Wednesday, 18 May 2016

"बिलखते खण्डहर"

"बिलखते खण्डहर"
 
आज शाम फिर बारात आयी है गाँव में, केशरिया साफा पहने हुवै बांके रणबंके व मुछो के ताव लगाते सफेद धोती और ढाढी वाले ठाकुरो का हुजुम फिर लगा है ।
गाँव के बाहर सरकारी स्कुल में ही बारात का डेरा लगा है और सामहेला भी उसी पुराने स्थान पर हो रहा है ।
 
मैं खण्डहर में कैद वर्षों से यह सब देख रहा हुँ कितने दुल्हे यहाँ आये और कितनी दुल्हन यहाँ से विदा हुई ।
मुझे भी याद है यही स्थान था जहाँ मेरे सामहेले हुवै थे जनरेशन बदल गयी, रिवाज बदल गयें, लोग बदल गये, पर मैं यही हुँ आज भी इस खण्डहर के चबुतरे मैं केद ।
 
इस गाँव में आखातीज पर कोई दुल्हा बनकर मेरे बाद नही आया ।
 
अंग्रेजों का दौर था गोरों कि उन दिनो मनमानी चलती थी ।
क्रूर और अत्याचारी लोग थे, जब मेरी बारात आयी तो गौरों कि तरफ से फरमान था पहले हमसे अनुमति ले फिर कोई कार्य गाँव में करे ।
 
और इसी बात पर इस गाँव के ठाकुर साहब व गौरे कई बार आमने सामने हो गये थे ।
हम तिर, तलवार, भाले और ढाल वाले थे और वह बंदूक व बारूद वाले दुसाहसी ।
इस रोज भी बारात आने के कुछ देर बाद गौरों कि टुकङी आ धमकी गाँव में ।
 
इस बार बंदूक से तलवार ने टकराने का फैसला किया आंतक के अंत के लिये और क्या था उधर से धांय धांय कि आवाज आती और इधर से छक छक करती रणचंङी कई गौरों का रक्त चख चुकी थी ।
थोङे ही समय में मंगल गीत विरह गीतों में बदल गयें,
 
मेरा सिर और धङ यही गिरा था ।
 
गाँव वालों ने उस समय एक चबुतरा याद में बनवा दिया था और हर बारात के आने से पहले मुझे याद किया जाता था ।
अब जनरेशन बदल गयी, समय बदल गया रिवाज बदल गयें ।
 
अब भी बारात आती है पर मुझे कोई याद नही करता हां कुछ बाराती जरुर बैठने कि जगह ढुंढते हुवै आते है यही बैठकर पिते है और दुनियाभर कि बाते करते है ।
 
कुछ बाराती आपस में अपनी कौम कि बहादुरी के किस्से सुनाते है,
तो कुछ समय के साथ बदलने कि बात करते है ।
कुछ गौरों कि भाषा भी बोलने लगे है ।
 
मेरा दर्द इन सबको देखकर प्रवान चढ जाता है मैं किस धर्म का अनुसरण कर रहा था और आज मेरा समाज क्या है, और मेरे साथ यह खण्डहर भी बिलखते है ।।
 
लेखन - बलवीर राठौड़ डढेल !

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