Tuesday, 19 December 2017

दादाभाई के मन में बड़ी चोट लगी थी - वे अस्वस्थ रहने लगे और अन्त में संसार से विदा हो गये ।

मेरी जीवन-गाथा (39)
ठा. ओंकारसिंह, आई. ए. एस. (से. नि.)


दादाभाई के मन में बड़ी चोट लगी थी - वे अस्वस्थ रहने लगे और अन्त में संसार से विदा हो गये ।


गाँव से समाचार प्राप्त हुआ कि बड़े भाई साहब खांगसिंहजी का देहान्त हो गया। इस समाचार से मुझे बड़ा आघात लगा, और मैं तत्काल गाँव गया। वहाँ चार दिन तक रहा।
उस दौरान पता चला कि कुछ काल पहले काको सा. और दादाभाई के बीच में सम्पति के बंटवारे को लेकर जटिल विवाद हो गया था और काकोसा ने तैश में आकर एक बार यह भी कह दिया था कि 'तुम्हें पता होना चाहिए कि मेरे पास 0.38 का रिवाल्वर है।'

दादाभाई ने इस धमकी को कोई परवाह नहीं की, परन्तु उनके मन में बड़ी चोट लगी थी। वे अस्वस्थ रहने लगे और अन्त में संसार से विदा हो गये।


उनके तीन पुत्र थे, जिनमें से सबसे बड़े पुत्र रणवीरसिंह ने स्नातक की परीक्षा पास कर ली थी। दो छोटे पुत्र अभी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। मैंने तीनों भाइयों को आश्वस्त किया कि दादाभाई पर्यात सम्पत्ति छोड़कर गये हैं अत: उन्हें कोई चिंता नहीं करनी चाहिए, और आवश्यकता पड़ने पर मैं सदा उनकी सहायता करता रहूंगा।

छोटे भाई नटवरसिंह ने जसवन्त कॉलेज जोधपुर से बीएससी की परीक्षा पास करके शिक्षा विभाग में शिक्षक की नौकरी कर ली थी। मैं चाहता था कि वह अपने जीवन में उन्नति करे, अत: मैंने उसे बुलाकर राय दी कि उसका स्थानान्तरण और नियुक्ति किसी ऐसे विभाग में करवा दूँ जहाँ उन्नति के अवसर हों। उसने मेरी राय मानी।
मैंने अपने हितचिंतक श्री एम.यू. मेनन से इस विषय में बातचीत की तो उन्होंने कहा कि उद्योग विभाग के अन्तर्गत एक उप-विभाग नमक का बना है। उसमें निरीक्षक के दो पद खाली हैं अत: वहाँ नटवरसिंह को नियुति दी जा सकती है। नटवरसिंह ने भी इस सुझाव को माना। श्री मेनन ने इस नियुक्ति के आदेश जारी कर दिये। मैंने उनका आभार माना।

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