Friday, 6 July 2018

लोकतंत्र एक वास्तविकता - लेखक - देवीसिंह जी महार साहब

पुस्तक - जागरण की बेला - लेखक - देवीसिंह जी महार साहब

लोकतंत्र एक वास्तविकता 



आज लोकतंत्र हमारे देश के लिये ही नहीं, संसार के लिए एक वास्तविकता है । इस वास्तविकता को नकार कर परम्परा के नाम पर साम्राज्यवाद की कल्पनाओं में डूबे रहना अपने जीवन में विकृति को पैदा करने के समान है ।

जैसा कि पहले लिखा जा चुका है जब संसार पुण्यवान लोगों का अभाव हो जाता है, उस समय लोकतंत्र ही एकमात्र ऐसी व्यवस्था शेष रहती है जिसके अन्तर्गत येनकेन प्रकारेण समाजों व राष्ट्रों की व्यवस्था को सुचारू रखा जा सकता है । 

संसार में लोकतंत्र के विकास की ओर ध्यान देने पर जब हमारी दृष्टि मुस्लिम राष्ट्रों पर जाती है तो यह स्पष्ट रुप में दिखाई देने लगता है कि ये राष्ट्र लोकतंत्र को पचा नहीं पाये हैं । बार बार सैनिक शासन व सताओं में परिवर्तन मुस्लिम राष्ट्रों के लिए एक आम बात है ।



पिछले एक हजार वर्षों में मुसलमान एक नेता के नेतृत्व रहते आये हैं । जिसको हम सामन्तशाही या राजाशाही कहते आयें हैं, इसी परम्परा में मुस्लिम सभ्यता जन्मी, बङी हुई व फली फूली । इसलिए एक का अनुसरण करना, एक के विरुद्ध कही बात नहीं सुनना, एक कहे वही धर्म, इस परम्परा का मुस्लिम समाज अभ्यस्त हो चुका था ।

लोकतंत्र इस व्यवस्था का सीधा कुठाराघात करता है । जब लोगों के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात आती है तो लोग अच्छी ही बात की अभिव्यक्ति करें यह आवश्यक नहीं है । वे जैसी भी बात कहें, उसको सुनने व शान्ति के साथ सुनने की आदत लोकतंत्र में में होनी चाहिए ।
इस आदत का विकास मुस्लिम समाज नही कर पाया इसी के परिणामस्वरूप लोकतंत्र की आँधी इन राष्ट्रों को बार-बार झकझोरती है, इनकी व्यवस्थाओं को डांवाडोल करती है तथा अन्ततोगत्वा उनके राष्ट्रीय जीवन में अस्थिरता पैदा कर देती हैं ।

इसमें भी भयानक परिणाम उन्हें यह भोगना पङ रहा है कि अन्य लोकतांत्रिक देश उन्हें अपने से पृथक, विजातीय तत्व समझते है; जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अन्य राष्ट्रों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता है । हमारे सामाज की स्थिति आज मुस्लिम राष्ट्रों जैसी है । हमने हमारे सामाजिक संगठित को लोकतांत्रिक स्वरूप दिया है ।



देश की राजनीति में अपना स्थान बनाने के लिए हमने लोकतांत्रिक तरिके से चलने वाले राजनीतिक दलों में भी प्रवेश किया है । लेकिन परम्परागत नेताओं की जय - जयकार करना, अपनी आलोचना को नहीं सहन कर पाना व विचार के आधार पर चलने वाली पद्धति में सक्षम बनने योग्य विचारों का विकास नहीं कर पाना हमारे पिछड़ेपन का एक बहुत बङा कारण हैं ।

No comments

Post a comment