Monday, 20 March 2017

सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र

सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र


राजा हरिशचन्द्र सूर्यवंशी राजा त्रिशंकु के पुत्र थे। राजा हरिशचन्द्र बड़े धर्मात्मा और सत्यवादी थे। राजा हरिशचन्द्र की कीर्ति सब लोकों में फैल गई, राजा इन्द्र को यह बात अच्छी नहीं लगी। राजा हरिशचन्द्र की छवि को खराब करने हेतु इन्द्र ने राजा की परीक्षा लेने हेतु जाल रचा और विश्वामित्रजी को राजा की परीक्षा लेने के लिये उकसाया। महर्षि विश्वामित्र ने स्वप्न में राजा द्वारा अपने सम्पूर्ण राज्य का दान करना दिखाया और दूसरे दिन महर्षि स्वयं राजा हरिशचन्द्र के सम्मुख उपस्थित होकर कहने लगे कि आपने अपना सम्पूर्ण राज्य मुझे दान कर दिया है वह मुझे दे दें। राजा हरिशचन्द्र ने स्वप्न में दान किये हुए राज्य को विश्वामित्रजी को दे दिया और अपनी रानी व पुत्र के साथ सब राज पाट छोडकर काशी आ गये।

राजा हरिशचन्द्र जब अपना राज्य छोडकर रानी और पुत्र के साथ चलने लगे तब ऋषि ने कहा कि आपने राज्य का तो दान कर दिया परन्तु दान बिना दक्षिणा के सफल नहीं होता अत: राजा दक्षिणा में एक हजार सोनें की मोहरें और दें। राजा हरिशचन्द्र ने जब अपना राज्य ही दान में दे दिया था तब राजा के पास अब एक हजार सोनें की मोहरें देने को कहाँ थी। राजा ने इसके लिए ऋषि से समय माँगा।

राजा हरिशचन्द्र ने दक्षिणा चुकाने के लिए रानी शैव्या को काशी में एक ब्राह्मण के घर दासी का काम करने हेतु रखा और स्वयं एक चाण्डाल के यहाँ नौकरी की। चाण्डाल ने राजा को शमशान घाट की चौकीदारी दी और यह कार्य सौंपा कि कोई भी वहाँ मुर्दा जलाने आवे उससे मरघट का कर लेकर ही मुर्दा को जलाने देना। समय बडा बलवान होता है जब दुर्दिन आते हैं तो अनेक कष्ट एक साथ लेकर आते हैं कहाँ तो विशाल साम्राज्य का राजपाट और फिर उस विशाल साम्राज्य की रानी को दासी का कार्य करना पडे और राजा को चाण्डाल के यहाँ नौकरी कर शमशान घाट की चौकीदारी। फिर भी कष्टों का अन्त नहीं हुआ।

लडका रोहिताश्व, ब्राह्मण जिसके यहाँ रानी शैव्या दासी का कार्य करती थी उसके लिए पूजा के फूल लेने गया। वहाँ उसे साँप ने काट लिया। साँप के काटने से रोहिताश्व की वहीं मृत्यु हो गई। महारानी शैव्या रोती बिलखती पुत्र की लाश के पास पहुँची रोहिताश्व अब मृत अवस्था में जमीन पर लेटा था। महारानी रोती बिलखती रोहिताश्व की देह को हाथों में उठाकर दाह संस्कार हेतु शमशान पहुँची। शमशान घाट पर राजा हरिशचन्द्र चौकीदार का काम कर रहे थे। उन्होंनें रानी से मरघट का कर देने को कहा।

रानी ने राजा को पहचान लिया और कहने लगी कि महाराज यह तो आपका ही पुत्र है मेरे पास तो इसका तन ढकनें हेतु कफन तक भी नहीं है। मेरे पास कर देने को पैसा कहाँ है। पुत्र की लाश देख कर और रानी की व्यथा सुनकर राजा का गला भर आया। द्रवित हृदय से राजा ने रानी से कहा कि मैं अपने कर्तव्य से बंधा हुआ हूँ- बिना कर दिये यहां कोई मुर्दा नहीं जला सकता। रानी ने राजा से फिर अनुनय विनय की पर राजा ने बिना कर दिए मृत देह को जलाने से बिल्कुल इन्कार कर दिया। रानी फूट-फूट कर रोने लगी और बोली मेरे पास कर देने को कुछ नहीं है मेरे शरीर पर जो साडी मैंने पहन रखी है वही है इसी में से आप आधा हिस्सा ले ली और मुझे पुत्र की अन्त्येष्टि करने दो।
रानी ने ज्यों ही अपने शरीर पर लिपटी हुई साडी फाड़नी शुरू की तब ही भगवान नारायण, इन्द्र, धर्मराज और विश्वामित्र वहाँ प्रकट हुए। ऋषि विश्वामित्र ने बताया कि यह सब राजा तुम्हारी परीक्षा लेने हेतु योगमाया से दिखलाया था उसमें आप सफल हुए हो।

राजा हरिशचन्द्र पर दोहा प्रसिद्ध है
चन्द्र टरै सूरज टरे , टरै जगत व्यवहार ।
पै दृढ़ व्रत हरिशचन्द्र को टरै न सत्यविचार ।

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