Monday, 20 October 2014

रजपूत

रजपूत

तारो के तेज में चन्द्र छिपे नहीं,सूरज छिपे नहीं बादल छायो !
चंचल नार के नैन छिपे नही, प्रीत छिपे नहीं पीठ दिखायो !!

रण पड़े राजपूत छिपे नहीं, दाता छिपे नहीं मंगन आयो !
कवि गंग कहे सुनो शाह अकबर, कर्म छिपे नहीं भभूत लगायो !!

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