Wednesday, 12 October 2016

समाज का अस्तित्व

समाज का अस्तित्व मर्यादाओं का निर्वाह करने से ही संभव है । मर्यादाएँ ही उसे बिखरने व विनिष्ट होने से बचाती हैं तथा उसे गतिशील भी बनाए रखती हैं । गतिशीलता मर्यादाओं का धर्म नहीं है अतः मर्यादाओं के निर्वाह के साथ अपने स्वधर्म के द्वारा उपार्जित ज्ञान का सहारा लेकर हम विचारों को गतिशीलता प्रदान कर सकते हैं ।

यह उपार्जित ज्ञान ही समाज रुपी सुरसरी का जल है, जिसके सूख जाने के बाद मर्यादा रुपी तटबन्ध उस नदी के जीवन की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो सकते हैं । समाज को जीवित रहने के लिए नदी की भाँति हमेशा गतिशील विचारों का सहारा लेना पङेगा ।

विचार रुपी जल बिखरकर नष्ट न हो जाए इसलिए मर्यादा रुपी तटबन्धों की रक्षा करना आवश्यक कर्तव्य है । जल के साथ बहकर आने वाली मिट्टी अथार्त "विचार के साथ विजातीय प्रदूषित विचारों" को नदी में से बाहर न निकाला गया तो यह प्रदूषण तटबन्धों अथार्त मर्यादाओं का उल्लंघन कर जल को विनिष्ट कर, जल अथार्त समाज के ज्ञान को भी समाप्त कर देगा ।

विचार, मर्यादाएँ व शुद्धिकरण की सतत् प्रक्रिया ही किसी समाज को दीर्घजीवी बनाने में समर्थ सिद्ध हो सकती है ।
अबोध बोध - देवीसिंह महार साहब ।

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