Wednesday, 20 December 2017

पश्चिम को ढलता सूरज ।

पश्चिम को ढलता सूरज ।


पश्चिम को ढलता सूरज जैसलमेर के स्वर्ण मय दुर्ग को रक्ताभ चमका रहा है ।

किन्तु भय ये है कि जब अँधेरा घना होगा तब ये चमक कम होगी।
मन उदास हो गया ।

अचानक किले का परकोटा किसी फिल्म पर्दे में बदल गया ।
मुझे स्पष्ट दिख रहा था वीर देरावर और राव ताणु के घोड़े ।


टिड्डी दल की तरह उमड़ती गजनवी की सेना।
राव जैसल का पराक्रम।

गाजर मूली की भाति कटते पठान।
ढाई शाके ।

अतुल पराक्रम और उत्सर्ग के वे अद्भुत दृश्य। आहा !!
कैसा विहंगम और गौरवशाली इतिहास।

मान्य समाज के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने की होड ।
सहसा अँधेरा हुआ ।

दृश्य गायब।
दुर्ग से गंभीर प्रतिध्वनि सुनाई दी।-----"-उदास मत हो --पगले!!
केवल रात ही तो हुई है'; जो कि प्रकृति का नियम है ----
कुछ देर की बात है, फिर से सुबह होगी।"

साभार - केशरि सिंह जी ।

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