Tuesday, 28 November 2017

राजपूत क्षत्रिय शाही राजवंश - राजा जयपाल शाही

राजपूत क्षत्रिय शाही राजवंश (काबुल और जाबुल के राज्य)


आज हम राजपूत क्षत्रिय शाही राजवंश के राजा जयपाल शाही के बारे में जानकारी दे रहे है इस विषय पर ज्यादा जानकारी हो तो जरूर शेयर करें !!

राजा जयपाल शाही :-

962-63 ई. में अल्प्तगीन के सेनापती सुबुक्तगीन ने मुल्तान और लमघान सिंघ पर आक्रमण किया जिसका सामना उदभाण्डपुर के राजा जयपाल शाही ने किया । छम्ब के साहिल्यवर्मन के शिलालेख में वर्णित है कि तुकों की सेना को रोक दिया गया था ।

इसी वर्ष अलतगीन की गजनी में मृत्यु हो गई। उसका पुत्र इसहाक जब सुल्तान बना तो पूर्व के अपदस्थ सुल्तान लवीक ने राजा जयपाल की सहायता से इसहाक को भगा दिया और लवीक गजनी
का सुल्तान बन गया । परन्तु कुछ समय बाद इसहाक ने लवीक को फिर हटा दिया और इसहाक सुल्तान बन गया ।

इसहाक की मृत्यु 966 ई. में हुई और फिर दस वर्ष इसहाक के सेनापति बल्तगीन ने 975 ई. तक शासन किया । उसके बाद पिरे नामक सुल्तान बना तो जनता ने पूर्व अपदस्थ सुल्तान लवीक को बुलाया ।

राजा जयपाल ने लवीक की सहायता में अपने पुत्र के साथ सेना भेजी परन्तु अलप्तगीन के दास सुबुक्तगीन ने उस सेना को हरा दिया । इस घटना के बाद पिरे को हटा कर 977 ई. में सुबुक्तगीन सुल्तान बना ।
इस समय उदभण्डपुर के शाही राजवंश की सीमा लामधान से चिनाब नदी तक फैली थी।

सुबुक्तगीन गजनवी का आक्रमण -

986-87 ई. में सुबुक्तगीन ने राजा जयपाल के राज्य के पहाड़ी दुर्गों पर अधिकार कर लिया । जयपाल ने गजनवी के विरूद्ध अभियान शुरू किया और वह लमधान और गजनी के बीच आ खड़ा हुआ ।
सुबुक्तगीन अपने पुत्र महमूद के साथ आया और दोनों और से युद्ध शुरू हुआ जो कई दिनों तक चला ।

अचानक भारी तूफान और बर्फबारी हुई जिसके कारण दोनों पक्षों में संधी हो गई। जब जयपाल गजनी के अधिकारी जो संधी की रकम लेने उसके साथ आए थे को लेकर अपनी राजधानी पहुंचा तो उसने संधी तोड़ कर अधिकारियों को बन्दी बना लिया ।

गजनी में जब यह समाचार पहुंचा तो सुबुक्तगीन सेना लेकर जयपाल के विरूद्ध चला और मार्ग के मंदिरों को तोड़ मस्जिदें बनवाई ।

जयपाल को जब यह ज्ञात हुआ तो वह भी ससैन्य चला और उसे आसपास के राजाओं ने भी सहायता दी। जयपाल के पास विशाल सेना हो गई। अब दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध हुआ और शाम होते-होते भारतीय सेना हार गई। सुबुक्तगीन ने लमधान को गजनी राज्य में मिला लिया । इसके बाद 10 वर्ष तक गजनी के सुल्तानों ने राजा जयपाल पर कोई आक्रमण नहीं किया ।

महमूद गजनवी का आक्रमण (1001 ई.)

महमूद 15 हजार सेना लेकर पेशावर नगर के बाहर शिविर लगा कर युद्ध के लिए तैयार हुआ। राजा जयपाल भी 12 हजार घुड़सेना, 30 हजार पैदल और 300 हाथी लेकर आगे बढ़ा । जयपाल और सेना आने की प्रतीक्षा में ही था कि महमूद ने आक्रमण कर दिया ।
यह युद्ध दोपहर तक चला और भारतीय सेना पराजित हो गई और लगभग 5 हजार सैनिक काम आए और राजा जयपाल अपने परिवार में 15 लोगों सहित बन्दी बना लिया गया। महमूद अब शाही राजवंश की राजधानी ओहिन्द की तरफ बढ़ा क्योंकि वहां के लोगों ने समर्पण नहीं किया था और वे पहाड़ों और जंगलों में जाकर अवसर ढूंढ रहे थे।

महमूद ने राजधानी ओहिन्द पर अधिकार किया और गजनी लौट गया जहां जयपाल से 50 हाथी लेकर संधी हुई और उसे छोड़ दिया गया ।

उन दिनों भारत में यह मान्यता प्रबल थी कि जो राजा मुसलमानों द्वारा बन्दी बना दिया गया या दो बार पराजित हो चुका तो वह अपने को अपवित्र मान कर अपने पुत्र को राज्य दे देता था और स्वयं अग्नि में जल जाता था ।

मुसलमान इतिहासकार उत्बी, मुस्तौफी और फरिश्ता ने ऐसा लिखा है। इस कारण राजा जयपाल ने 1002 ई. में अपने पुत्र आनन्दपाल को राज्य सौंप दिया और स्वयं अग्नि प्रवेश कर गया ।

नोट:- छायाचित्र काल्पनिक है

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