Saturday, 5 November 2016

कुँवर मानसिंह आमेर - काबुल अभियान तारिकियो, युसुफजाइयों, गौरी, महमुद, अफरीदी व अफगान कबिलों से संघर्ष ।

कुँवर मानसिंह आमेर - काबुल अभियान तारिकियो, युसुफजाइयों, गौरी, महमुद, अफरीदी व अफगान कबिलों से संघर्ष ।

शहजादे मुराद और राजा टोडरमल को युसुफजाइयों ( अफगान कबीला ) का दमन करने के लिये भेजा गया । इन्होंने मलन्दराय दर्रे ( पेशावर और स्वात के मध्य स्थित ) पर राजा बिरबल को मार डाला था । यह घटना फरवरी 1586 में घटित हुई थी । राजा टोडरमल ने इस विचार को पसंद नही किया कि मुराद जैसा एक जवान शहजादा भयंकर युसुफजाई कबीले से लङे । इसलिए उन्होंने शहजादा मुराद कि जगह दुसरा योग्य व्यक्ति भेजने को कहा ।

अकबर ने टोडरमल के प्रस्ताव को मानते हुवे कुँवर मानसिंह को युसुफजाई कबिले के दमन के लिये भेजा । उस समय कुँवर जमरुद ( खैबर दर्रे के प्रवेश के पास ) थे और सारा ध्यान तारीकियों को दंडित करने में लगाया हुआ था । लेकिन अब वह अगले उद्देश्य को सफल बनाने के लिये रवाना हो गये । राजा टोडरमल से विचार विमर्श करने के बाद अपना शिविर सिन्धु नदी के तट पर स्थापित किया । उन्होंने एक किले का निर्माण करवाया जो बुन्नर दर्रे और ओहिन्द के बीच में था । इसके निर्माण के पिछे दो उद्देश्य थे एक, यह युसुफजाइयों के आक्रमण के समय सुरक्षा प्रदान करे और दुसरा, युसुफजाइयों पर आक्रमण करने के लिये एक आधार का काम करें । राजा टोडरमल कुँवर कि नितियों से पुरी तराह संतुष्ट थे और वह लौटकर फतेहपुर आ गये व इस अभियान पर कुँवर मानसिंह अकेले रहे ।

कुँवर के युसुफजाइयों को दण्डित करने के लिये रवाना होने के साथ ही काबुल गवर्नर का पद रिक्त हो गया था । यह सुरक्षित नहीं था कि इस पद को ज्यादा देर तक खाली रखा जाए क्योंकि काबुल में अफगानों के नये विद्रोह का खतरा बराबर बना हुआ था । इसलिए पंजाब के गवर्नर भगवन्तदास काबुल गवर्नर बने ।।
लेकिन मानसिंह के बाद काबुल का गवर्नर पद कोई और ठिक से नही संभाल पाये । और मानसिंह पुनः काबुल के गवर्नर बने ।।

सितम्बर 1586 में कुँवर मानसिंह कि तबियत बिगङ गई शत्रुओं को मानसिंह को परेशान करने का मौका मिल गया । महमूद और गौरी कबीलों ने अफगानों के साथ मिलकर मानसिंह के काफिले पर हमले किये ।
13 दिसम्बर 1586 को मानसिंह 3,000 घुङसवारों के साथ पेशबलक से चले और तिरह के निकट घाटी चाहर चोब जल्दी सुबह पहुँचे । 15 दिसम्बर को एक सेना मानसिंह के सेनापति के नेतृत्व में अफरीदियों पर आक्रमण कर उन्हें पराजित कर देती है और बहुत सा लूट का माल एकत्र किया ।

यहाँ मानसिंह और उनके अधीनस्थ अधिकारीयों के भावी कार्य प्रणाली के संबंध में एक विवाद उठ खङा हुआ । कुछ लोगों का विचार था कि हमें लौट चलना चाहिए और लूट का माल सुरक्षित स्थान पर जमा कर देना चाहिए । इसके बाद आगे बढना चाहिए । कुँवर ने इस सुझाव को खारिज कर दिया और वह निरन्तर आगे बढते रहे ।
कुँवर मानसिंह जब गोरी कबीले के घरों के पास से गुजरे तो गोरी कबिले ने समर्पण कर अपने आपको बचाया । पर इसी बीच पीछे की शाही सेना जो तख्तबेग के अधीन थी, पर युसुफजाइयों के नेता जलाल ने आक्रमण कर दिया । भंयकर लङाई शुरु हो गयी । कुँवर मानसिंह ने जो अग्रभाग में थे, कुमुक भेज दी । अफगान लोग पराजित हुए और तितर-बितर हो गये ।

कुँवर ने अपने बङे बेटे जगतसिंह को पिछली सेना के साथ छोड़ दिया और अली मस्जिद किले की और रवाना हुवे । मानसिंह के इससे आगे बढ़ने के कार्य में अफगानी कबिलों के समूहों के आक्रमण से बाधा में पङी । जयपुर स्टेट आर्काइव्ज की वंशावली का कथन है कि मानसिंह का विरोध करने वाले अफगानी लोगों कि संख्या 3 लाख थी । मानसिंह कि सेना एक घाटी में विवश होकर रुकी हुई थी और अफगान लोग उन पर तिरों और पत्थरों की वर्षा कर रहे थे । मानसिंह कि हालत खतरनाक हो गयी क्योंकि लङने के लिये खुला स्थान नही था न आश्रय लेने को कोई स्थान जहाँ से वह शत्रु के तिरो व पत्थरों से बचाव कर सके । इतना होते हुए भी कुँवर ने शत्रुओं से उत्साह-पूर्वक लङाई जारी रखि । समय समय पर आश्चर्यजनक लङाईयाँ होती रही । खुले स्थान पर पहुँचने पर सेना को शस्त्रों कि शक्ति दिखाने का मौका मिला । अफगान लोग कुँवर की सेना से अधिक देर तक नहीं लङ सके और तंग घाटियों से होते हुए भाग निकले ।

मानसिंह अभी शत्रुओं के कष्ट से पुरी तराह मुक्त नही हुवे। निजामुद्दीन हमें बतलाता है कि तारीकी और अफगान रात दिन बङे बङे समूहों में आते और लङाई करते रहते । इसी समय मानसिंह के भाई माधोसिंह जो ओहिन्द के थाने पर इस्माइलकुलीखान के साथ थे, एक सुसज्जित सेना के साथ मानसिंह को कुमुक पहुँचाने आये । इसके पश्चात् अफगान लोग भाग गये । उनके प्रायः दो हजार लोग मारे गये ।।

साभार पुस्तक- राजा मानसिंह आमेर
लेखक - राजीव नयन प्रसाद
अनुवाद- डा रतनलाल मिश्र

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