Wednesday, 9 September 2015

सामन्त :-

सामन्त :-

कैसे हो दादाजी !
बेटा कोई 8 दशक बीत गये इन आँखों ने क्या कुछ नही देखा ?

मुझे याद है भरी जवानी के वो दिन जब देश झूठी आजादी कि तरफ दौड़ रहा था,
मैं खुद सामन्तों के विरुद्ध झण्डा लिये उत्साह से घुमा करता था !!
(और एक गहरी श्वास छोड़ते हुए बोले हाय रे देश कि किस्मत ।)



आज आजादी के इतने सालो बाद भी वो मंजर याद आता है,
वो जो उँचा टिल्ला है वहाँ ठाकुर लाल सिंह जी का किला था,
कितने दीन दुःखीयो को उस किले बहार खङे होकर गुहार लगाने से न्याय मिला है याद है मुझे !!

आज उनका परिवार तो इस गाँव मे नहीं पर मुझे याद है,
मेरी दादी मुझे यह कहते हुवे सुबह उठाती थी कि ठाकुर साहब सूर्य को जल चढाने छत पर आ रहे है मुंह देख ले बङा शुभ दिन निकलेगा ।


मुझे याद है तिज-त्यौहार और वो मैले जिनमें ठाकुर साहब गाँव कि खुशी के लिये राजकोष से धन खर्च करते थे ।
हम जहाँ उत्साह से खेलते कूदते हुवे बङे हुवे वो ठाकुर साहब का श्याम बाग और कृष्ण मन्दिर तो अब एक याद बनकर रह गया ।

हमारे गाँव कि चर्चा थी जमाने भर मे थी, कितने खुशहाल थे हम सब !!
लाल सिंह जी जब गढ़ से निकलते तो गाँव के बङे बूढ़े भी उनके सम्मान मे खड़े हो जाते ।और वो हर गरीब दुखयारे कि बात सुनते थे ।

बेटा जब ये अंग्रेजी शिक्षा आयी तो हमें सामन्तों के बारे में गलत प्रचारित किया गया,
तब मेरी दादी इस गाँव के चौक के बिचो-बिच बैठकर हमें समझाती थी कि तुम्हारी मती खराब हो गयी है,
काश हम मेरी दादी कि बात समझ पाते ।

देश आजाद हुआ और उनकी जमीने गयी,
पर किले के चारों तरफ कि जमिन गढ़ के नाम थी,
लाल सिंह जी ने फिर भी पुरे गाँव को बसने के लिये जमिन दी ।


हम सामन्तों का विरोध करते रहे वो खुशी खुशी हमारी खुशी के लिये सब कुछ त्यागते गये ।
लाल सिंह जी के पत्र व्यवहार है बेटा मेरे पास,
साफ साफ लिखा है उन्होंने हम लोक कल्याण के लिये जागीरो को त्याग रहे है ।
(अब क्या बताउ आज लोक मे गरीब का कोई कल्याण नही हो सकता )
लोक मे नयी कानून व्यवस्था है गरीब कि कोई सुनता नही ।

अब उस किले के बाहर खड़े होकर गुहार लगाने से न्याय नही मिलता !!
हम अपने ही हाथो अनाथ हो गये बेटा !!

आज भी ये बूढ़ी आँखें देख रही है कि उस खण्डहर किले से कोई लाल सिंह जी आये और हम गरीबों कि सुने ।।

लेखन - बलवीर राठौड़ डढेल ।

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