Tuesday, 8 May 2018

महाराजा मानसिंह आमेर - नरेन्द्रसिंह निभेड़ा

राजा दुर्लभराज चौहान तृतीय- सांभर (शाकम्भरी) 1079 ई.



राजा मानसिंह आमेर की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार कही जा सकती हैं:-

(1) एक कुशल राजनीतिज्ञ :- गीता सहित सम्पूर्ण क्षत्रिय शास्त्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि बिना नीति के शासन नहीं किया जा सकता है इसलिए इस नीतिशास्त्र का नाम ही राजनीति शास्त्र बन गया। नीति का अर्थ है जिसके द्वारा विजय प्राप्त की जाती है। दुर्बल पक्ष नीति का आश्रय लेकर ही सबल शत्रु पर विजय प्राप्त कर सकता है। नीति शास्त्र का कथन है यदि आपका पक्ष दुर्बल है तो सबल से समझौता कर उसको अपने सिर पर घड़े की तरह धारण कर लो व अपनी शक्ति का संचय करते रहो। जब तुम स्वयं सबल हो जाओ तो शत्रु रूपी घड़े को सिर पर से उठाकर ऐसे गिरा दो जिससे वह पूरी तरह नष्ट हो जाये। इतिहास साक्षी है कि राजपूत काल में क्षत्रिय व क्षत्राणियों ने ऐसी अद्भुत वीरता का परिचय दिया जिसकी तुलना अन्य किसी काल व देश से नहीं की जा सकती लेकिन उनका उद्देश्य केवल कर्तव्य पालन का भाव था, उसके साथ नीति का मिश्रण नहीं होने के कारण उनका अद्भुत पराक्रम व वीरता उनको विजय तक नहीं पहुँचा सकी। इतिहास में जिसको राजपूत काल कहा जाता है उसमें केवल तीन नीतिज्ञ क्षत्रियों (राजपूतों) के उदाहरण मिलते हैं।

पहला उदाहरण है मेवाड़ के राणा उदयसिंह का जिन्होंने किलों में बंद होकर लड़ने की आत्मघाती परम्परा को समाप्त कर दिया, खुले में लड़ने की नीति अपनाई। अकबर के आक्रमण के समय केवल सांकेतिक युद्ध लड़ने के लिए जयमल व फत्ता को कुछ सौ सैनिकों के साथ किले में किले की रक्षा के लिए छोड़ा व अपनी सारी सेना, सम्पत्ति व परिवारजनों को साथ लेकर किले के बाहर निकल गये व बाहर से छापामार युद्ध के द्वारा शत्रु को परेशान करते रहे। उसी अपने धन से सुरक्षित स्थान पर उदयपुर बसाया उसे अपनी राजधानी बनाया व उसी धन के बल पर राणा प्रताप जीवन भर अकबर से संघर्ष करने में सफल हुए। 

दूसरा उदाहरण है आमेर के राजाओं का, राजा भारमल, भगवंतदास व मानसिंह तीन पीढ़ी तक लगातार वीर व नीतिज्ञ राजा हुये जिन्होंने इस सच्चाई को स्वीकार किया कि राजपूत शक्ति इतनी कमजोर हो चुकी है कि वह मुगलों का सामना नहीं कर सकती है इसलिए भारमल ने अकबर से समझौता किया व उस समझौते का सर्वाधिक लाभ राजा मानसिंह ने अपने अद्भुत नेतृत्व, वीरता व नीतिज्ञता के कारण उठाया। तीसरे नीतिज्ञ पुरूष दुर्गादास राठौड़ हुये जिन्होंने औरंगजेब जैसे कट्टर व क्रूर शासक से संघर्ष कर जोधपुर राज्य पर पुनः अधिकार कर अजीतसिंह को राजा बनाया, मुगलों से सन्धि भी की, संघर्ष भी किया। यदि पूर्व काल के लोगों ने भी नीति का आश्रय लिया होता तो राजपूतों की शक्ति का उतना क्षय नहीं होता जितना राजपूत काल के 600 वर्षों में हुआ।

(2) पराक्रम व युक्ति बुद्धि का सामंजस्य :- राजा मानसिंह आमेर ने अपने जीवन के 60 वर्ष युद्ध के मैदानों में व्यतीत किये। मुगलों के आगमन से पूर्व लगभग दो हजार वर्षों से मुसलमान भारत पर आक्रमण कर रहे थे उनका उद्देश्य केवल लूटपाट व राज्य स्थापित करना नहीं था, उनका उद्देश्य था भारत पर शासन स्थापित कर देश की जनता का इस्लामीकरण करना। ईरान, इराक व अफगानिस्तान जहां पहले क्षत्रियों का शासन था का मुसलमानों ने केवल सौ साल की अवधि में इस्लामीकरण कर दिया। उस समय मुसलमान इस स्थिति में थे कि वे अर्थात पठान और मुगल एक हो जाते तो आसानी से भारत का इस्लामीकरण कर सकते थे। इस इस्लामीकरण को रोकने के लिए पहली आवश्यकता थी मुसलमानों की इन दो प्रबल शक्तियों को एक होने से रोका जाए। राजा मानसिंह आमेर ने अकबर को यह समझाने में सफलता प्राप्त की, कि जब तक तुम्हारा राज्य सुदृढ़ नहीं होगा तब तक किसी उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो सकोगे। उसने अकबर को यह भी समझाया कि पठान इस समय इस देश में सबसे प्रबल शक्ति है। उसे खण्डित किये बिना तुम्हारा राज्य सुदृढ़ नहीं हो सकता है।

राजीवनयन द्वारा लिखित राजा मानसिंह आमेर पुस्तक को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जायेगा कि केवल अकबर के दरबारी, मुसलमान सैनिक व सैनिक अफसर ही मानसिंह के विरूद्ध नहीं थे बल्कि सारे मुगल मानसिंह को न केवल इस्लाम का विरोधी घोपित कर रहे थे, बल्कि अकबर से यह माँग भी कर रहे थे कि उसको युद्ध क्षेत्र से वापिस बुलाया जाये। अफगानिस्तान के पाँच राज्यों को नष्ट कर वहाँ पर मुगलों का शासन स्थापित करने वाले मानसिंह पर अकबर के मुसलमान दरबारी व सैनिक अफसर यह आरोप लगा रहे थे कि यह मुसलमानों को कत्ल करवा रहा है व इनके विरोध के कारण अकबर ने मानसिंह को काबुल से वापिस बुलाया व उसको बिहार में भेजा, उड़ीसा में भेजा, बंगाल में भेजा, जहाँ भी वो रहा उसने मुस्लिम शक्ति को खण्डित व विघटित किया, राजपूत शक्ति को एकजुट किया व मेवाड़ को छोड़कर राजस्थान के सम्पूर्ण राजाओं को अकबर के साथ सन्धि करने को राजी किया जिसके परिणामस्वरूप राजपूत राज्यों का न केवल सीमाओं का विस्तार हुआ बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति में भी सुधार हुआ।

(3) विज्ञान के विकास की ओर ध्यान देना :- भारत के क्षत्रियों ने आक्रान्ता मुसलमानों के विरूद्ध दो हजार वर्षों तक संघर्ष किया। अपने आपको विश्व विजेता कहने वाला सिकन्दर हो अथवा मोहम्मद गजनी सबको यहाँ से मुँह की खाकर वापिस लौटना पड़ा। जब मुसलमानों ने विज्ञान के क्षेत्र में कदम आगे बढ़ाया। उन्होंने बन्दूकों व तोपों का अविष्कार कर लिया तब भी हम तोपों के सामने तलवारों से लड़े किन्तु इससे क्षत्रियों की सैनिक व आर्थिक दोनों प्रकार की शक्तियों का भारी क्षय हुआ और इन आधुनिक हथियारों के बल पर ही मुसलमान इस देश पर सत्ता प्राप्त करने में सफल हुये। राजा मानसिंह आमेर ने राजपूतों की इस कमजोरी को अनुभव किया और इस कमजोरी को दूर करने का प्रयत्न भी किया, पंजाब में विद्रोह का दमन करने के लिए बादशाह अकबर स्वयं भगवंतदासजी व मानसिंहजी के साथ शांति स्थापित करने के लिए निकला था। पंजाब का विद्रोह शांत होने पर अकबर भगवंतदासजी के साथ वापिस लौट आया व आगे के सैनिक अभियान के लिए मानसिंहजी को सेनापति नियुक्त किया।

उस समय अफगानिस्तान में पाँच राज्य थे जो तोप बन्दूक आदि शस्त्रों व गोले-बारूद का निर्माण कर भारत पर आक्रमण करने के लिए आने वाले मुसलमानों को मुफ्त शस्त्र व गोला-बारूद उपलब्ध कराते व लूटपाट करके जब वो वापिस जाते तो लूट का आधा माल वसूल कर लेते थे। इसलिए प्रतिवर्ष कितने ही मुसलमान काफिले भारत पर आक्रमण करने आते व उनसे लड़ने में क्षत्रियों की शक्ति व्यर्थ में ही नष्ट हो रही थी। राजा मानसिंह आमेर ने इस स्थिति को समझा व अफगानिस्तान के उन पाँच राज्यों पर विजय प्राप्त कर वहाँ के शस्त्र बनाने वाले सारे कारखानों को नष्ट किया व उन कारखानों में कार्य करने वाले कारीगरों को बंदी बनाकर आमेर ले आया, जहाँ पर आज जयगढ़ दुर्ग है उस जगह शस्त्र बनाने का कारखाना खोला। जहां पर तोपों व बन्दूकों का निर्माण शुरू हुआ। यह तकनीकी ज्ञान अन्य राजपूत राजाओं को भी मिले इसकी व्यवस्था की। जब राजपूतों के पास आधुनिक हथियार आये तब शक्ति संतुलन बना व राजपूतों में यह आत्मविश्वास पैदा हुआ कि वे अब मुसलमानों का मुकाबला कर सकते हैं। दुर्भाग्य की बात यह है कि राजा मानसिंह की मृत्यु के बाद आमेर के राजाओं ने ही नहीं किसी भी राजपूत राजा ने विज्ञान के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया।

मानसिंहजी के जीवन काल में ही जुजर्बो का निर्माण हो चुका था (जिनको छोटी तोपें कह सकते है, जिनको एक आदमी भी साथ लेकर चल सकता है लेकिन उनकी मारक क्षमता कम थी व निशाना नहीं साधा जा सकता था) यहाँ से राजपूत एक इंच भी आगे नहीं बढ़े लेकिन विदेशों में अविष्कार होते रहे व भारत के ही अन्य शासक उन हथियारों व गोला-बारूद ही नहीं उनको काम में लेने वाले कारीगरों को भी खरीद के लाये और उससे राजपूत शक्ति को ही इतना कमजोर कर दिया कि अंग्रेजों के आगमन काल तक वे पूरी तरह शक्तिहीन हो गये। भरतपुर के जाटों, ग्वालियर के सिंधिया व मराठों के पास ऐसे ही खरीदे हुये हथियार व गोलंदाज थे जिनके बल पर उन्होंने न केवल जनता को पीडित किया बल्केि अनेक युद्धों में राजपूत शक्ति को भी भारी हानि पहुँचाई अगर राजपूतों ने विज्ञान के विकास की तरफ ध्यान दिया होता तो अंग्रेजों का शासन इस देश में नहीं हो पाता।

(4) धर्म के प्रति आस्था व आत्मविश्वास की पुनः स्थापना :- दो हजार वर्ष तक इस देश पर हुये | मुसलमानों के आक्रमणों से केवल राजपूत व कुछ अन्य जातियां जिन्हें आज आदिवासी कहा जाता है वे ही लड़ते रहे। व शेष जनता सुखपूर्वक दर्शक बने अपना जीवन यापन करते रहे। मुसलमानों ने न केवल देशवासियों को लूटा बल्कि यहाँ की जनता के धार्मिक आस्था के केन्द्र मन्दिरों को भी नष्ट किया जिसके परिणाम स्वरूप एक तरफ जनता का अपनी रक्षा के प्रति व धर्म के प्रति आस्था डगमगा रही थी अपितु राजपूत शक्ति क्षीण होती चली जा रही थी उस स्थिति में मानसिंह ने अनेक प्राचीन धार्मिक स्थलों का पुनरूद्धार किया, पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर जहाँ मुसलमान नमाज पढ़ने लगे थे, को न केवल मुसलमानों के कब्जे से मुक्त कराया बल्कि नवीन मंदिरों का निर्माण भी करवाया। उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल व उड़ीसा में जहां भी एक स्थान पर उसका 2-3 महीने भी पड़ाव रहा वहीं पर उसने मंदिर बनवा दिया।

ये मंदिर आज सभी जगह मानमंदिर के नाम से जाने जाते हैं। इससे आस्तिक जनता में आत्मविश्वास पैदा हुआ कि अब हमारे धर्म को कोई नष्ट नहीं कर सकेगा। उजड़ होते हरिद्वार को पुनः बसाया, गंगा के तट पर हर की पौंड़ी घाट का पुर्नर्निमाण किया व अन्य घाटों की मरम्मत करवाई इन सब कार्यों से मानसिंह को यहाँ की जनता ने धर्मरक्षक घोषित किया। उसके झंडे को धर्म ध्वजा स्वीकार की व उसकी मृत्यु के बाद हरिद्वार में हर की पैड़ियों पर उसकी स्मृति में एक छतरी का निर्माण करवाया। इससे स्पष्ट है कि एक तरफ राणा प्रताप इसलिए लड़ रहा था कि इतिहासकार यह नहीं लिख पाये कि सभी राजपूतों को अकबर ने अपने अधीन कर लिया था वहीं दूसरी और मानसिंह इस बात के लिए लड़ रहा था कि यहां जनता के टूटते आत्मविश्वास को पुनर्जीवित कर मुसलमानों के देश के इस्लामीकरण करने के स्वप्न को हमेशा के लिए | खत्म कर दिया जाये।

No comments

Post a Comment