Friday, 10 October 2014

युद्ध नहीं है नाश मात्र ही युद्ध स्वयं निर्माता है ।

युद्ध नहीं है नाश मात्र ही युद्ध स्वयं निर्माता है !!

युद्ध नहीं है नाश मात्र ही, युद्ध स्वयं निर्माता है !
लड़ा न जिस ने युद्ध राष्ट्र वह, कच्चा ही रह जाता है !!

नहीं तिलक के योग्य शीश वह, जिस पर हुआ प्रहार नहीं !
रही कुँआरी मुट्ठी वह जो, पकड़ सकी तलवार नहीं !!

हुए न शत-शत घाव देह पर, तो फिर कैसा साँगा है !
माँ का दूध लजाया उसने, केवल मिट्टी राँगा है !!

राष्ट्र वही चमका है जिसने, रण का आतप झेला है !
लिये हाथ में शीश, समर में जो मस्ती से खेला है !!

उन के ही आदर्श बचे हैं, पूछ हुई विश्वासों की !
धरा दबी केतन छू आये, ऊँचाई आकाशों की !!

ढालों भालों वाले घर ही, गौतम जनमा करते हैं !
दीन-हीन कायर क्लीवों में, कब अवतार उतरते हैं !!

नहीं हार कर किन्तु विजय के, बाद अशोक बदलते हैं !
निर्दयता के कड़े ठूँठ से, करुणा के फल फलते हैं !!

बल पौरुष के बिना शान्ति का, नारा केवल सपना है !
शान्ति वही रख सकते जिनके, कफन साथ में अपना है !!

उठो, न मूंदो कानआज तो, नग्न यथार्थ पुकार रहा !
अपने तीखे बाण टटोल, बैरी धनु टंकार रहा !!

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