Friday, 21 October 2016

रिंया ठाकुर शेरसिंह :-

रिंया ठाकुर शेरसिंह :-

जोधपुर दरबार रामसिंह के रक्षक थे 1857 के क्रांतिवीर रियां के ठाकुर सरदार शेरसिंह सिंहोत । मराठो को हराया तो जयपुर पर भी की थी चढ़ाई, स्टेट में मिला रियां ठिकाने को चीफ जज का मान !!
रियां ठाकुरो की याद में हर वर्ष भादवा सूदी नवमी से ग्यारश तक भरता है तीन दिवसीय मेला मेले में उमड़ रही है भारी भीड़, ठाकुरो की आदमकद मूर्तियों की होती है सुबह शाम पूजा अर्चना ।

ऐतिहासिक हलचल रियां बड़ी-

रियां बड़ी में हर वर्ष की भाँती इस वर्ष भी भादवा सूदी नवमी से इग्यारश तक लगाने वाला तीन दिवसीय मेला शनिवार से शुरू हो गया है। ये मेला रियां के ठाकुर शेरसिंह और उनके वंशजो की याद में मनाया जाता है। यहां मालियो की हथाई के सामने स्थित ठाकुर साहब के थड़े में ठाकुर शेर सिंह व उनके वंशजो का भव्य मंदिर बना हुआ है। जहां इनकी आदमकद मुर्तिया स्थापित है जिनकी सुबह शाम पूजा अर्चना की जाती है।

रियां इतिहास के झरोखे से-

पूर्व के काल में वर्तमान में बसे रियां बड़ी कस्बे में स्थित पहाड़ी के पीछे रियां गाँव था, इस जगह को प्राचीन रियां के नाम से जाना जाता है, रियां का यह ठिकाना सर्वप्रथम राव मालदेव के सेवक वरसिंह जोधावत के पुत्र तेजसी को मिला और उनका निधन विक्रम संवत 1575 में हुआ। तत्पश्चात राव मालदेव ने ये ठिकाना तेजसी के पुत्र सहसा को दिया। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार विक्रम संवत १५९५ में राव बीरमदेव ने अजमेर से आकर रियां पर आक्रमण किया जिसमे सहसा मारा गया। बाद में यह ठिकाना राव जयमल्ल के वंशज गोपालदास को २० गाँवों व ३५००० रेख सहित पट्टे में मिला।

इसके बाद क्रमश: उनके वंशज प्रतापसिंह, अचलसिंह व कुशलसिंह सरदारसिंह के पट्टे में रियां का ठिकाना रहा। ठाकुर शेरसिंह का रहा जोधपुर उमरावो में वर्चस्व दरबार भी मानते थे लोहा । ठाकुर सरदारसिंह के बाद ये ठिकाना उनके पुत्र शेरसिंह को मिला। वर्तमान में बसे रियां कस्बे को ठाकुर शेर सिंह सरदार सिंहोत मेड़तिया ने ही बसाया था इसलिए आज भी इसे शेरसिंह जी की रियां के नाम से भी जाना जाता है।

जोधपुर शोध संस्थान से मिले ऐतिहासिक तथ्यों के आधार से इस काल में इनका वर्चस्व मारवाड़ के सभी उमरावो पर भारी था। उस समय के जोधपुर दरबार रामसिंह का ठाकुर शेर सिंह सरदार सिंहोत मेड़तिया के सहयोग के बिना जोधपुर दरबार बन पाना संभव ही नहीं था। क्योंकि रामसिंह के भाई बख्तसिंह जोकि नागौर के राजाधिराज थे वो रामसिंह को हटाकर खुद जोधपुर दरबार बनना चाहते थे। जिसके लिए उन्होंने कई बार जोधपुर पर आक्रमण करने के प्रयास किये पर हर बार उन्हें मेड़ता में वर्तमान में सोगावास और मालकोट के समीप रियां ठाकुर शेरसिंह सरदार सिंहोत मेड़तिया रोक लेते थे।

ठाकुर शेरसिंह की मेड़ता में मराठो से लड़ाई और जीत-


विक्रम संवत १७९२ में सवाई जयसिंह के उकसाने पर मराठो ने मारवाड़ पर आक्रमण किया तब राणोजी सिंधिया व राव मल्हार होलकर ने मेड़ता के मालकोट दुर्ग पर धावा बोला। पर यहां शेरसिंह मेड़तिया के नेतृत्त्व में सभी छोटे बड़े ठिकानों ने मिलकर मराठो का डटकर सामना किया और उन्हें परास्त कर खदेड़ दिया।

ठाकुर शेरसिंह की जयपुर पर चढ़ाई-

ऐतिहासिक प्रमाणों अनुसार जयपुर दरबार के लिए ईश्वरसिंह व उनके भाई माधोसिंह के बीच लड़ाई होने लग गयी और ईश्वरसिंह ने बाहरी मदद से जयपुर पर आक्रमण कर दिया। तब जोधपुर दरबार की आज्ञा अनुसार तकरीबन २००० सैनिको को साथ लेकर ठाकुर शेरसिंह ने ईश्वरसिंह पर आक्रमण कर दिया। ये लड़ाई बगरू में लड़ी गयी। जिसमे ईश्वरसिंह परास्त हुआ और उसे संधि कर जयपुर दरबार में से कुछ परगने लेकर ही संतोष करना पड़ा।

विजिया नोकर को लेने दरबार का रियां ठिकाने में आना-

रियां ठाकुर शेरसिंह के साथ एक विजिया नाम का नोकर जोधपुर दरबार रामसिंह के पास आया जाया करता था और वो नोकर दरबार रामसिंह को पसंद था तो उन्होंने शेरसिंह से उस नोकर को मांग लिया। जिस पर शेरसिंह नाराज होकर रियां आ गए और कहा की महाराज ने आज नोकर माँगा है कल को और कुछ मांग लेंगे इसलिए में जोधपुर नहीं जाऊंगा। इसी दौरान जोधपुर दरबार रामसिंह नागौर पर आक्रमण करने खेडूली पहुंचे पर अपनी स्थिति कमजोर देख उन्हें शेरसिंह की याद आयी और देवीसिंह दोलतसिंहोत को रियां उन्हें बुलाने भेजा। जिस पर शेरसिंह ने कहा की महाराजा की रक्षा के लिए में धर्म और वचनबद्ध हूँ पर उन्हें मेरे लिए रियां आना पडेगा। इस पर उस समय जोधपुर दरबार रामसिंह 140 ऊंट सवारो के साथ रियां ठिकाने में पहुंचे जो उस समय एक बहुत बड़ी घटना थी। इसके बाद वो युद्ध के लिए रवाना हुए।

दो वीर योद्धाओ ने पाई एक साथ वीरगति-

ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार आउवा के ठाकुर कुशालसिंह व रियां ठाकुर शेरसिंह दोनों ने मिलकर एक साथ 1857 की क्रान्ति में भी भाग लिया था। और अंग्रेजो का डटकर सामना किया था। जोधपुर दरबार रामसिंह व नागौर के राजा बख्तसिंह के बीच कई लड़ाईया लड़ी गयी। जिनमे से एक लड़ाई के दौरान रामसिंह की तरफ से रियां ठाकुर शेरसिंह मेड़तिया व बख्तसिंह की तरफ से आउवा ठाकुर कुशलसिंह के बीच दोनों के ना चाहते हुए भी स्वामिभक्ति व वचनबद्धता के चलते विक्रम संवत 1807 व 26 नवम्बर 1863 में मेड़ता में भीषण युद्ध हुआ। जिसमे ये दोनों मारवाड़ के वीर व कुशल योद्धाओ ने एक दूसरे को मार वीरगति पायी। (ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार ये दोनों रिश्ते में भाई भाई भी थे) ।

ठाकुर शेरसिंह के निधन के बाद उनके भाई सूरजमल व सूरजमल के पुत्र जवानसिंह, बख्तावरसिंह, बीदड़सिंह, शिवनाथ सिंह, देवीसिंह, गंभीरसिंह ने इस ठिकाने पर राज किया वर्तमान में कस्बे की पहाड़ी पर स्थित बिड़दा माता का मंदिर भी ठाकुर बीदड़सिंह ने ही बनवाया था।

ठाकुर विजयसिंह ने भी बढ़ाया रियां का मान स्टेट में चीफ जज का पद सम्भाला-

ठाकुर देवीसिंह के बाद इस ठिकाने को प्रसिद्धि मिली ठाकुर विजयसिंह के काल में, ये अत्यंत पढ़े लिखे होने व बेहद समझदार होने के चलते जोधपुर दरबार के खासमखास रहे। एक बार फ्रांस में जोधपुर दरबार के संकटकाल में ठाकुर विजयसिंह बहुत काम आये। जिसके चलते उन्हें राय बहादुर की उपाधि दी गयी। कुछ ही समय बाद उन्हें स्टेट में सहकारी जज व बाद में चीफ जज की नियुक्ति भी मिली। जो वो जीवन पर्यन्त तक रहे। इनके बाद गणपतसिंह ठाकुर बने जिनके प्रयासों से ही रियां बड़ी पंचायत समिति बनी और ठाकुर गणपतसिंह प्रथम प्रधान बने इनके बाद वर्तमान ठाकुर जगजीतसिंह को ये ठिकाना मिला उन्हें ग्रामीणों ने एक बार निर्विरोध ग्राम का सरपंच भी बनाया।

लेख - नागौर इतिहास द्वारा
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