Wednesday, 19 August 2015

पुस्तक - हमारी भुलें ।

पुस्तक - हमारी भुलें ।


आधुनिक विश्वामित्र श्री देवी सिंहजी महार साहब ने अपनी महत्वपूर्ण कृति "हमारी भूलें" की भूमिका में लिखा है कि संसार का इतिहास अनेक व्यक्तियों, जातियों धर्मो व राष्ट्रों के उत्थान-पतन के लेखों- जोखों से भरा पड़ा है | उसके अध्यन से जो बात सबसे स्पष्ट रूप से उभर के सामने आती है, वह यह है कि पतन के बाद जिन्होंने आत्म चिंतन का आश्रय लिया, अपनी कमियों को स्वीकार किया व अपनी भूलों को सुधारने के लिए जो तैयार हुए, उन्होंने समय पाकर अपनी समृधि को पुनः प्राप्त कर लिया |



इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज अथवा राष्ट्र पराभव के बाद शोक मग्न हुए अपने भाग्य को कोसते रहे तथा अपने पूर्वजों कि गौरव गाथाओं को मात्र गाकर ही संतोष करते रहे, उनका नामो निशान ही उठ गया |
आज हम हमारी भूलों पर विचार करने के लिए तैयार है | उस कार्य को आत्मनिंदा या परनिंदा के द्रष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि आत्मचिंतन करते समय व्यक्ति व समाज को उन समस्त परिस्थितियों पर विचार करना पड़ता है, जिनके अंदर से गुजरने का समाज को अवसर मिला, उस समय जो भी त्रुटियाँ रही उनका विवेचन आत्म चिंतन ही कहा जायेगा और इस कार्य को किये बिना कोई भी पुनरोत्थान कि कल्पना नहीं कर सकता |

आत्म चिंतन कर अपनी भूलों को निकलना, उन्हें स्वीकार करना व भविष्य में उनसे बचे रहने की चेष्टा करना अत्यंत दुष्कर कार्य है | मानव स्वभाव अपने आपको दोषी स्वीकार करने का अभ्यस्त नहीं है | दोष को स्वीकार करने से उसके अहंकार पर आगात लगता है | समय के साथ व्यक्ति व समाज कुछ मान्यताओं में अपने आपको बाँध लेता है, जिनमे सदा सदा के लिए व अपने आपको बांधे रखने में सुख का अनुभव करता है, व इन मान्यताओं के विरुद्ध यदि कोई व्यक्ति कुछ बोलता है या कहता है तो ऐसा व्यक्ति उसे शत्रु-वत प्रतीत होता है | इस प्रकार आत्म चिंतन का मार्ग अत्यंत कठोर कार्य है |



आत्म चिंतन का आरम्भ करते हुवे विचारक को सबसे पहले अपने ही विचारों से संघर्ष करना पड़ता है | उन पर विजय प्राप्त करने के बाद जैसे ही वह अपना मुख समाज के सामने खोलने की चेष्टा करता है | उसको समाज के विद्रोह का सामना करना पड़ता है | क्योंकि लम्बे समय तक चले आने वाले कार्य उसे संस्कार (जो वास्तव में कुसंस्कार हैं) का रूप धारण कर लेते है, तथा कमजोर व विकृत विचार भी रुढी का बल पाकर अपने आप को बलवान समझने लगते है | यद्यपि ऐसे विचार समय के द्वारा तिरस्कृत होकर सर्वथा त्यागने के योग्य सिद्ध होते है फिर भी व्यक्ति व समाज केवल रूढ़ी ग्रसिता के कारन उनको छोड़ने के लिए तैयार नहीं होता |

वर्तमान काल में जब हम समाज व उनके नेतृत्व की और दृष्टि डालते है | तो समाज को पूर्ण रूप से पंगु व नेतृत्व की और दृष्टि डालते है | तो समाज को पूर्ण रूप से पंगु व नेतृत्व से विहीन पाते है | क्षत्रिय व क्षात्र धर्म का नारा देकर समाज को एकत्रित व संघठित करने का अनेक बार, अनेक प्रकार से, अनेक लोगों ने प्रयास किया है, किन्तु सामजिक परिस्थितियों, समाज के अभावों, व पतन करने के कारणों का विवेक सम्मत विश्लेषण करने का प्रयास लगभग नगण्य रहा है |


सन् १९४७ में क्षत्रिय युवक संघ की स्थापना समाज चिंतन के दृष्टिकोण से इस युग की एक एतिहासिक घटना है | जहाँ पर बैठ कर लोगों ने सामजिक दृष्टिकोण से सोचने व अपनी कमियों को देखने का कार्य आरम्भ किया | स्वर्गीय तनसिंह जी व आयुवान सिंह जी ने समाज चिंतन को जागृत करने व उसे आगे बढ़ाने में जो महत्वपूर्ण योगदान किया, उसके लिए समाज को उनका कृतज्ञ रहना चाहिए |

किन्तु खेद का विषय यह है कि समाज चाहे कठिनाई से ही तैयार हों लेकिन नए विचारों को स्वीकार कर उनको पीछे चलने के लिए तो तैयार हो जाता है लेकिन आत्म चिंतन का मार्ग अपनाने से हमेशा कतराता रहता है | इसी का परिणाम आज हमारे सामने है |

जिन नवीन विचारों ने नई दिशा दृष्टि को उन विचारों को सृजित किया था, उसको आगे बढ़ना तो दूर रहा, उन्ही विचारों को विचार क्रान्ति के रूप में परिवर्तित करने में समाज के कार्यकर्ता पूर्ण रूप से असफल रहे है |



विचार एक धारा है | धारा का धर्म सतत गतिशील रहना है | इस धर्म को जो स्वीकार नहीं करते उसे हम धारा नहीं कह सकते | इसीलिए विचार से अधिक महत्व विचार धारा को दिया जाता है | एक विचार को स्वीकार कर, उस पर स्थिर हो जाना किसी समय विशेष में उपयोगी सिद्ध हो सकता है |

किन्तु समय बीतने पर ऐसे लोग रूढ़िवादी ही कहे जायेंगे | विचार का प्रायोजन ही निरंतर विकास की और आगे बढ़ना है | यदि विचार में गति नहीं है तो वह विचार, उसको धारण करने वाले व्यक्ति के विनाश का हेतु होगा | 

पितामह भीष्म का मत है, कि जिस प्रकार मिट्टी को पीसते रहने पर उसके बारीक होने का क्रम जारी रहता है , उसी प्रकार विचार को गतिशील बनाये रखने से ज्ञान सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता चला जाता है | इस क्रम का कहीं अंत नहीं होता |

इसलिये विचारशील व्यक्ति अपने आपको कभी पूर्ण नहीं मानता | वह यह भी दावा नहीं करता, कि जो कुछ कहा है वही सत्य है, क्योंकि वह जानता है, कि इस क्षेत्र में हर क्षण आगे बढ़ने व नए अनुभवों को ग्रहण करने कि संभावना विद्यमान है | जी लोग केवल विचारक है कर्म के प्रति जिनकी रुचि नहीं है, उनसे समाज को अधिक प्राप्त करने कि आशा नहीं लगनी चाहिए | क्योंकि विचार को पूर्णता प्रदान करने के लिए अध्यन, मनन, कर्म का अनुभव तथा अनुभवी व सत्य पर स्थित लोगों का संग आवश्यक है | इनमे से किसी एक का भी अभाव विचार पूर्णता को प्राप्त नहीं करता | 


अतः यह आवश्यक है कि समाज चिंतन को जागृत करने व उसे आगे बढ़ाने के लिए लोगों को उपरोक्त सभी साधनों का आश्रय लेना चाहिए, उसके बिना जो लोग समाज जागरण या समाज को संगठित करने कि कल्पना करते है, उनकी चेष्टाएँ हमेशा निष्फल ही सिद्ध होंगी |
समाज के अधिकांश लोग आज समाज के संघठन कि बात करते है व अपनी कार्य शैली को इस कार्य के निमित्त लगा देने का दावा करते है | ऐसे लोगों के होते हुए भी आज समाज में कोई भी संघठन न तो वास्तविक रूप में संघठित ही है, और न ही गतिशील ही है | सभी संघठनो के लोग निराशा के गहरे गर्तों में गोते लगाते दिखाई दे रहे है व इसके लिए वे एक दुसरे को दोषी ठहरा रहे है | इस सब के पीछे कारण क्या है ? 

कारण स्पष्ट है लोग बिना अपने आपको बदले समाज को बदलना चाहते है | लोग बिना कष्ट उठाये सुख भोगने कि कल्पना में डूबे हुए है | शारीरिक कर्म से मानसिक कर्म अधिक कष्ट दायक व दुष्कर है | लोगों को जब विचार चिंतन, व मनन, कि बात कही जाती है तो उसका उत्तर होता है कार्यकर्ता को कार्य चाहिए, विचार करना नेताओं का धर्म है | ऐसे लोगों को विचार के लिए तैयार करना एक कठिन कार्य है, जिसमे फंसे बिना लोग संघठन के कार्य में जुट पड़ते है व समय व्यतीत होने पर देखते है कि उनके कार्यकर्ताओं का उत्साह भंग हो चूका है |



कार्य में आरम्भ से लेकर अंत तक एकरूपता व सामान रस बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि कार्यकर्ताओं में उत्साह निरंतर बना रहे | भावनाओं को उभार कर या परिस्थितियों का भय दिखाकर समय विशेष पर लोगों को उत्साहित कर कार्य को सिद्ध किया जा सकता है, किन्तु जीवन पर्यन्त साधना के लिए, यह पर्याप्त सिद्ध नही हो सकते |

क्योंकि कामनाओ को आघात पंहुचाते ही उत्साह के स्थान पर शोक उपस्थित होता है | परिणामतः लोग एक दूसरे में दोष दृष्टि की स्थापना कर कर्म विमुख होने लगते है |

अतः आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है विचार क्रान्ति | सारे समाज को विचारशील बनाकर उसको आगे बढाने के लिए तैयार करना पड़ेगा | विचार व कर्म के सामंजस्य से उत्पन्न होने वाले नवीन अनुभव ही कार्यकर्ता के लिए संजीवनी शक्ति का कार्य कर सकते है | इस क्रम के चालु रहने पर लोगों की निरंतर नवीन प्रेरणा का सहारा मिलता रहेगा | जिससे उनका उत्साह कभी भंग नहीं होगा |

अतः यहीं से हम आत्म चिंतन के अध्याय को आरम्भ करते है | पहले हम हमारी भूलों को देखने व समझने का प्रयास करेंगे | उसके बाद उस संजीवनी शक्ति की खोज करेंगे, जिसको प्राप्त कर हमारे पूर्वजों ने अमरत्व व अक्षय यश प्राप्त किया था | यही होगा हमारी विचार क्रान्ति का पहला चरण ।
तो हम आज अपनी कमियों को अपनी भूलों को दूर करने के लिए कटिबद्ध हुएं ताकि क्षात्र धर्म के कंटकाकीर्ण पथ पर बढ़ने हेतु हम संस्कारित हों। संस्कार जैसे कि पूर्व के अध्याय में विस्तृत रूप से परभाषित किया जा चुका है अतः क्षात्र धर्म ही हमारा संस्कार है।

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