Monday, 11 December 2017

जाट राजपूत संबन्ध - कुंवर अवधेश सिंह धमोरा

जाट राजपूत संबन्ध -  कुंवर अवधेश सिंह धमोरा

निवेदन स्वरूप लेख अंत तक पढे़ व विचार कर अपने अंत: मन से प्रतिक्रिया दें ।
 बचपन में मुझे दादोसा बताया करते थे कि कुछ वर्षों पहले कि बात है, पपुरना गांव का नबाब अपने रिश्तेदार परसरामपुरा गांव के नबाब से मिलकर वापस जा रहा था कि रास्ते में गांव के कुवे पर कुछ युवतीयां पानी भर रही थी, जिनमें एक पुनिया जाट कि किशोर बालिका को देखकर नबाब का मन मचल गया । नबाब ने युवती को खिंचकर घोडे पर बैठाया और साथीयों सहित घोडे दौडा लिए । युवतीयां रोने लगी शोर मचाया तो गांव के लोग एकत्रित हुए लेकिन नबाबव से लडा़ई कौन करे ? तो वो लोग दौडे़ दौडे़ संग्राम सिंह जी के पास गए, और पुरा वृतांत संग्राम सिंह को सुनाया । संग्राम सिंह जी ने तुरन्त अपने दो अन्य साथीयों को लेकर नबाब का पिछा किया, चिंचडौली-हरडीया के जंगलो के पास उन्होंने नबाब को पकड़ लिया व नबाब को ललकार उससे युद्द किया ।

पिछे से खबर संग्राम सिंह जी के भाई जगमाल सिंह जी को मिली तो वो अन्य साथीयों को लेकर संग्राम सिंह कि सहायता करने पहूंचे लेकिन तब तक संग्राम सिंह झुंझार (उस बालिका के बताए अनुसार संग्राम सिंह कि तलवार सर कटने के बाद भी चल रही थी) व उनके एक साथी बजावा के रावतका सरदार शहीद हो चुके थे, नबाब के कई साथी मारे गए व कुछ घायल साथीयों के साथ नबाब वहां से भाग गया । चूंकि उस अबला को नबाब से छुडा लिया गया था उसे उनके परिवार को ससम्मान लौटा दिया गया । संग्राम सिंह दादोसा के झुंझार होने पर वहां स्मृती रूप छोटा चबुतरा बना दिया गया ।
ऐसा था राजपूतों का जाटों के साथ स्नेह, कि जाट कि बेटी को स्वयं के बेटी समझकर शहीद हो गए हमारे दादोसा संग्राम सिंह व बजावा सरदार । जिस पर प्रदेश के प्रसिद इतिहासकार सवाई सिंह ने लिखा

"पुत्री पुन्या जाट री पणघट री पणि हार ।
पपराणौ पति पकड़ली बनिता भाव विचार ।।"
"जाट जाटणी झुररिया और आखो गांम ।
कान भणक हुई कंवर रै साम्यो खग संग्राम ।।"
"भिडियो दोनो भभक भड़ खड़ग पकडिया हत्थ ।
खेत रहयो संग्राम खग, धड़ नाच्यो बिन मत्थ ।।"

इतना ही नहीं मेरे स्व. मासीसा ने गांव के स्व. श्रीचंद जाखड़ कि धर्मपत्नी को बहिन बनाया हुआ था । परिणामस्वरूप हमारे व उनके दोनों परिवारों के बिच के रिश्ते आज तक बेहद मधुर है, कभी महसूस ही नहीं हुआ वो परिवार जाट है और हम राजपूत । यहां तक कि मेरा बचपन तो उनके घर से दूध, छाच लाने में ही बिता है । उस दौरान कोई गिनती नहीं है कितनी बार मैंने खाना खाया है उनके घर, अपना ही घर समझकर और आज भी जब कभी जाता हूं खा लेता हूं । ऐसा इसलिए है क्योंकि ना कभी उनके परिवार को कोई चुनाव लड़ना ना हमारे परिवार को ।

इसके अलावा बडे़ भाईसाब रतन सिंह शेखावत गांव में युवा लड़को को आर्मी/पुलिस कि तैयारी करवाते थे written व physical दोनों की । बिना इस भेदभाव के कि कौन राजपूत है और कौन जाट व बिना किसी तरह के शुल्क के ।
इतना ही नहीं मई 2017 में गांव में राजपूत समाज ने 'क्षत्रिय युवक संघ' का शिवीर लगाया था । जिसमें 7 दिन तक गांव के एक जाट युवा दिनेश माठ का जनरेटर काम में लिया गया जिसका उसने कोई किराया नहीं लिया, वहीं हमने जनरेटर कि बात एक टैंट हाउस से की थी जिसने 800रू प्रतिदिन किराया बताया था । साथ ही टैंट का जो अन्य सामान आया वो भी किसी अन्य जाट बंधु के यहां से ही आया था बिना किसी किराए के ।

इसके अलावा आपको याद होगा दिपावली के अगले दिन गांव में उदय सिंह का जयंती समारोह व दिपावली स्नेह मिलन समारोह मनाया गया था । जिस टैंट के निचे उदय सिंह जी को पुष्प चढाए जा रहे थे, दुर्गा पुजन किया जा रहा था, राजपूत समाज कि प्रतिभाओं को सम्मानित किया जा रहा था वो टैंट भी एक जाट बंधु विद्याधर जी खाखिल का ही था वो भी बिना किसी किराए के उपलब्द था । इतने ही नहीं गांव में ऐसे अनेक उदाहरण है जाट राजपूत सौहार्द के ।

मेरे जीवन कि बात करूं तो तैयारी के दिनों में लगभग 2 वर्ष राकेश गोदारा मेरा रूम मेट रहा लेकिन ना ही उसे कभी ये महसूस हुआ कि मैं राजपूत हूं ना ही मैंने महसूस किया कि वो जाट है, हमारे बिच कितने आत्मीय संबंध है ये हम ही जानते हैं । इसके अलावा MGI के आरम्भिक दिनों में हम जिस फ्लेट में रहते थे उसी के निचले फ्लेट में अमित पुनिया व रिषीकेश सिखवाल रहते थे लेकिन हम रहते ऐसे थे कि जैसे हम एक ही फ्लेट में रह रहे हों । आधी बार खाना एक ही जगह बनाते थे आधी बार सोते एक ही जगह थे । इसके अलावा भी बहुत से जाट मित्र हैं मेरे, लेकिन ये महसूस नहीं होता कि वो जाट है ना ही शायद उन्हें ये महसूस होता कि मैं राजपूत हूं क्योंकि हमारी मित्रता के लिए मेरा अवधेश होना ही काफी है ।

यदि बात राजतंत्र कि करें तो उस समय के जाट राजपूत संबंधो पर तो पुरी एक पुस्तक लिख सकता हूं और उसके भी कई भाग निकालने पडे और यदि परमात्मा ने आशीर्वाद रखा तो उस पर भी अवश्य विचार करूंगा । खैर अभी लेख ज्यादा लंबा ना करते हुए एक उदाहरण देता हूं कि राव बिका से लेकर वर्तमान तक बिकानेर राजपरिवार के राजा का राजतिलक किसी गोदारा खांप के जाट व्यक्ति द्वारा किया जाता है । इससे बडा़ जाट राजपूत सौहार्द का प्रतिक क्या होगा ।
फिर ये कौन राजपूत हैं जो 35 कौम का नारा दे रहे हैं ? ये कौनसा विधायक है जो राजपूतों को गालीयां देकर अपने वोटों को लामबंद कर रहा है ?

ये कहानी केवल मेरे गांव या केवल बिकानेर रियासत कि ही नहीं बल्कि हर गांव हर शहर में हर जाति के लोग इसी तरह प्रेम से रहते हैं । फिर ये रोज थडी़यो पर बैठे लोग क्यों कहते हैं जाट राजपूतों की नहीं बनती ?
क्योंकि वार्ड पंच के चुनाव से लेकर सांसद के चुनाव तक वोटों को लामबंद करने के लिए दुसरी जाति को गालियां निकाली जाती है इस महान लोकतंत्र में । कॉलेज सचिव से लेकर विश्वविद्यालय अध्यक्ष चुनाव तक के वोट लिए जाते हैं जाती के आधार पर । जब ये वोट नहीं थे जातियों में किसी तरह का कोई विवाद नहीं था । मेरे देश को आवश्यक्ता है कि यहां के नेता विकास के नाम पर टिकट मांगे ना कि जाती के बाहुल्य के आधार पर । साथ ही हम भी जाती देखकर नहीं व्यक्ति देखकर वोट देना आरम्भ करें ।

अपनी जाती से प्रेम करना, अपनी जाति की संस्कृती से प्रेम करना गलत नहीं है लेकिन कहां आवश्यक्ता है उसके लिए हम किसी अन्य जाति से घृणा करें किसी के प्रती द्वेष रखें ।
ना जाने ये दोनों ही जाती के कुछ नेता क्यों भूल रहे हैं कि सम्मान देने से ही सम्मान मिलता है, और भाई अपने स्वार्थ के लिए गांवो में बैठे लोगों का सुख चैन खोने पर क्यों तूले हो तूम लोग ।
इन नेताओं से सुधरने कि उम्मीद करना भी बेकार है, हमें समझना होगा हम युवा ही है भविष्य के बुजुर्ग भी । किसी जाती/धर्म का ही नहीं देश का भी भविष्य हैं हम । अब हमें ही निर्धारित करना है कि हम कैसा देश चाहते हैं राम राज्य जैसा या सीरिया जैसा ?
- कुंवर अवधेश शेखावत (धमोरा) एक_राही

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