज महेन्द्र (890-907 ई.) ने गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य को बहुत कुछ सम्भाले रखा था, लेकिन महेन्द्र के उत्तराधिकारी महीपाल के समय में कन्नौज की शक्ति घटना प्रारम्भ हो गई थी। इसीलिए राष्ट्रकूट राजा कृष्ण ने भी उस पर अनेक आक्रमण किए थे।
कन्नौज की विजय


इन्द्र तृतीय ने तो कन्नौज की शक्ति को जड़ से ही हिला दिया। उसने एक बहुत बड़ी सेना लेकर उत्तरी भारत पर आक्रमण किया और कन्नौज पर चढ़ाई कर इस प्राचीन नगरी का बुरी तरह से सत्यानाश किया। राजा महीपाल उसके सम्मुख असहाय था। इन्द्र ने प्रयाग तक उसका पीछा किया और राष्ट्रकूट सेनाओं के घोड़ों ने गंगा के जल द्वारा अपनी प्यास को शान्त किया।

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