Monday, 20 October 2014

चाँम्पावत

चाँम्पावत

काहु के दो चार है, काहू के दस बीस ।
रहे उजेनी राङ मे, चाँपावत चालीस ॥

जुध कीयो जोरे जबर, जाण्यो सोह जगत ।
खाग बजाई खैरवे, चौङे चाँपावत ॥

चाँपा थारी चाल, औरा न आवे नी ।
बीकानौ थारे लार, जैपर है जलेब मे ॥

चलियो चांपो चंड, अमर पिंड धर अषव पर ।
पहुँचयो प्रबल प्रचंड, मुगलां दल देखत मुदै ।।

प्राचिर ऊपर पूग्ग, कोई नय नंहलरव कमध ।
पैली पारहि पुग्ग, कपि शिर खाई लाँघकर ।।

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