Thursday, 29 September 2016

कुँवर मानसिंह - काबुल के गवर्नर के रुप में ।




कुँवर मानसिह - काबुल के गवर्नर के रुप में ।
पंजाब और उत्तर पश्चिम सीमा प्रदेश में मानसिंह की नियुक्ति उसकी सफलता का एक मील का पत्थर था । भारत का उत्तर पश्चिम भाग एक अशान्त प्रदेश था, जब हाँ अफगान लोग और विद्रोही अफरीदी लोग पंजाब क्षेत्र के लिये एक निरन्तर भय के स्त्रोत बने हुए थे । इन विपरीत स्थितियों को देखकर कुँवर मानसिंह को पंजाब भेजा गया ।

अकबर ने राजा टोडरमल को पंजाब भेजा ताकि वह कछवाहा सरदारों की जागीरों में व्यवस्था स्थापित कर सके जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक सम्पन्न किया ।
पंजाब में कुँवर मानसिंह, भगवन्तदास, राजा गोपाल, जगमाल और दूसरे कछवाहा सरदार साथ थे ।
जब कश्मीर का शासक युसुफ खान आन्तरिक विद्रोह से पीङित हुआ तो उसने कुँवर मानसिंह से संरक्षण मांगा जिसने दुसरे मुगल सरदार मुहम्मद युसुफ खाँ की मदद से कश्मीर के शासक को शाही दरबार में पेश किया । जब काबुल के शासक मुहम्मद हकीम का पक्ष सुलेमान मिर्जा ने ग्रहण किया तो उसने बदकशाँ के बादशाह शाहरुख मुहम्मद जो कि अकबर का मित्र था पर एक सेना भेजने का निश्चय किया ।

लेकिन जब काबुल के बादशाह को पता लगा कि कुँवर मानसिंह, व राजा भगवन्तदास के संरक्षण में है बदकशाँ तो वह हमले का साहस नही जुटा पाया । इस समय कुँवर मानसिंह मात्र 3500 के मनसबदार थे लेकिन उनकी ख्याति फैलने लगी थी ।। उस काल में पंजाब कि राजधानी सियाल कोट थी और वही इनका मुख्यालय था । कुँवर मानसिंह के भाग्य में पृष्ठभूमि में अधिक दिनों तक रहने का विधान नहीं था । जनवरी 1580 में उन्हें एक जिम्मेदारी का कार्य सौंपा गया ।

उत्तर - पश्चिम सीमान्त प्रदेश में मुहम्मद युसुफ खान के प्रशासन के कार्यों के प्रबंध से अकबर प्रसन्न नहीं था, इसके फलस्वरूप उसे वहाँ से हटा दिया गया और उसका स्थान कुँवर मानसिंह को दिया गया । कुँवर को इसके अतिरिक्त पङौस के सिन्ध नदी के क्षेत्र भी प्रशासन के लिये सौंप दिये गये । कुँवर मानसिंह ने अपना मुख्यालय सियालकोट से हटाकर सिन्ध प्रदेश में कर लिया, ताकि मुगल भूभाग पर निकटता से नजर रख सकें । जल्दी ही उन्हें अपनी शूरवीरता एवं राजनीतिज्ञता दिखाने का सुअवसर प्राप्त हुआ ।।

जब कुँवर मानसिंह रावलपिण्डी में थें, उन्होंने मुगल भूभागों पर शादमान के हमले कि बात सुनी । काबुल का शासक मुहम्मद हकीम शादमान का बहुत आदर करता था । वह उसे "सेना की तलवार" मानता था । कुँवर ने यह भी सुना शादमान ने सिन्ध नदी पार कर ली है और "नीलम" के दुर्ग को घेर लिया है । जैनुद्दीन अली, जिसको कुँवर ने पूर्व में इस किले की रक्षा के लिये नियुक्त किया था, बङी वीरता से किले की रक्षा कर रहा था । कुँवर शीघ्र इस प्रदेश के लिये रवाना हुवे और 22 दिसम्बर 1580 को रात्रि में उन्होंने शादमान की फौजौं पर आक्रमण कर दिया ।

सेना की हरावल की कमान आलूखान व कछवाहा सूरजसिंह को सौंपी गयी । सूरजसिंह मानसिंह के भाई थे । काबुल की सेना पर उस समय हमला किया गया जब वे हमले के लिये जरा भी तैयार नही थी । इसका परिणाम यह हुआ कि शाही फौज के सामने अफगान सेनाओं की बुरी तरह पराजय हुई । सूरजसिंह के वार से शादमान घायल हो गया और पङौस में जाकर मर गया । शादमान की मौत और काबुल की फौजौ की पराजय की खबर सुनकर बादशाह बङा प्रसन्न हुआ ।
पर उसने अफगान सेनापति की म्रत्यु के कारण कुछ बखेड़ा पैदा होने की आशंका भी वयक्त की । वह इस बात के लिए लिए पूरी तरह आश्वस्त था की मिर्जा मुहम्मद हकीम अपने सेनापति की हार को चुपचाप बैठकर देखने वाला व्यक्ति नही है और वह निश्चित ही मुगल भू-भाग पर आक्रमण करेगा ।

अकबर ने इस कार्य पर राव रायसिंह, जगन्नाथ, राजा गोपाल और दुसरे स्वामीभक्त अधिकारियों को नियुक्त किया । इनके साथ बङी संख्या में हाथी भेजे गये ताकि कुँवर मानसिंह इनकी सहायता से मिर्जा को प्रभावी ढंग से रोकने व सामना करने में समर्थ हो सके । इतना प्रबंध करके ही अकबर संतुष्ट नहीं हुआ । उसने स्वयं पंजाब कि और बढ़ने का निश्चय किया । उसने मानसिंह को आदेश भेजा कि वह मिर्जा का खुलकर विरोध नहीं करे और उससे सीधा संघर्ष टालते रहे, क्योंकि बादशाह स्वयं अपने सौतेले भाई से अपनी शक्ति मापना चाहता था ।।

जिस समय कुँवर ने अफगान सेनापति शादमान को हराया था, उसने उसके कब्जे से तीन फरमान प्राप्त किये । इन्हें मिर्जा मुहम्मद हकीम ने जारी किये थे । ये हकीम उल मुल्क, मुहम्मद कासिम खान मीर-ए-बहर और ख्वाजा शाह मंसूर के लिये थे ।। ये फरमान इन लोगों द्वारा मुहम्मद हकीम को लिखे हुए पत्रों की स्वीकृति के रुप में थे । इन लोगों ने मिर्जा मुहम्मद हकीम को सभी प्रकार की सहायता का वचन दिया था, अगर वह भारत पर हमला करें । कुँवर ने ये फरमान बादशाह के पास फतेहपुर सीकरी में भेज दिये । मिर्जा के इन पत्रों से शाह मंसूर के प्रति बादशाह को सन्देह हो गया, फलस्वरूप फरवरी 27, 1581 को उसे फाँसी दे दी गयी ।।

जैसा कि अकबर ने संभावना प्रकट की थी मिर्जा मुहम्मद हकीम ने 1581 के प्रारम्भ में पंजाब पर आक्रमण कर दिया । मिर्जा के इस आक्रमण के पिछे कुछ सुनिश्चित कारण थे । अफगान बादशाह को मुगल सरदारों के कुछ पत्र मिले थें । जिनमें प्रमुख असिकाबुली, फरहकुंडी थे । इसके अलावा उसके मामा फरीदन ने भी भारत पर हमला करने के लिये उसे उकसाया था । उसका मानना था कि भारत पर हमला करने का यही उपयुक्त समय है ।

अपनी बात के समर्थन में फरीदन का यह तर्क था कि उस समय पुराने विचारों के मुसलमानों के बंगाल और बिहार में विद्रोह को कुचलने में अकबर व्यस्त था इसलिये पंजाब पर हुए अफगान आक्रमण की ओर वह पूरा ध्यान नहीं दे सकेगा । इस प्रकार मिर्जा मुगल साम्राज्य के पश्चिमी भूभाग पर कब्जा कर सकेगा । यह तर्क मिर्जा हकीम को अच्छा लगा जो स्वयं अपनी पराजय और अपने प्रिय सेनापति शादमान के निधन से बङा दुःखी था ।

फरवरी 1581 में जब अकबर पंजाब जाता हुआ दिल्ली पहुँचा । उसे सूचना मिली कि मिर्जा ने लाहौर में अपना शिविर स्थापित कर लिया है, जो महदी कासिम खान के बाग में है, और राजा भगवन्तदास, कुँवर मानसिंह और सैयद खान ने अपने आपको लाहौर के किले में बन्द कर लिया है । अकबर को यह भी सूचना मिली कि राजा भगवन्तदास और कुँवर मानसिंह काबुल कि सेना का खुले में अच्छे से सामना कर सकते थे, पर यह रणनीति के तहत ऐसा किया कि मिर्जा से टकराव से बचा जाये ।
इसी कारण वह लाहौर किले में बंद ही रहे आक्रमण नही किया ।।

कुँवर मानसिंह आमेर - काबुल के गवर्नर ।

काबुल अभियान के समय काबुल फौजौ को पराजित करना व सेनापति शादमान को मौत के घाट उतारकर कुँवर ने लाहौर का किला फतेह कर चुके थे यह पिछली पोस्ट में बताया जा चुका है ।


लाहौर का किला जीतने के बाद मिर्जा हाकीम से संघर्ष कि कहानी पुर्तगाली लेखक मोन्सेरेट द्वारा ।।

पुर्तगाली यात्री मोंसेरेट ने कुँवर मानसिंह द्वारा लाहौर पर हुए मिर्जा के हमले का विस्तृत वृतान्त दिया है । उसके कथन है :-

"मिरश्चिमस" (मिर्जा हाकिम) अपने हमले के दौरान लाहौर में पहुँचा और एक बहुत बड़े बाग़ के पूर्वी दिशा में अपना शिविर स्थापित किया । उसने किले के सेनापति मनसीनुस (मानसिंह) जो बागोनदास (भगवन्तदास) का पुत्र था को समर्पण करने का आदेश देता है ।
कुँवर मानसिंह ने उतर दिया की किले की संभाल का वचन दिया है में प्रतिज्ञा नही तोडूंगा, अगर तुम अपने भाग्य की जाँच करना चाहते है तो किले पर हमला बोल दे । मैं तुम्हारा मुकाबला करने को तैयार हूँ, अगर तुम्हें अपनी अधिक ताकतवर सेना का भरोसा है, तो मैं भी अपने आदमियों की वीरता के प्रति आस्वस्त हूँ, जो समर्पण करने के बजाय शीघ्र लड़कर मरना हजार गुणा पसन्द करेंगे ।

अगर तुम हमला बोलकर किले पर अधिकार कर लोगे तो मुझे अपनी जिंदगी की कोई चिंता नही है । मैं तो केवल अपना फर्ज निभा रहा हूँ ।।
इतना होते हुए भी मिरस्चीम्स(मिर्जा हाकिम) यह आशा करत्ते हुए की यह महान नगर उसके हाथों में आ जाएगा उसने नागरिको को प्रसन्न करने की इच्छा करते करते हुए चोरी और लूटपाट की आज्ञा नही दी । नगर के चार दीवारी नहीं थी । उसने सभी नागरिको और व्यापारियों को अश्वासन दिया की उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं करनी चाहिए ।
उसने कहा यह सिर्फ किले के सेनापति मानसिंह के विरुद्ध युद्ध है ।।

मोंसेरेट आगे चलकर लिखता है : "जब मोन्सीन्स(मानसिंह) ने समर्पण से इंकार कर दिया तो मिर्जा को इस लड़ाई को शुरु करने पर दुःख महसुस हुआ । उसने यह जान लिया की कोई भी बड़ा सरदार उसके सामने नही झुकेगा जब तक मानसिंह है, और वह विश्वश्घाती भी जिन्होंने उसे भारत में निमंत्रण किया था, अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते दिखाई नही दे रहे थे ।


क्योंकि उसे कोई कुमुक प्राप्त नही हई थी । वह मानसिंह की शक्ति व साधन से डरने लगा था । इस बात पर दुःख प्रकट करना शुरु किया की उसने एक अविचारित आक्रमण पर इतना पैसा खर्च कर दिया जिसकी असफलता पहले ही प्रकट हो चुकी है । उसकी रसद दिन पर दिन कम हो रही है ! उसने यह सोचना शुरु कर दिया लौटना पड़ेगा ।।
क्रमशः

साभार पुस्तक - राजा मानसिंह आमेर


लेखक - राजीव नयन प्रसाद (English)
अनुवाद - डाँ. रतनलाल मिश्र ( Hindi )
#राजा_मानसिंह_आमेर

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