Tuesday, 13 September 2016

सोरठ

सोरठ

"सोरठ थाने देखिया, जांझा झूलर माँहि ।
जाँणै चमके बीजली, गुदल्हे बादल माँहि ।।"

उँचो गढ गिनार, आबू पे छाया पङे ।
सोरठ रो सिणगार, बादल सूं वातं करे ।।

सोरठ रंग री सांवल्ही, सुपारी रे रंग ।
लूँगा जेङी चरपरी, उङ-उङ लागे अंग ।।

सोरठ गढ़ सूं उतरी, झाँझर रे झणकार ।
धूज्या गढ़ रा काँगरा, गाज्यो गढ़ गिरनार ।।

जिण साँचे सोरठ घङी, घङीयो राव खंगार ।
वो साँचो तो गल्ह गयो, लद ही गयो लुहार ।।

"बिंझा म्हाके आँगणै, नित आवो नित जाय ।
घटकी वेदन बालमा, तो सुं कही न जाय ।।"

"वेदन कहाँ तो मारिजा, कहतां लाज मरांह ।
म्हें करहा थैं बेलङी नीरो तो ही चरांह ।"

"सोरठ थूं छै बहुगुणी, पण इक थोक निवास ।
ज्या सुगणी रे मन बसी, त्या लोही चढे़ न मांस ।।"

सोरठ थां में गुण घणां, रतियन औगण होय ।
गूंदगरी का पेङ ज्यूं कदियन खारो होय ।।

"सोरठ साकर री डल्ही, मुख मेल्यां घुल जाय ।
हिवङे आय बिलूंबतां, हेमालो ढुल्ह जाय ।।"

"सुण बींझा सोरठ कहे, नेह कता मण होय ।
लाग्यां रो लेखो नहीं, टूटा टांक न होय ।।"

"सोरठ सोना रो टको, परहत्थ लो परखाय ।
खोटा कलजुग वापरया, मत पितल व्हे जाय ।।"

सोरठ नागण को रही, ज्यों छेङे ज्यूं खाय ।
आ जा बिंझा गारुङी, ले जा कण्ठ लगाय ।।


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